(संतोष कुमार यादव)
गोमती, घाघरा, गंगा या सरयू… नदियां सिर्फ पानी की धाराएं नहीं होतीं, बल्कि उनके किनारे बसे गांवों की पूरी जिंदगी उन्हीं के साथ बहती है। इन्हीं किनारों पर बच्चे जन्म लेते हैं, तैरना सीखते हैं, नाव चलाना सीखते हैं, मछली पकड़ना सीखते हैं और बहुत छोटी उम्र में ही संघर्ष का अर्थ भी समझने लगते हैं। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के अर्जुनपुर गांव का राजकुमार निषाद भी उसी दुनिया का बच्चा है। जिस उम्र में शहरों के बच्चे स्वीमिंग पूल में प्रशिक्षकों की निगरानी में तैरना सीखते हैं, उस उम्र में नदी किनारे का बच्चा तेज धारा से लड़ना सीख जाता है। उसके लिए पानी खेल नहीं, जीवन का हिस्सा होता है।

लेकिन विडंबना यह है कि जिन बच्चों के भीतर प्रकृति से लड़ने का साहस होता है, वही बच्चे संसाधनों की कमी के कारण सबसे पीछे छूट जाते हैं। स्कूल हैं तो संसाधन नहीं, प्रतिभा है तो मंच नहीं, हौसला है तो सहारा नहीं। राजकुमार जैसे बच्चे सिर्फ अपने परिवार का नहीं, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज का चेहरा हैं। वे बताते हैं कि गांवों में प्रतिभा की कमी नहीं, कमी सिर्फ अवसरों की है। विडंबना यह है कि जिन बच्चों को नदी की धाराएं तैरना सिखा देती हैं, उन्हें व्यवस्था आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दे पाती। गोमती की तेज धारा में कूदकर बच्चों की जान बचाने वाला यह किशोर किसी प्रशिक्षण संस्थान का छात्र नहीं, बल्कि परिस्थितियों की पाठशाला में तैयार हुआ साहस है। नदी किनारे के गांवों में पलने वाले बच्चों का बचपन शहरों से बिल्कुल अलग होता है। उनके खेल में नदी होती है, जिम्मेदारियों में परिवार होता है और सपनों के बीच गरीबी खड़ी रहती है। वे बहुत जल्दी समझ जाते हैं कि जिंदगी आसान नहीं है। कई घरों में पिता रोजी-रोटी के लिए दूसरे राज्यों या विदेशों में मजदूरी करते हैं और मांएं संघर्षों के बीच बच्चों को पालती हैं। जरूरत इस बात की है कि शासन-प्रशासन ऐसे बच्चों को खोजे, उन्हें छात्रवृत्ति दे, खेल और शिक्षा से जोड़े तथा उनके भविष्य को सुरक्षित करे। क्योंकि सम्मान पत्र दीवार की शोभा है, लेकिन अवसर पूरी जिंदगी बदल देते हैं।
गोमती किनारे की निषाद बस्ती में आज भी कई आंखें सपने देख रही हैं। कई बच्चे हैं जो परिस्थितियों से लड़ना जानते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि कोई उनका हाथ पकड़कर यह भरोसा दिलाए कि उनका भविष्य भी नदी के बहाव में नहीं बह जाएगा। गोमती नदी के किनारे बसे इन गांवों का बुरा हाल है। बरसात में कटान का डर, खेती की अनिश्चितता, रोजगार का अभाव, शिक्षा के सीमित साधन और पलायन की मजबूरी, यही यहां की हकीकत है। जबकि इन्हीं इलाकों में जल-खेल, आपदा राहत प्रशिक्षण, तैराकी, नौकायन, खेलकूद और स्किल डेवलपमेंट जैसी योजनाएं बड़े बदलाव ला सकती हैं। राजकुमार ने बिना किसी प्रशिक्षण के तीन बच्चों की जान बचाई। सोचिए, अगर ऐसे बच्चों को सही प्रशिक्षण, बेहतर शिक्षा और आर्थिक सहयोग मिले तो वे राष्ट्रीय स्तर के तैराक, जल-रक्षक, खिलाड़ी या सेना और आपदा प्रबंधन जैसी सेवाओं का मजबूत हिस्सा बन सकते हैं।
यह सिर्फ एक बच्चे की बहादुरी का मामला नहीं है, बल्कि उस संभावना का संकेत है जो गांवों की धूल और नदियों की धाराओं के बीच छिपी हुई है। उनकी पढ़ाई, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता के लिए विशेष योजनाएं बने। क्योंकि प्रतिभा शहरों की मोहताज नहीं होती। नदी किनारे बसे गांवों में आज भी कई राजकुमार हैं। जो परिस्थितियों से लड़ना जानते हैं, जो दूसरों की जिंदगी बचाने का साहस रखते हैं,
लेकिन जिन्हें खुद अपने सपनों को बचाने के लिए सहारे की जरूरत है।
गोमती नदी में डूब रहे तीन बच्चों की राजकुमार ने बचाई थी जान
गोमती नदी में मछली पकड़ने गए अर्जुनपुर गांव के ही मंजीत (12 वर्ष) किशन उर्फ कल्लू (11 वर्ष) ओमलाल (10 वर्ष) कुलदीप (23 वर्ष) अखिलेश (6 वर्ष) और अरविंद (15 वर्ष) सभी मासूम अपनी दुनिया में मस्त थे। कोई मछली पकड़ रहा था, कोई मोबाइल से रील बना रहा था। इसी बीच अचानक नदी के तेज बहाव में मंजीत डूबने लगा। उसे बचाने की कोशिश में किशन और ओमलाल भी पानी में फंस गए। कुलदीप भी उन्हें बचाने के प्रयास में बहाव की चपेट में आ गया। नदी किनारे खड़े छोटे अखिलेश की चीखों ने माहौल बदल दिया। रील बना रहा अरविंद दौड़ा, और वहीं भैंस चरा रहे राजकुमार भी। फिर जो हुआ, वह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। राजकुमार सीधे नदी में कूद पड़ा। उसने जान जोखिम में डालकर तीन बच्चों को बाहर निकाल लिया। लेकिन कुलदीप तेज धारा में बह चुका था।




