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छोटे किसान और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं ग्रामीण परिवर्तन की वास्तविक प्रेरक- राहुल भगत

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रायपुर, 5 अगस्त।छत्तीसगढ़ में ग्रामीण विकास को अधिक समावेशी और समुदाय-आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल करते हुए इंडिया रूरल कोलोक्वियम (IRC) के छठे संस्करण के छत्तीसगढ़ अध्याय का शुभारंभ बुधवार को नया रायपुर स्थित जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान (TRI) में हुआ। कार्यक्रम का मुख्य विषय “विकसित छत्तीसगढ़ के लिए जमीनी नेतृत्व” रहा, जिसमें ग्रामीण विकास में छोटे किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका पर व्यापक चर्चा हुई।

     मुख्यमंत्री के सचिव एवं सुशासन एवं अभिसरण विभाग के सचिव राहुल भगत ने कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहा कि छोटे किसान और स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं ग्रामीण परिवर्तन की वास्तविक प्रेरक शक्ति हैं। उन्होंने कहा कि इनका एक छोटा-सा साहसिक कदम अनेक लोगों को बदलाव का वाहक बनने की प्रेरणा देता है। उन्होंने कहा कि टीआरआई और छत्तीसगढ़ सरकार का यह सहयोग राज्य में समुदाय आधारित और समावेशी ग्रामीण विकास की साझा प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।

     कार्यक्रम में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, पंचायत प्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों, विकास विशेषज्ञों तथा समुदाय के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस दौरान “ग्रीन इकोनॉमिक पाथवेज़-छत्तीसगढ़” अध्ययन रिपोर्ट का भी विमोचन किया गया, जिसमें जलवायु परिवर्तन के अनुकूल और समावेशी ग्रामीण अर्थव्यवस्था विकसित करने के सुझाव प्रस्तुत किए गए हैं।

    पद्मश्री सम्मानित बुदरी थाती ने मुख्य वक्तव्य देते हुए प्रकृति और समुदाय के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि जहां परिवर्तन असंभव प्रतीत होता था, वहां प्रेम और ईमानदार प्रयासों से सकारात्मक बदलाव संभव हुआ। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति प्रेम और समझ की अपेक्षा रखता है और यही समाज में स्थायी परिवर्तन का आधार बन सकता है।

   पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव भीम सिंह ने कहा कि किसी भी सरकारी योजना का वास्तविक क्रियान्वयन गांवों में होता है। यदि गांव स्तर की संस्थाएं मजबूत नहीं होंगी तो विकास की गति भी सीमित रहेगी। उन्होंने ग्राम स्तरीय संस्थाओं को सशक्त बनाने पर विशेष जोर दिया।

    वर्ष 2016 में स्थापित टीआरआई पिछले एक दशक से ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर स्थानीय नेतृत्व आधारित समावेशी विकास की दिशा में कार्य कर रहा है। संस्था ने वर्ष 2026 में अपने दूसरे दशक में प्रवेश करते हुए महिला नेतृत्व को और अधिक सशक्त बनाने तथा समुदाय-आधारित विकास मॉडल का विस्तार करने का संकल्प दोहराया।

   इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए आयोजित राज्य स्तरीय इंडिया रूरल कोलोक्वियम में नीति-निर्माताओं, विशेषज्ञों और जमीनी स्तर के प्रतिनिधियों ने इस बात पर विचार-विमर्श किया कि विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण में अगली पीढ़ी का नेतृत्व किस प्रकार तैयार किया जाए और सार्वजनिक संस्थाएं समुदायों को सशक्त बनाने में क्या भूमिका निभा सकती हैं।

   कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण “ग्राम संवाद : ग्रामीण भारत का भविष्य गढ़ते समुदाय” रहा। इस विशेष संवाद में महिला नेताओं, प्रगतिशील किसानों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न सामुदायिक संस्थाओं ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने आजीविका सुधार, सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और मजबूत ग्रामीण समुदायों के निर्माण से जुड़े व्यावहारिक सुझाव भी प्रस्तुत किए।

     इसके बाद आयोजित “समाधान मंथन – पॉलिसी इनोवेशन लैब” में विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने समुदायों के अनुभवों के आधार पर नई नीति संबंधी अवधारणाएं तैयार कीं। इन प्रस्तावों को वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों, शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और समुदाय के प्रतिनिधियों की निर्णायक समिति के समक्ष प्रस्तुत किया गया। इस अभ्यास का उद्देश्य जमीनी अनुभवों को प्रभावी सार्वजनिक नीतियों में बदलने की दिशा में ठोस पहल करना था।

     पूरे कोलोक्वियम में स्थानीय शासन को मजबूत बनाने, जनभागीदारी बढ़ाने, समुदाय-आधारित नीति निर्माण, उत्तरदायी सार्वजनिक संस्थानों के विकास और विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने पर विशेष जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने माना कि विकसित छत्तीसगढ़ का सपना तभी साकार होगा जब ग्रामीण समुदाय नीति निर्माण और विकास प्रक्रिया के केंद्र में होंगे।

     कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों को राहुल हिरेमठ (प्रोफेसर, आईआईएम रायपुर), सत्यलता मिरी (अध्यक्ष, जिला पंचायत जांजगीर-चांपा), हीना अनिमेष नेताम (निदेशक, जनजातीय अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान), मेनका चंद्राकर (उपायुक्त, जनजातीय विभाग), अश्विनी देवांगन (मिशन संचालक, एसआरएलएम) तथा डॉ. संजीव पराशर (प्रभारी निदेशक, आईआईएम रायपुर) सहित कई विशेषज्ञों ने संबोधित किया।