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खनिज संशोधन कानून से राज्यों के अधिकार कमजोर, स्कूलों की बदहाली पर भी सरकार को घेरा: भूपेश बघेल

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रायपुर, 22 अगस्त। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार पर राज्यों के वित्तीय और संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि संसद में बिना पर्याप्त चर्चा के पारित किया गया खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 संघीय ढांचे के लिए गंभीर चुनौती है। उन्होंने कहा कि इस संशोधन के बाद राज्यों के अपने क्षेत्र से निकलने वाले खनिजों पर उपकर (सेस) लगाने के अधिकार सीमित हो जाएंगे और इसका सबसे अधिक असर खनिज संपदा वाले राज्यों पर पड़ेगा।

      श्री बघेल ने आज यहां प्रेस कान्फ्रेंस में कहा कि यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2024 के उस ऐतिहासिक फैसले के प्रभाव को निष्प्रभावी करने की कोशिश है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार स्वीकार किया गया था। उन्होंने कहा कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत भूमि और उससे जुड़े अधिकारों में राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन नए कानून के जरिए केंद्र को अधिक अधिकार दिए गए हैं।

     उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से बड़ी मात्रा में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन और जिंक जैसे खनिज निकलते हैं। ऐसे में खनिज संसाधनों से होने वाली आय पर राज्यों के अधिकार सीमित होने का सीधा असर राज्य के आर्थिक हितों पर पड़ेगा। बघेल ने कहा कि केरल, झारखंड, तेलंगाना और कर्नाटक सहित कई राज्यों ने इस कानून का विरोध किया है। उन्होंने सवाल किया कि छत्तीसगढ़ सरकार इस मुद्दे पर मौन क्यों है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या यही डबल इंजन सरकार का फायदा है।

जर्जर स्कूल भवनों को लेकर सरकार पर हमला

     पूर्व मुख्यमंत्री ने प्रदेश में जर्जर स्कूल भवनों को लेकर भी राज्य सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि धमतरी के बारना, धमधा, रायगढ़, मोहला-मानपुर, बलौदाबाजार, सक्ती और सारंगढ़-बिलाईगढ़ सहित कई क्षेत्रों में बच्चे और स्थानीय लोग स्कूल भवनों की मरम्मत की मांग को लेकर आंदोलन करने को मजबूर हैं।

       श्री बघेल ने कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल में ‘मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना’ के तहत लगभग 30 हजार स्कूलों में मरम्मत और निर्माण कार्यों के लिए 1,807.68 करोड़ रुपये का प्रावधान एवं आवंटन किया गया था, जिसमें से 1,191 करोड़ रुपये खर्च किए गए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार बदलने के बाद भाजपा सरकार ने इस योजना को समाप्त कर शेष आवंटन भी निरस्त कर दिया।

       उन्होंने कहा कि स्कूल भवनों का नियमित रखरखाव सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन वर्तमान सरकार की कथित उदासीनता के कारण कई स्कूलों की छतें जर्जर हैं, बारिश में पानी टपकता है, शौचालय खराब हैं और कक्षाएं बच्चों के बैठने लायक नहीं रह गई हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में 10,463 स्कूल बंद किए जाने के बाद बचे हुए स्कूलों की स्थिति सुधारने में भी सरकार विफल रही है।

पीएम आवास के आंकड़ों पर सरकार से मांगा जवाब

     प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों को लेकर भी बघेल ने राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा। उन्होंने कहा कि उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने 9 जून 2026 को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राज्य में 18.5 लाख प्रधानमंत्री आवास पूर्ण होने की जानकारी दी थी। वहीं रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा से मिली जानकारी के आधार पर 11 अगस्त को दावा किया कि प्रदेश में 9.81 लाख प्रधानमंत्री आवास ही पूरे हुए हैं।

     श्री बघेल ने कहा कि लोकसभा में उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले पांच वर्षों में प्रदेश के लिए 15.45 लाख आवासों का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, जिसमें 13.55 लाख आवास स्वीकृत हुए। उन्होंने सरकार से पूछा कि इन आंकड़ों में सही कौन है और गलत कौन। उन्होंने कहा कि उपमुख्यमंत्री द्वारा मुख्यमंत्री को दी गई जानकारी और लोकसभा में सांसद को उपलब्ध कराई गई जानकारी के बीच इतना बड़ा अंतर गंभीर सवाल खड़े करता है। सरकार को इस विरोधाभास पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

वंदे मातरम को लेकर भाजपा पर राजनीतिकरण का आरोप

     वंदे मातरम को लेकर जारी विवाद पर बघेल ने भाजपा पर इतिहास को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ‘वंदे मातरम’ गाते हुए अंग्रेजी शासन की लाठियां और गोलियां झेली थीं।

उन्होंने कहा कि 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार ‘वंदे मातरम’ गाया गया था और उस समय इसके शुरुआती दो पद ही गाए गए थे। उनके अनुसार इन दो पदों में मातृभूमि की वंदना की गई है और इन्हें लंबे समय से राष्ट्र की भावना के अनुरूप स्वीकार किया जाता रहा है।

     श्री बघेल ने कहा कि 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं की सहमति से शुरुआती दो अंतरों को ही गाने की परंपरा तय हुई थी। उन्होंने सवाल किया कि अब केंद्र सरकार इस व्यवस्था पर सवाल क्यों उठा रही है।

      उन्होंने कहा कि 24 जनवरी 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी स्पष्ट किया था कि ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद राष्ट्रगीत के रूप में मान्य होंगे। बघेल ने भाजपा नेताओं से सवाल करते हुए कहा कि यदि वे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत का दावा करते हैं तो बताएं कि उनके वैचारिक पूर्वजों में किसने ‘वंदे मातरम’ गाते हुए अंग्रेजों की लाठी या गोली खाई थी।

       श्री बघेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा कि यदि वे ‘वंदे मातरम’ के सभी छह अंतरे गाने की बात कर रहे हैं तो बिना टेलीप्रॉम्प्टर के पूरा गीत गाकर दिखाएं। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्षों बाद इस मुद्दे को उठाकर भाजपा इसे राजनीतिक विवाद का रूप दे रही है।