(संतोष यादव)
सुल्तानपुर 21 अक्टूबर।लगातार दो चुनावी हार के बाद चर्चा है कि सपा के पूर्व विधायक अरुण वर्मा 2027 में अपने पुराने चुनावी मैदान से हटकर नई जमीन तलाश रहे हैं। सियासी गलियारों में पहले लंभुआ इसके बाद सुल्तानपुर सीट को लेकर उनका नाम चर्चा में आया। पूर्व विधायक का पुराने क्षेत्र से क्यों मोहभंग हुआ यह तो वही जाने लेकिन सपा के कैडर से बिगड़े रिश्तों के चलते उनके सामने अपने पुराने चुनावी क्षेत्रों से वापसी की चुनौती जरूर है। अब नेतृत्व इनकी दावेदारी को किस तरह तवज्जो देता है, इस पर अन्य दावेदारों की भी नजर हैं।
2027 के विधानसभा चुनाव की आहट व जिले की पांच विधानसभा सीटों पर दावेदारों की सक्रियता बढ़ने के बीच अरुण वर्मा के अपने गृह क्षेत्र से हटकर किसी अपेक्षाकृत सुरक्षित सीट की तलाश करने की चर्चा अनायास नहीं है। वर्मा बाहुल्य कही जाने वाली सदर से लगातार दो चुनावों में हार का सामना कर चुके अरुण वर्मा 2017 में तीसरे, 2022 में दूसरे स्थान पर रहे। दोनों बार उनकी हार का अंतर बीस हजार के करीब ही रहा। जबकि 2022 में अपनी बिरादरी के साथ ही पिछड़े, दलित वर्ग में प्रमुख दलों से वे अकेले उम्मीदवार थे। सामने बीजेपी से राजबाबू उपाध्याय, (ब्राह्मण) कांग्रेस से अभिषेक सिंह एवं बसपा से ओपी सिंह (क्षत्रिय) प्रत्याशी होने का भी चुनावी लाभ इन्हें नहीं मिला।
इसके पीछे की वजह सत्ता में रहने के दौरान यादव, वर्मा दोनों वर्गों में उनके प्रति रही नाराजगी सामने आई। जो आज भी कम नहीं हुई है। इस नाराजगी का खामियाजा 2017, 2022 के चुनावों में वे भुगत चुके है। शायद यही वजह है कि 2027 में ’हार की हैट्रिक’ का डर उन्हें सता रहा है। गौरतलब है कि जिले की पांच विधानसभा सीटों में इसौली, सुल्तानपुर, लंभुआ, कादीपुर और सदर पर वर्ष 2012 में सपा का कब्जा था। इसौली से अबरार अहमद, सुल्तानपुर से अनूप संडा, लंभुआ से संतोष पांडे, कादीपुर से रामचंद्र चौधरी और सदर जयसिंहपुर से अरुण वर्मा विधायक चुने गए थे। 2017 में सपा ने अपने अधिकांश पुराने चेहरों पर ही भरोसा जताया। अबरार अहमद, अनूप संडा, संतोष पांडे और अरुण वर्मा को फिर टिकट मिला। रामचंद्र चौधरी कांग्रेस में चले गए उनकी जगह बेटा गठबंधन उम्मीदवार रहा। मगर सत्ता विरोधी लहर और बदले राजनीतिक समीकरण में इसौली को छोड़कर बाकी चार सीटों पर सपा को हार का सामना करना पड़ा।
2022 में भी तस्वीर बहुत नहीं बदली। स्वास्थ्य कारणों से इसौली में अबरार अहमद की जगह पूर्व सांसद ताहिर खान को मैदान में उतारा गया, जबकि कादीपुर में बसपा से सपा में आए पूर्व विधायक भगेलू राम को टिकट मिला। सुल्तानपुर, लंभुआ और जयसिंहपुर में अनूप संडा को चौथी बार, संतोष पांडे और अरुण वर्मा को लगातार तीसरी बार प्रत्याशी बनाया गया। इस चुनाव में भी इसौली को छोड़कर तीनों पुराने चेहरों को हार मिली। अब देखना यह होगा कि पार्टी नेतृत्व पुराने चेहरों पर फिर दांव लगाती है या लगातार हार के बाद प्रत्याशियों का चुनावी भूगोल ही बदल देती है। चर्चा है कि टिकट की घोषणा से पहले चल रही यह सियासी हलचल आने वाले महीनों में कई नए समीकरणों को जन्म दे सकती है।
सदर जयसिंहपुर छोड़ लंभुआ सुल्तानपुर पर नजर क्यों?
वर्मा बाहुल्य सीट मानी जाने वाली सदर-जयसिंहपुर के बजाय लंभुआ, सुल्तानपुर से अरुण वर्मा के दावेदारी की चर्चा सियासी हलकों में कई सवाल खड़े कर रही है। आखिर गृह क्षेत्र छोड़कर लंभुआ, सुल्तानपुर पर नजरें क्यों? लंभुआ से 2012 में विधायक रहे संतोष पांडे के नाम की चर्चा सुल्तानपुर और गौरीगंज सीटों से चुनाव लड़ने को लेकर भी है। वह 2017 और 2022 में चुनाव हार चुके हैं। ऐसे में लंभुआ की सियासत में नए दावेदारों के लिए जगह बनने की संभावनाएं देखी जा रही हैं। दूसरी ओर, 2017 में सदर सीट से विधायक रहे सीताराम वर्मा ने 2022 में लंभुआ से भाजपा प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की थी। इस बार लंभुआ से किसी ब्राह्मण प्रत्याशी को मैदान में उतारे जाने की चर्चा है। माना जा रहा है कि अरुण वर्मा इसी संभावित समीकरण में अपने लिए अवसर देख रहे हैं। उनकी सियासी सक्रियता का दूसरा सिरा सुल्तानपुर विधानसभा सीट से जुड़ा है। पूर्व विधायक चंद्रभद्र सिंह सोनू को सपा में शामिल कराने में संतोष पांडे के साथ अरुण वर्मा की भी महत्वपूर्ण भूमिका होने की चर्चा है। सोनू सुल्तानपुर सीट से चुनाव लड़ चुके हैं और इस बार भी दावेदारी कर रहे हैं। हालांकि, रामकुमार यादव हत्याकांड का मामला उनकी राह में चुनौती माना जा रहा है। ऐसे में अरुण वर्मा अपने लिए रास्ता देख रहे हैं यदि सुल्तानपुर से मौका मिलता है तो सोनू के राजनीतिक प्रभाव और सहयोग से उन्हें चुनावी बढ़त मिल सकती है।
अनूप संडा की दावेदारी भी मजबूत
सुल्तानपुर सीट पर अरुण वर्मा के लिए राह आसान नहीं है। यहां पूर्व विधायक अनूप संडा की दावेदारी भी मजबूत मानी जा रही है। वह 2007 और 2012 में विधायक चुने गए थे। इसके बाद 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मैदान में उतरे, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके। वर्ष 2022 में उन्हें एक हजार मतों के अंतर से हार का सामना करना पड़ा था। 2027 में अनूप संडा के लिए सुल्तानपुर सीट पर टिकट की दावेदारी और चुनावी समीकरण दोनों उनके समर्थक मुफीद मान रहे हैं।




