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कानफोड़ू डीजे का आतंक: आखिर कब जागेगा शासन-प्रशासन ?

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  (अशोक कुमार साहू)

त्योहारों की खुशियां जब कानफोड़ू शोर में तब्दील हो जाएं, आस्था के नाम पर कानून की धज्जियां उड़ने लगें और उत्सवों की चकाचौंध के बीच लोगों की सेहत और जिंदगी खतरे में पड़ने लगे, तो यह महज ध्वनि प्रदूषण का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शासन-प्रशासन की संवेदनशीलता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

    देशभर में त्योहारों, धार्मिक जुलूसों, शादियों और सामाजिक आयोजनों में कानफोड़ू डीजे तथा लाउडस्पीकरों का बेलगाम इस्तेमाल अब एक गंभीर सामाजिक समस्या बन चुका है। चिकित्सकों की चेतावनियां, सामाजिक संगठनों के अभियान और न्यायालयों के कड़े निर्देश भी इस शोर पर प्रभावी अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं। छत्तीसगढ़ से उत्तर प्रदेश तक नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक निष्क्रियता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर दूसरों की शांति, स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार की कीमत पर उत्सव मनाने की छूट कब तक मिलती रहेगी? क्या कानून केवल आदेश जारी करने के लिए हैं, या उन्हें जमीन पर लागू कराने की जिम्मेदारी भी किसी की है?

     छत्तीसगढ़ हो, उत्तर प्रदेश हो या देश का कोई अन्य राज्य, त्योहारों, धार्मिक जुलूसों, शादियों और सामाजिक समारोहों में तेज आवाज वाले डीजे का इस्तेमाल आम होता जा रहा है। कई आयोजनों में ध्वनि की तीव्रता इतनी अधिक होती है कि आसपास के घरों, अस्पतालों, विद्यालयों और व्यस्त सड़कों पर रहने वाले लोगों के लिए सामान्य जीवन बिताना तक मुश्किल हो जाता है। विडंबना यह है कि जिन आयोजनों का उद्देश्य समाज में उत्साह, एकता और उल्लास पैदा करना है, वे कई बार दूसरों के लिए परेशानी, भय और स्वास्थ्य संबंधी संकट का कारण बन जाते हैं।

       राजधानी रायपुर में हाल ही में संपन्न गणेशोत्सव के दौरान तेज लाउडस्पीकरों और विसर्जन जुलूसों में डीजे के इस्तेमाल को लेकर उठे सवाल इस स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हैं। दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन जुलूसों में भी कई स्थानों पर निर्धारित ध्वनि सीमाओं और न्यायालयों के निर्देशों की खुलेआम अनदेखी की गई।यदि राजधानी जैसे शहर में नियमों का प्रभावी पालन सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है, तो दूरस्थ जिलों और छोटे कस्बों में स्थिति का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

     ध्वनि प्रदूषण को अक्सर हल्के में लिया जाता है। आम धारणा है कि तेज आवाज कुछ समय तक असुविधा पैदा करती है और आयोजन समाप्त होते ही समस्या खत्म हो जाती है। लेकिन चिकित्सा विज्ञान की दृष्टि से यह सोच सही नहीं है।तेज ध्वनि और भारी बेस वाले डीजे के आसपास कुछ लोगों की तबीयत अचानक बिगड़ने और मौत होने की घटनाएं भी सामने आई हैं। हालांकि, ऐसी प्रत्येक घटना में मृत्यु का कारण केवल डीजे की आवाज या उसके कंपन को मान लेना उचित नहीं है। इसके लिए चिकित्सकीय जांच और वैज्ञानिक साक्ष्य आवश्यक हैं। फिर भी, इन घटनाओं को नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी। अत्यधिक शोर, शारीरिक तनाव और पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के संभावित संबंधों की गंभीरता को देखते हुए सावधानी बरतना जरूरी है।

      पिछले कुछ महीनों में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में संजय जायसवाल नामक 40 वर्षीय व्यक्ति को डीजे वाहन के पास तबीयत बिगड़ने के बाद गंभीर ब्रेन हैमरेज होने का मामला सामने आया। इसी तरह उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में गणेश विसर्जन यात्रा के दौरान एक विद्यालय के पास तेज आवाज में बज रहे डीजे के बीच सात वर्षीय छात्रा के अचानक अचेत होने और अस्पताल ले जाते समय उसकी मृत्यु की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। मुजफ्फरनगर के अहरोड़ा गांव में दिसंबर 2025 में एक बारात के दौरान डीजे बजने के बीच एक व्यक्ति की दिल का दौरा पड़ने से मौत की खबर सामने आई थी। सुल्तानपुर में अक्टूबर 2025 में दुर्गा पूजा जुलूस के दौरान दिनेश चंद्र बरनवाल की मृत्यु का मामला भी चर्चा में रहा। इससे पहले सुल्तानपुर में दरियापुर के रमाशंकर गुप्ता की 2022 में और चौक की शीला कसौंधन की 2023 में दुर्गा प्रतिमा विसर्जन के दौरान हृदयाघात से मृत्यु की घटनाएं सामने आई थीं।

        मध्य प्रदेश के बैतूल में 17 वर्षीय बीएससी छात्रा प्रतीक्षा वर्मा की गणेश विसर्जन कार्यक्रम के दौरान अचानक तबीयत बिगड़ने और मृत्यु की घटना भी इसी व्यापक चिंता का हिस्सा है। ऐसे मामलों में मृत्यु के वास्तविक कारणों की पुष्टि चिकित्सकीय जांच से ही हो सकती है, लेकिन इन घटनाओं से उठने वाला बुनियादी प्रश्न स्पष्ट है कि क्या उत्सवों की खुशी के लिए लोगों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को जोखिम में डालना उचित है?

      ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए भारत में कानूनी प्रावधानों की कमी नहीं है। ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत विभिन्न क्षेत्रों के लिए अधिकतम परिवेशी ध्वनि स्तर निर्धारित हैं। सामान्य आवासीय क्षेत्रों में दिन के समय 55 और रात में 45 डेसिबल की सीमा निर्धारित की गई है। औद्योगिक और वाणिज्यिक क्षेत्रों के लिए अलग मानक हैं। अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और न्यायालयों के आसपास निर्धारित शर्तों के अनुसार मौन क्षेत्र घोषित किए जा सकते हैं।

       सामान्य नियम के अनुसार रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और सार्वजनिक ध्वनि विस्तारक प्रणालियों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। निर्धारित शर्तों के अंतर्गत सीमित अवसरों पर मिलने वाली छूट को इस नियम का सामान्य विकल्प नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार, किसी डीजे या ध्वनि विस्तारक यंत्र का इस्तेमाल अनुमति, समय और निर्धारित ध्वनि सीमा के अधीन ही किया जा सकता है।

      सवाल यह है कि जब नियम इतने स्पष्ट हैं, तो उनका उल्लंघन खुलेआम कैसे होता है? क्या पुलिस और प्रशासन को तेज आवाज सुनाई नहीं देती? क्या आयोजनों के मार्ग और समय की जानकारी पहले से उपलब्ध नहीं होती? क्या अधिकारियों को यह पता नहीं होता कि किन स्थानों पर हर साल ध्वनि प्रदूषण की समस्या पैदा होती है? इन सवालों का जवाब प्रशासनिक व्यवस्था को देना चाहिए।

     किसी नागरिक की शिकायत मिलने के बाद ही कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। त्योहारों और जुलूसों का कार्यक्रम पहले से तय रहता है। ऐसे में पुलिस, जिला प्रशासन और संबंधित निकायों को अग्रिम कार्ययोजना तैयार करनी चाहिए। ध्वनि की तीव्रता मापने वाले उपकरणों की उपलब्धता, निर्धारित समय पर निगरानी, नियम तोड़ने वाले संचालकों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई और जब्त उपकरणों के संबंध में पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना आवश्यक है।

      ध्वनि प्रदूषण का मुद्दा लंबे समय से न्यायपालिका के विचाराधीन रहा है। उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न फैसलों में स्पष्ट किया है कि शांतिपूर्ण जीवन, नींद और स्वास्थ्य की रक्षा नागरिकों के अधिकारों से जुड़ी है। किसी व्यक्ति या संस्था को लाउडस्पीकर के माध्यम से दूसरों को अनिवार्य रूप से अपनी आवाज सुनाने का असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता। धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह भी नहीं है कि दूसरे नागरिकों के स्वास्थ्य और शांति के अधिकारों की अनदेखी की जाए।

       छत्तीसगढ़ में ध्वनि प्रदूषण को लेकर उच्च न्यायालय की सख्ती और अवैध रूप से तेज बजने वाले डीजे के विरुद्ध कार्रवाई की मांग ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी ध्वनि प्रदूषण से जुड़े मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता सामने आई है। हालांकि, इन मामलों में पारित आदेशों और सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की वास्तविक स्थिति का आकलन संबंधित न्यायालयों के आधिकारिक आदेशों तथा सरकारी अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए।

     सुल्तानपुर में दुर्गा पूजा और प्रतिमा विसर्जन के दौरान होने वाले शोर को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। यहां दुर्गा पूजा के आयोजन और विसर्जन कार्यक्रम कई दिनों तक चलते हैं। विसर्जन मार्गों पर रहने वाले बुजुर्गों, हृदय रोगियों, बच्चों और अन्य संवेदनशील लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कुछ लोगों को शोर से बचने के लिए अपने घरों से दूसरे स्थानों पर जाना पड़ता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चिंता का विषय है।

     शहर की संस्था ‘घर सुल्तानपुर फाउंडेशन’ ने डीजे के अनियंत्रित इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए प्रयास किए हैं। गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान आयोजकों द्वारा इन प्रयासों की अनदेखी किए जाने के बाद संस्था की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में जनहित याचिका दाखिल की गई है।राघवेन्द्र प्रताप सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में न्यायालय के निर्देशों का मूल संदेश यही है कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन किए जा सकते हैं, लेकिन उनके नाम पर ध्वनि प्रदूषण के निर्धारित मानकों का उल्लंघन स्वीकार्य नहीं है। ऐसे आदेशों की वास्तविक उपयोगिता इस बात से तय होगी कि उनका जमीन पर कितना पालन कराया जाता है।

     धार्मिक आयोजन भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गणेशोत्सव, दुर्गा पूजा, दशहरा, ईद, गुरुपर्व, विवाह समारोह और अन्य सामाजिक अवसर लोगों को एक-दूसरे से जोड़ते हैं। इन आयोजनों पर रोक लगाने की मांग करना समस्या का उचित समाधान नहीं है। आवश्यकता आयोजनों को प्रतिबंधित करने की नहीं, बल्कि उन्हें अनुशासित और जिम्मेदार बनाने की है।

     धर्म, जाति, समुदाय या राजनीतिक प्रभाव के आधार पर नियमों के पालन में भेदभाव नहीं होना चाहिए। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, विवाह समारोह, जुलूस और सार्वजनिक कार्यक्रम, सभी पर लागू नियमों का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। आस्था का सम्मान तभी सार्थक है, जब वह दूसरों के अधिकारों के प्रति सम्मान के साथ जुड़ा हो।

      संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है। न्यायिक व्याख्याओं में शांतिपूर्ण जीवन और स्वास्थ्य के महत्व को भी रेखांकित किया गया है। किसी नागरिक को केवल इसलिए असहनीय शोर सहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि उसके आसपास कोई धार्मिक या सामाजिक आयोजन हो रहा है। उत्सव मनाने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करना शासन की जिम्मेदारी है।

       ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए सबसे पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। त्योहारों से पहले जिला स्तर पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। आयोजकों और डीजे संचालकों को निर्धारित ध्वनि सीमा, समय और अनुमति की शर्तों की जानकारी दी जाए। प्रत्येक बड़े जुलूस के लिए जिम्मेदार आयोजक की पहचान हो और उल्लंघन की स्थिति में जवाबदेही तय की जाए।

       पुलिस को केवल शिकायतों का इंतजार नहीं करना चाहिए। संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित निगरानी, ध्वनि मापन और नियमों के उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था होनी चाहिए। बार-बार नियम तोड़ने वालों के खिलाफ कानून के अनुरूप कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए। जहां आवश्यक हो, उपकरण जब्त किए जाएं और संबंधित अनुमतियों को निलंबित या रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जाए। अस्पतालों, विद्यालयों और आवासीय क्षेत्रों के आसपास विशेष सतर्कता बरती जाए।

      इसके साथ ही आयोजकों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। आधुनिक ध्वनि तकनीक का उपयोग निर्धारित सीमाओं के भीतर किया जा सकता है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और अनुशासित जुलूसों के माध्यम से भी उत्सव की भव्यता कायम रखी जा सकती है। खुशी व्यक्त करने के लिए इतनी तेज आवाज पैदा करना आवश्यक नहीं है कि दूसरे लोगों की नींद, स्वास्थ्य और सामान्य जीवन प्रभावित हो।

       स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और स्थानीय निकायों को ध्वनि प्रदूषण के स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों के प्रति जनजागरूकता बढ़ानी चाहिए। नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने के लिए सरल और प्रभावी व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए, ताकि शिकायतकर्ता को बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। प्रशासन को भी शिकायतों पर हुई कार्रवाई का सार्वजनिक विवरण देना चाहिए।

        त्योहारों की खुशियां किसी दूसरे की पीड़ा का कारण नहीं बननी चाहिए। धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं की रक्षा करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी नागरिकों के स्वास्थ्य, शांति और सम्मान की रक्षा करना भी है। कानफोड़ू डीजे की बढ़ती समस्या पर अब केवल बयानबाजी और औपचारिक आदेशों से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें नियम तोड़ने वालों को राजनीतिक या सामाजिक संरक्षण न मिले और कानून का पालन हर परिस्थिति में सुनिश्चित हो। आखिरकार, सभ्य समाज की पहचान शोर की ऊंचाई से नहीं, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने प्रत्येक नागरिक के जीवन, स्वास्थ्य और अधिकारों का कितना सम्मान करता है।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।