न केवल देश में बल्कि समूची दुनिया में पत्रकारिता नए-लए रूपों में सामने आ रही है और समाज को प्रभावित कर रही है। आजादी के बाद की लगभग 50 वर्षों तक अखबारी पत्रकारिता प्रमुख थी। जिसमें दैनिक, साप्ताहिक अखबार होते थे। 1980 में कुछ साप्ताहिक, पाक्षिक पत्रिकाएं भी पत्रकारिता के रूप में शुरू हुई, जैसे दिनमान, रविवार आदि। आकाशवाणी भी एक माध्यम था पर वह सरकार से नियंत्रित रहती थी। इसलिए 1970 के दशक में बीबीसी भारत में आकाशवाणी से अधिक विश्वसनीय मानी गई। 1980 के दशक में टेलीविजन की शुरुआत हुई और शीघ्र इस दृश्य मीडिया ने अखबार व आकाशवाणी को पीछे छोड़ दिया। कालांतर में इसमें भी निजी क्षेत्र ने प्रवेश किया तथा आज तक जैसे न्यूज चैनल बहुत लोकप्रिय हुए। 1990 के दशक में इंटरनेट और मोबाइल फोन का प्रवेश भारत में हुआ और धीरे-धीरे कुछ ही वर्षों में एक विशाल तकनीक और एक प्रकार का व्यापार बन गया। यद्यपि प्रिंट मीडिया की जरूरत और उपयोगिता अभी भी है और आगे भी रहेगी। परंतु इसमें कोई दो मत नहीं है कि इस नई तकनीक ने प्रिंट मीडिया की पहुंच, साख और व्यापार को काफी पीछे धकेल दिया है। अब छापे गए अखबारों की स्थिति यह है कि रेलवे स्टेशनों पर जहां सुबह से लेकर शाम तक अखबार बिकते व खरीदे जाते थे अब शायद ही कोई अखबार बेचने वाला हाकर या किसी बिक्री काउंटर पर अखबार मिले। यह स्थिति मैंने पटना, लखनऊ, दिल्ली आदि रेलवे स्टेशनों पर स्वतः देखी है। अखबारों की बिक्री बहुत कम हुई है। इसलिए अब अधिकांश अखबारों ने अपने डिजिटल संस्करण भी निकालना शुरू कर दिए हैं।
मोबाइल व इंटरनेट प्रभुओं के इस धरती पर अवतरण के बाद अब लगभग हर व्यक्ति सोशल मीडिया के माध्यम से एक पत्रकार जैसा बन गया है। जब मोबाइल देश में आए थे यानि 1984-85 के आसपास तब इनका विज्ञापन आता था कि कर लो दुनिया मुट्ठी में। और अब यह नारा न केवल चरितार्थ हुआ है, बल्कि दो तरह से चरितार्थ हो गया है-एक मोबाइल के रूप में दुनिया व्यक्ति की मुट्ठी में है और दूसरी तरफ मोबाइल ने व्यक्ति को मुट्ठी में बंद कर दिया है। अब व्यक्ति जिसे सामाजिक प्राणी कहा जाता था वह समाज में संपर्क संवाद करता था पर अब वह दुनिया से भौतिक रूप से कटकर केवल अपनी मुट्ठी तक सिकुड़ गया है। इस तकनीक में सही या गलत सूचनाओं का अपार भंडार है परंतु वे सही हैं या गलत इसे तय करना बहुत कठिन हो गया है। आरंभ में इंटरनेट से फेसबुक, व्हाटसएप शुरू हुये। उसके बाद अब तो एक्स, इंस्टाग्राम रील-मीम और कई अन्य प्लेटफार्म हैं जिन्होंने सारी दुनिया को आज आच्छादित कर लिया है। आरंभ में यह तकनीक और इसके उत्पाद कुछ आजाद लगते थे परंतु अब तो बाजार व व्यापार ने इन्हें चारों ओर से घेर कर बंदी जैसा बना लिया है। अब इसमें भी विज्ञापन है तथा बूस्टर कंपनियां आपको उनके द्वारा चाहे गए पैसा देने पर एक दिन में लाखों दर्शक (सबस्क्राइबर) दे सकती है। इन दर्शकों को भी शायद कुछ पैसा मिलता होगा। इनकी संख्या के आधार पर चर्चित समाचार या सूचना देने वाले पत्रकार यूटयूबर्स को अच्छी खासी रकम मिलती है। यह डिजिटल मीडिया का नया स्वरूप सामने आया है। डिजिटल मीडिया में भी अब व्हाटसएप फेसबुक आदि बहुत पीछे चले गए हैं। अब तो राजनीतिक, व्यापारिक, व्यक्तिगत व सामूहिक प्रचार के लिये इंस्टाग्राम एक्स, मीम, रील जैसे नए-नए प्लेटफार्म हैं जो प्रसारण के बड़े माध्यम हैं और यह नए शस्त्र इंस्टाग्राम, ईमेल आदि बहुत ताकतवर व अनियंत्रित हो चुके हैं । यह सरकारों को बनाने बिगाड़ने के भी सशक्त माध्यम बन रहे हैं। मिस्र, श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश आदि में सत्ता परिवर्तन के लिये यह सोशल मीडिया व इसके प्रायोगिक उत्पाद इंटरनेट इंस्टाग्राम आदि ने प्रमुख भूमिका अदा की है। इन पर अब सरकारों का नियंत्रण भी नहीं है तथा एक अर्थ में यह स्व नियंत्रित एवं स्वअनुशासित जैसी विद्या हो गई है। यानि इनका क्या इस्तेमाल होगा, कैसे होगा, कौन करेगा आदि सभी प्रश्नों का उत्तर उन्हें देना या नहीं देना यह इन तकनीक के प्रयोगकर्ता के हाथ में है। वह शब्दों व तमगों का प्रयोग भी अपने-अपने हित के लिए होता है और तदनुरूप शब्द गढ़े जाते हैं।
आजकल देश में गोदी मीडिया, अंधभक्त शब्द का भी प्रचलन जोरों पर है तथा यह एक समूह विशेष के ब्रांड नाम या आरोप के पर्याय बन गए हैं। जैसे एक जमाने में यूरोप या ब्रिटिश संसद में वाम या दक्षिण वामपंथी, दक्षिणपंथी शब्द गढ़े गये थे व प्रचारित किये गये थे। अब भारत में गोदी मीडिया, अंधभक्त आदि शब्दों का प्रचलन तेजी से शुरू हुआ है जबकि अगर तार्किक ढंग से विचार किया जाए तो दोनों ही पक्ष एक अर्थ में अंधभक्त या गोदी मीडिया के पर्याय या प्रतिरूप है। कांग्रेस तथा कम्युनिस्ट व कुछ अन्य दलों के समर्थकों ने अपने से भिन्न इतर भाजपा समूह को या जो सरकार समर्थक हैं उसे अंधभक्त तथा उसके पक्षधर मीडिया को गोदी मीडिया का विश्लेषण चिपका दिया है। यद्यपि अगर हम ठीक से विश्लेषण करें तो दूसरा पक्ष याने कांग्रेस व उसका पक्षधर मीडिया भी क्या अंधभक्त या गोदी मीडिया जैसा नहीं है?
दरअसल इस समय देश में दो प्रकार के मीडिया उभरे हैं। एक जो सत्ता पक्ष का आंख बंदकर सभी बातों व गलत का समर्थन करते हैं उसे मैं मोदी मीडिया मानता हूँ। यानी देश का मीडिया अपवाद छोड़कर मोदी मीडिया व दूसरा जो केवल मोदी विरोध का समर्थक है, वह गोदी मीडिया के दो खानों में बंट गया है और यह दोनों एक-दूसरे पर इतने आक्रामक हैं कि किसी तटस्थ निष्पक्ष या भिन्न आवाज को पूरी तरह दबा देते हैं या फिर अपने से भिन्न दूसरे पक्ष का अघोषित हिस्सा बना देते हैं। वैसे तो मीडिया ने स्वतः ही अपने पेट, सुविधा या संपन्नता के जीवन के लिए अपने पूंजीपति मालिकों के द्वारा बनाई गई नीति को स्वीकार कर लिया है। जिसे सिक्स सी कहा जाता है। 1- क्रिकेट, 2. क्राइम, 3. काम से व्यापार, 4 करप्शन, 5 सिनेमा, 6. कल्चर धर्म पूजा आदि को कला संगीत कहा जाता है याने राजनीति को प्रिंट या इलेक्ट्रानिक मीडिया ने मुख्य धारा से लगभग बहिष्कृत कर दिया है। इससे भी अधिक दूसरा कारण ये है कि मीडिया कर्मियों की नौकरी पक्की नहीं है, मजीठिया बेजवोर्ड, संसद, मंत्रिमंडल, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद भी उस रूप में लागू नहीं हो सका जैसा होना चाहिए था। और कई जगह तो मालिकों ने लागू होने के पहले ही पत्रकारों से इस्तीफे लिखवाकर रख लिए। समाचार एजेंसियों पर जिस प्रकार सत्ता के हमले हो रहे हैं उन्हें या तो समाप्त करने का या दास बनाने के उपाय हो रहे हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। यूएनआई व अन्य बड़े-बड़े दैनिक अखबारों से बड़ी संख्या में पत्रकार निकाल दिए गए। कई संस्थाओं की संपत्तियों को घाटा पूरा करने के नाम पर पूंजीपतियों को बेच दिया गया। कई पत्रकार भूख, घुटन, अपमान के चलते मौत के शिकार हो गए। हालांकि इसके लिए पत्रकार समूह के बड़े पदों पर बैठे नामधारी पत्रकार भी जवाबदार हैं जो स्वतः तो मोटी-मोटी तन्ख्वाह लेते हैं और नीचे के संवाददाताओं से मामूली सी पगार में काम लेते हैं और अस्थाई बनाए रखते हैं। संपादक नाम की संस्था वास्तव में मर चुकी है। केवल शब्दों में लिखने में जरूर है पर वास्तव में वह भी मालिकों के जनसंपर्क अधिकारी जैसी बन चुकी है।
अधिकांश तथाकथित बड़े अखबारों में मालिक या उनके बेटी बेटियां ही संपादक बन चुके हैं, उन्हीं के नाम छप रहे हैं। खबरें क्या देना है, कैसे देना है यह पाठ प्रतिदिन बैठकों में पढ़ाया जाता है। पत्रकारों संवाददाताओं का विज्ञापन का कोटा तय होने लगा है। याने इतनी राशि का विज्ञापन देना नौकरी की अनिवार्य शर्त है। उसका कुछ हिस्सा लाने वाले को कमीशन के रूप में भी दिया जाता है। ताकि उसकी दिलचस्पी भी रहे और अलिखित बाध्यता भी । कई बड़े-बड़े नामधारी अखबारों के जिले के व स्थानीय संस्करणों को तो एक निश्चित राशि पर फ्रेंचाइजी जैसा दे दिया जा रहा है । इतना पैसा दो बकाया तुम पर जैसे बने पैसे कमाओ, लूटो जिसे जो करना है करो। अगर पत्रकार को आर्थिक आजादी नहीं होगी, पेट भूखा रहेगा तो आजाद या ईमानदार पत्रकारिता की कल्पना करना भी कठिन है। हालांकि पत्रकारों में भी एक ऐसा समूह उभरा है जो घोर अनैतिक व धंधेबाज बन रहा है। उसे पैसा ही सर्वोपरि है। वह समाचार छापने के पैसे लेते हैं। अपवाद छोड़कर ऊपर से नीचे तक पत्रकारिता में पैसे का चलन शुरू हो गया है। चुनाव में बड़े- बड़े पैकेज लेते हैं, उन पैसे देने वालों के पक्ष में लिखते हैं। मतदाता को गुमराह करने के लिए पैसों वाले दलों व प्रत्याशियों को चुनाव शुरू होते ही मुख्य प्रतिद्वंद्वी बना दिया जाता है। उन्हीं के नाम व उनके बीच ही टक्कर बताई जाती है । ईमानदार दलों या प्रत्याशियों का तो नाम भी नहीं छपता । बड़े-बड़े दलों के लोगों की पत्रकार वार्ताएं बड़े-बड़े पांच सितारा होटलों में होती है । जिन पर लाखों रुपये खाने पीने पर खर्च होते हैं।
ईमानदार व गरीब राजनीतिक कार्यकर्ता या प्रत्याशी से तो संवाददाता पत्रकार मित्रों से आमतौर पर फोन पर भी बात नहीं होती। संवाददाता भी कभी मालिक या संपादक के इशारों पर, कभी अपने निजी कारण के चलते व्यक्ति या संस्थाओं के खिलाफ झूठे समाचार की मुहिम चलाते हैं या तो उन्हें कद से बड़ा बना देते हैं या फिर दृष्टि ओझल कर देते हैं। आजकल अखबारों ने बीट सिस्टम शुरू किया है जो सक्षम व सत्ताधारी पार्टियों के लिये विशेष संवाददाता है। जो ईमानदार, गरीब या सत्ताविहीन संस्थाएं या व्यक्ति हैं उनके लिए मीडिया में कोई स्थान नहीं है। कृत्रिम मुद्दों पर राजनीति को पक्ष विपक्ष में बांटा जाता है ताकि बदलाव अगर कभी हो तो उन्हीं व्यक्तियों या संगठनों में सुरक्षित रहे। इसी प्रकार आजकल संस्करण का खेल है। छोटे-छोटे कस्बों के लिये संस्करण निकल रहे हैं। उनसे विज्ञापन व पाठक मिलते हैं। स्थानीय लोगों के छपने की इच्छा, स्थानीय समाचारों का प्रकाशन भी किया जा रहा है । पर इनका प्रभाव अब वयवस्था व तंत्र पर बिलकुल भी नहीं पड़ता। बड़ी-बड़ी घटनायें स्थानीय समाचार बनकर संस्करणों में दबकर खत्म हो जाती है। कोई कितना भी विचारवान व्यक्ति या नेता हो, चरित्रवान हो, उसे संस्करण के एक कोने में सीमित कर दिया जाता है, तथा धनबल, सत्ताबल वाले भ्रष्ट व मूल्यविहीन व्यक्ति देश, प्रदेश के नेता बन जाते हैं। कुल मिलाकर राजनीति, समाज, मीडिया, धर्म, शिक्षा सभी पतन के गर्त में धंस रही है। जिनका काम चेतना जगाना, समाज को मूल्यों की ओर प्रेरित करना होना चाहिए वे धर्म को धंधा, अंधविश्वास, राजनीति को व्यापार और बंधुआ मजदूरी की पत्रकारिता को मुनाफा और दलाली की ओर धकेल रहे हैं इससे कैसे मुक्ति मिले, पत्रकारिता का लोकधर्म कैसे बचे ये यक्ष प्रश्न है जो अभी तक अनुत्तरित है ?
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




