(डॉ. ए.के.सिंह)
उत्सव की खुशी तभी सार्थक है, जब वह किसी दूसरे के लिए परेशानी और पीड़ा का कारण न बने। लेकिन आज उत्सवों में यह समझ कहीं पीछे छूटती जा रही है। डीजे का शोर हमारी खुशियों का स्थायी हिस्सा बनता जा रहा है। शादी हो, तिलक हो, धार्मिक आयोजन हो या विसर्जन जुलूस, तेज आवाज और भारी बेस के बिना जैसे उत्सव अधूरा है। किसे परेशानी हो रही है, किसकी नींद टूट रही है और किसका स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है, इसकी परवाह कम ही दिखाई देती है। बच्चे, बुजुर्ग, बीमार और विद्यार्थी इस शोर की सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं। कई बार इसके परिणाम बेहद गंभीर भी हो सकते हैं। सवाल उत्सव मनाने के अधिकार का नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन और अधिकारों के सम्मान का है।
सुप्रसिद्ध सर्वोदय विचारक विनोबा भावे ने अपनी पुस्तक ‘लोकशक्ति’ में लिखा है कि जब तक हम गुलाम थे, तब तक स्वराज का महत्व था। अब स्वराज मिल चुका है, इसलिए लोकशक्ति जगाने की जरूरत है। जिस समाज के लोग अपनी हर जरूरत के लिए सरकार पर निर्भर रहते हैं, वह समाज कभी सशक्त नहीं बन सकता। समाज की समस्याओं का समाधान भी समाज की सामूहिक शक्ति से ही संभव है। इसी सोच के साथ अनेक संस्थाएं और संगठन सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्य करते हैं। सुल्तानपुर में भी कई समितियों ने मिलकर संयुक्त सेवा समिति बनाई है। समिति पिछले कुछ वर्षों से लोकशक्ति जगाने और सामाजिक समस्याओं के समाधान के प्रयास कर रही है। हमारे उत्सवों और आयोजनों में पर्यावरण को असंतुलित करने वाली गतिविधियों को कैसे कम किया जाए, यह भी इन प्रयासों का हिस्सा है। ऐसी ही एक बड़ी समस्या है डीजे का बढ़ता शोर और उससे पैदा होने वाला ध्वनि प्रदूषण।
डीजे संस्कृति का आगमन और विस्तार
उत्तर प्रदेश में डीजे संस्कृति का विस्तार मुख्य रूप से 1990 के दशक के उत्तरार्ध और 2000 के दशक की शुरुआत में हुआ। 1990 के दशक के अंत में लखनऊ, कानपुर, आगरा और नोएडा जैसे बड़े शहरों के होटल, क्लब और निजी पार्टियों में डीजे साउंड सिस्टम का इस्तेमाल शुरू हुआ। 2000 के दशक की शुरुआत में सीडी प्लेयर, सस्ते एम्पलीफायर और मिक्सर आने से मोबाइल डीजे का चलन बढ़ा। धीरे-धीरे इसने शादियों और तिलक समारोहों में पारंपरिक ब्रास बैंड और शहनाई की जगह लेनी शुरू कर दी। वर्ष 2000 से 2010 के बीच डीजे हर गली-मोहल्ले, शादी और त्योहार का हिस्सा बन गया।
डिस्क जॉकी शब्द की शुरुआत
डिस्क जॉकी शब्द का इतिहास भी दिलचस्प है। अमेरिकी रेडियो उद्घोषक वाल्टर विनचेल ने 1935 में पहली बार इस शब्द का इस्तेमाल किया था। उन्होंने इसका प्रयोग रेडियो प्रस्तोता मार्टिन ब्लॉक के लिए किया था, जो रिकॉर्ड बजाते थे। 1943 में इंग्लैंड के जिमी सैविल ने ग्रामोफोन रिकॉर्ड बजाकर नृत्य की लाइव पार्टी आयोजित की। इसे शुरुआती डीजे डांस पार्टियों में गिना जाता है। वर्ष 1947 में जिमी सैविल ने दो टर्नटेबल एक साथ जोड़कर लगातार संगीत बजाने की शुरुआत की। इससे संगीत के बीच रुकावट खत्म करने की तकनीक विकसित हुई।
ध्वनि क्या और इसकी सीमा कितनी?
आवृत्ति के आधार पर ध्वनि की तीन श्रेणियां हैं। मनुष्य के कान 20 हर्ट्ज से 20,000 हर्ट्ज तक की ध्वनि तरंगें सुन सकते हैं। इसे श्रव्य ध्वनि कहते हैं। 20,000 हर्ट्ज से अधिक आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगें पराश्रव्य कहलाती हैं। चमगादड़ लगभग एक लाख हर्ट्ज की आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों को सुन सकता है। इसी तरह 20 हर्ट्ज से कम आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगें अवश्रव्य कहलाती हैं। ध्वनि की तीव्रता मापने की इकाई डेसीबल है। जब ध्वनि की तीव्रता बहुत बढ़ जाती है, तो वह कर्णप्रिय नहीं रहती। उसे शोर कहते हैं। सामान्य बातचीत की ध्वनि लगभग 55 से 60 डेसीबल होती है। विभिन्न देशों में शोर की स्वीकार्य सीमाएं अलग-अलग हैं।
ध्वनि प्रदूषण के दुष्प्रभाव
ध्वनि प्रदूषण केवल कानों को ही प्रभावित नहीं करता। इसका असर मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक क्षमता और सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है। लगातार तेज शोर से बेचैनी, अशांति और चिड़चिड़ापन बढ़ता है। मानसिक और शारीरिक थकान महसूस होती है। लंबे समय तक शोर के संपर्क में रहने से नींद प्रभावित होती है। मानसिक तनाव, अवसाद और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसका असर शरीर की हार्मोन प्रणाली पर भी पड़ता है। अनिद्रा, अपच, कब्ज और पेट संबंधी समस्याएं भी लंबे समय तक शोर के संपर्क से जुड़ी हो सकती हैं। सुपरसोनिक विमान जब ध्वनि अवरोध को पार करता है, तो तेज गर्जना जैसी आवाज पैदा होती है। इसे सोनिक बूम कहते हैं। इसकी तीव्रता इतनी अधिक हो सकती है कि खिड़कियों के शीशे तक चटक जाएं। इसका प्रभाव हृदय रोगियों और गर्भवती महिलाओं के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है।
बड़ा खतरा
90 डेसीबल से अधिक तीव्रता वाली ध्वनि लंबे समय तक सुनने से कानों को नुकसान पहुंच सकता है। यह नुकसान अस्थायी भी हो सकता है और स्थायी भी। इसका स्तर ध्वनि की तीव्रता, संपर्क की अवधि और व्यक्ति की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। तेज डीजे के संपर्क में आने के बाद कई लोगों को कानों में सीटी बजने या लगातार सनसनाहट महसूस होने लगती है। इसे टिनिटस कहते हैं। लगातार तेज आवाज के संपर्क से सुनने की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है। शोर के कारण नींद पूरी नहीं होती। बेचैनी, थकान और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता घटती है। उसकी रोजी-रोटी प्रभावित होती है। परिवार के दूसरे सदस्यों को भी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। इस तरह ध्वनि प्रदूषण एक व्यक्ति की नहीं, पूरे समाज की समस्या बन जाता है। अत्यधिक शोर और कंपन गर्भवती महिलाओं के लिए नुकसानदेह हो सकते हैं। तेज आवाज के प्रति नवजात शिशुओं के कान विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं। इसलिए उनके आसपास तेज ध्वनि से बचना जरूरी है।
नियम बने नुकसान रोकने को
डीजे में इस्तेमाल होने वाले भारी बेस और सबवूफर हवा में तीव्र कंपन पैदा करते हैं। इसका असर आसपास की इमारतों, खिड़कियों और वातावरण पर पड़ सकता है। तेज आवाज के साथ लगातार कंपन लोगों को असहज कर सकता है। ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए देश में नियम बने हुए हैं। उत्तर प्रदेश में भी डीजे के अत्यधिक शोर और रात में तेज आवाज को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय और राज्य सरकार ने समय-समय पर सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के तहत रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और सार्वजनिक ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल पर सामान्यतः प्रतिबंध है। निर्धारित परिस्थितियों में सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से सीमित छूट दी जा सकती है। ध्वनि की तीव्रता के लिए भी क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग सीमाएं तय हैं। नियमों का उद्देश्य उत्सवों पर रोक लगाना नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाए बिना उनका आयोजन सुनिश्चित करना है।
ध्वनि प्रदूषण रोकना जरूरी
ध्वनि प्रदूषण के मानवीय स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है। ध्वनि विस्तारक यंत्रों का प्रयोग केवल आवश्यकता के अनुसार और सीमित क्षेत्र में किया जाना चाहिए। आवाज की तीव्रता न्यूनतम रखी जाए और निर्धारित समय सीमा का पालन हो। भारी बेस और अत्यधिक कंपन पैदा करने वाले उपकरणों के इस्तेमाल पर नियंत्रण जरूरी है। कारखानों में तेज आवाज पैदा करने वाली मशीनें ध्वनि अवरोधक भवनों में रखी जाएं या उनमें ध्वनि अवशोषक लगाए जाएं। मशीनों में ध्वनि शामक लगाए जाएं और उनका समय-समय पर रखरखाव किया जाए। 27 नवंबर 2001 को सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखे फोड़ने का समय शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक निर्धारित किया था। इसके बावजूद नियमों का पूरी तरह पालन नहीं हो सका। पटाखों से हर साल अनेक लोग घायल होते हैं। आग लगने से जान-माल का नुकसान भी होता है। इनके विस्फोट से ध्वनि और वायु प्रदूषण दोनों फैलते हैं।
स्वीकार्य ध्वनि स्तर
भारतीय मानक संस्थान द्वारा विभिन्न क्षेत्रों के लिए ध्वनि के स्वीकार्य स्तर निर्धारित किए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बाहरी ध्वनि का औसत स्तर 25 से 35 डेसीबल, उपनगरीय क्षेत्रों में 30 से 40 डेसीबल और नगरीय आवासीय क्षेत्रों में 35 से 40 डेसीबल होना चाहिए। नगरीय आवासीय एवं व्यापारिक क्षेत्रों में यह सीमा 40 से 50 डेसीबल तथा औद्योगिक क्षेत्रों में 50 से 60 डेसीबल तक निर्धारित है। इसी तरह भवनों के भीतर भी ध्वनि की स्वीकार्य सीमाएं अलग-अलग हैं। रेडियो और टेलीविजन स्टूडियो में 25 से 30 डेसीबल, संगीत कक्ष में 30 से 35 डेसीबल तथा ऑडिटोरियम, हॉस्टल, सम्मेलन कक्ष और छोटे कार्यालयों में 35 से 40 डेसीबल का स्तर निर्धारित है। कचहरी, निजी कार्यालय और पुस्तकालयों में यह 40 से 45 डेसीबल, सार्वजनिक कार्यालयों, बैंकों और स्टोर में 45 से 50 डेसीबल तथा रेस्टोरेंट में 50 से 55 डेसीबल तक होना चाहिए।
डीजे के शोर बीच सांसें थमी
ध्वनि प्रदूषण के खतरे केवल आंकड़ों और वैज्ञानिक तथ्यों तक सीमित नहीं हैं। इसके कुछ अनुभव बेहद विचलित करने वाले हैं। पिछले वर्ष मूर्ति विसर्जन के दौरान सुल्तानपुर नगर के चौक से मेरे पास फोन आया। सड़क पर भारी जाम था। फोन करने वालों ने बताया कि उनके पिता की हालत बहुत गंभीर है और वे उन्हें दिखाना चाहते हैं। मैंने उन्हें जिला अस्पताल के सामने आने को कहा। जब वे पहुंच सके, तब तक उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। मैंने युवकों से पूछा कि आखिर हुआ क्या था? उन्होंने बताया कि जिला अस्पताल पहुंचने के दौरान वे एक तेज आवाज में बज रहे डीजे के बगल से गुजरे थे। उनके पिता को असहजता महसूस हुई। इसके बाद उनकी सांसें थम गईं। उनका पोस्टमार्टम नहीं हुआ था। इसलिए मृत्यु का चिकित्सकीय कारण स्पष्ट नहीं हो सका। यह कहना भी संभव नहीं था कि मौत हार्ट अटैक से ही हुई। फिर भी घटना ने तेज आवाज और भारी बेस से पैदा होने वाले कंपन के खतरों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। ऐसे कई लोगों से मुलाकात हुई, जिन्होंने डीजे के तेज शोर और कंपन के दौरान इसी तरह की घटनाओं का अनुभव बताया। कुछ घटनाएं जानलेवा भी साबित हुईं।
उस मासूम की क्यों गई जान?
उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में गणेश प्रतिमा विसर्जन के दौरान डीजे के तेज शोर से जुड़ी एक घटना ने पूरे समाज को झकझोर दिया। एक स्कूल में दूसरी कक्षा की सात वर्षीय छात्रा वैष्णवी अपनी कक्षा में बैठी थी। सोमवार सुबह करीब 11 बजे स्कूल के सामने से गणेश प्रतिमा विसर्जन का जुलूस निकला। जुलूस में अत्यधिक तेज आवाज में डीजे बज रहा था। स्कूल के सीसीटीवी फुटेज में दिखा कि डीजे की आवाज कक्षा तक पहुंचते ही बच्चे खिड़कियों और दरवाजों की तरफ देखने लगे। इसी दौरान छात्रा की तबीयत बिगड़ने लगी। वह पहले कुर्सी पर लड़खड़ाई। फिर उसका सिर पीछे की ओर झुक गया। कुछ देर बाद वह दोबारा बैठने की कोशिश करती दिखी। आखिरकार वह कुर्सी से नीचे गिर गई। स्कूल की शिक्षिका इकरा खान के अनुसार, डीजे की आवाज इतनी तेज थी कि कक्षा में कंपन महसूस हो रहा था। छात्रा की हालत बिगड़ते ही दूसरे शिक्षक भी पहुंचे। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया। स्कूल की कोऑर्डिनेटर पम्मी मिश्रा ने बताया कि छात्रा को होश में लाने की कोशिश की गई, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। परिजनों का दावा था कि बच्ची को लगातार तीन बार हार्ट अटैक आया। तीसरे अटैक के बाद उसकी हालत गंभीर हो गई और कुछ ही देर में उसकी मृत्यु हो गई। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना के बाद पुलिस ने जांच शुरू की। डीजे संचालक चंद्र प्रकाश वर्मा और ऑपरेटर रामपाल सैनी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने डीजे सिस्टम और उसे ले जा रहे पिकअप वाहन को भी जब्त कर लिया। इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 और 223 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। मेवालाल पुलिस चौकी के प्रभारी शैलेंद्र कुमार यादव को निलंबित किया गया। कोतवाली नगर के निरीक्षक संतोष मिश्रा को भी लापरवाही के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। हालांकि पुलिस ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम न होने के कारण बच्ची की मौत का चिकित्सकीय कारण स्थापित नहीं हो सका है। डीजे की आवाज और मौत के बीच सीधा संबंध भी जांच से ही स्पष्ट हो सकता था। घटना के बाद पुलिस ने डीजे संचालकों की बैठक बुलाई। उन्हें रात 10 बजे के बाद डीजे नहीं बजाने, भारी बेस के अत्यधिक इस्तेमाल से बचने और असामान्य रूप से ऊंचे डीजे सेटअप नहीं लगाने के निर्देश दिए गए। पुलिस ने यह भी कहा कि अत्यधिक शोर बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और विद्यार्थियों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
उत्सव के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
उत्सव हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हमें इन्हें मनाने का पूरा अधिकार है। लेकिन इस अधिकार के साथ दूसरों के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी है। सवाल यह नहीं है कि डीजे बजना चाहिए या नहीं? सवाल यह है कि उसकी आवाज कितनी हो, कितनी देर तक हो और कहां तक उसका शोर पहुंचे? किसी के उत्सव का आनंद दूसरे की परेशानी या जीवन के लिए खतरा नहीं बनना चाहिए। विनोबा भावे ने लोकशक्ति की बात इसी उद्देश्य से की थी कि समाज अपनी समस्याओं के समाधान के लिए स्वयं आगे आए। ध्वनि प्रदूषण भी ऐसी ही समस्या है। इसके लिए केवल प्रशासन और पुलिस पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। आयोजकों, डीजे संचालकों, समितियों और आम नागरिकों को भी अपनी सकारात्मक भूमिका निभानी होगी।
सम्प्रति- लेखक डा. ए.के.सिंह सुलतानपुर जिले के निवासी है और पूर्वी उत्तरप्रदेश के प्रख्यात सर्जन और सामाजिक चिंतक हैं।




