होम आलेख गोमती की लहरों से लड़ते बचपन को चाहिए अवसर की ’पतवार’

गोमती की लहरों से लड़ते बचपन को चाहिए अवसर की ’पतवार’

0

(संतोष कुमार यादव)

गोमती नदी के किनारे बसे उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले में अर्जुनपुर गांव की पांच मई वाली वह दोपहर अब सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं रह गई है। यह कहानी है एक ऐसे किशोर की, जिसने गरीबी, अभाव और कठिन परिस्थितियों के बीच पलते हुए भी अपने भीतर इंसानियत और साहस को जिंदा रखा। महज 14 वर्ष की उम्र में राजकुमार निषाद ने जो किया, वह मिसाल बन गया।

    नदी किनारे बसे गांवों की जिंदगी पानी की तरह ही अनिश्चित होती है। कभी यही नदी पेट भरती है, कभी खेत काट लेती है, कभी बच्चों को तैरना सिखाती है और कभी किसी घर का चिराग बुझा देती है। इसी नदी में पांच मई की दोपहर को एक घर का चिराग़ बुझ गया, वहीं तीन घरों का चिराग़ बुझते–बुझते बचा। गोमती नदी में मछली पकड़ने गए गांव के ही मंजीत (12 वर्ष)  किशन उर्फ कल्लू (11 वर्ष) ओमलाल (10 वर्ष) कुलदीप (23 वर्ष) अखिलेश (6 वर्ष) और अरविंद (15 वर्ष) सभी मासूम अपनी दुनिया में मस्त थे। कोई मछली पकड़ रहा था, कोई मोबाइल से रील बना रहा था।

     इसी बीच अचानक नदी के तेज बहाव में मंजीत डूबने लगा। उसे बचाने की कोशिश में किशन और ओमलाल भी पानी में फंस गए। कुलदीप भी उन्हें बचाने के प्रयास में बहाव की चपेट में आ गया। नदी किनारे खड़े छोटे अखिलेश की चीखों ने माहौल बदल दिया। रील बना रहा अरविंद दौड़ा, और वहीं भैंस चरा रहे राजकुमार भी। फिर जो हुआ, वह किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं था। राजकुमार सीधे नदी में कूद पड़ा। उसने जान जोखिम में डालकर तीन बच्चों को बाहर निकाल लिया। लेकिन कुलदीप तेज धारा में बह चुका था। आठवीं पास राजकुमार सिर्फ एक नाम नहीं, नदी किनारे पल रही अनगिनत संभावनाओं का चेहरा है। उसकी कहानी सिर्फ एक बच्चे की बहादुरी नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की उस सच्चाई का आईना है जहां अभावों के बीच भी प्रतिभाएं जन्म लेती हैं। जहां बच्चे कठिन परिस्थितियों में बड़े होते हैं, लेकिन अवसरों की कमी उन्हें आगे नहीं बढ़ने देती। अगर सही मार्गदर्शन, बेहतर शिक्षा और खेल-प्रशिक्षण जैसे अवसर मिलें तो ऐसे बच्चे सिर्फ गांव ही नहीं, पूरे देश का नाम रोशन कर सकते हैं।

    आज जब मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया में संवेदनाएं कमजोर पड़ती दिख रही हैं, तब राजकुमार जैसे बच्चे उम्मीद जगाते हैं। राजकुमार निषाद का परिवार आर्थिक रूप से बेहद कमजोर है। पिता रामलाल निषाद रोजी-रोटी कमाने के लिए सऊदी अरब में मजदूरी करते हैं। घर की पूरी जिम्मेदारी मां जुगना देवी के कंधों पर है। तीस परिवारों वाली इस निषाद बस्ती में संघर्ष रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। राजकुमार दो भाइयों और दो बहनों में दूसरे नंबर पर है। संसाधनों की कमी है, लेकिन जिम्मेदारियों का एहसास उम्र से कहीं बड़ा। नदी उसके घर से महज सौ मीटर दूर है। गोमती उसके लिए सिर्फ नदी नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा रही है। बचपन से नदी किनारे खेलते-बढ़ते हुए उसने तैरना सीखा। कई बार गोमती को पार भी किया। शायद यही अभ्यास उस दिन तीन बच्चों की जिंदगी बचाने का कारण बन गया। लोग राजकुमार को हीरो कह रहे हैं। अधिकारी सम्मानित कर रहे हैं। गांव गर्व महसूस कर रहा है। लेकिन इस किशोर के मन में एक टीस अब भी है। बातचीत में वह बार-बार यही कहता है, ’एक बच्चे को नही बचा पाया…” घटना के बाद जिलाधिकारी इंद्रजीत सिंह और पुलिस अधीक्षक चारू निगम ने राजकुमार को बाल वीरता पुरस्कार से नवाजा। स्थानीय ब्लाक प्रमुख राहुल चंद्रशेखर शुक्ला ने आगे की पढ़ाई का जिम्मा लिया है। अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी उसकी सराहना की। सोशल मीडिया पर उसकी बहादुरी की चर्चा हुई।

    लेकिन सवाल इससे कहीं बड़ा है।क्या सिर्फ सम्मान पत्र से ऐसे बच्चों का भविष्य बदल जाएगा? क्या नदी किनारे मुफलिसी में पल रही प्रतिभाओं को शिक्षा, प्रशिक्षण और बेहतर अवसर मिल पाएंगे?

    नदी किनारे बसे गांवों में सिर्फ एक राजकुमार नहीं है। वहां कई बच्चे हैं जिनमें हुनर है, साहस है, संघर्ष से लड़ने की ताकत है। लेकिन संसाधनों की कमी उनके सपनों को सीमित कर देती है। ऐसे स्थानों पर बसे लोगों को नदियां साहस देती, धाराएं तैरना सिखा देती हैं, लेकिन व्यवस्था आगे बढ़ने का रास्ता नहीं दे पाती हैं।