भारतीय राजनीति निरंतर पतन से अधोपतन की ओर बढ़ रही है। 30 जनवरी 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद सत्ताधारी कांग्रेस का नेतृत्व लगभग नियंत्रण मुक्त हो गया था। जो लोकप्रियता खोने के भय या सम्मान के चलते महात्मा गांधी की सलाह कुछ सुनी या मानी जाती थी उसकी भी संभावना समाप्त हो गई थी। 1952 के बाद कांग्रेस सरकार ने अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये कई प्रकार के अनैतिक उपक्रम शुरू किये।
केरल की विरोधी सरकार को दलबदल कर गिराया और ऐसे कई प्रयोग कालान्तर में 1957 और 1962 के बाद कई सूबों में किये गये। श्री विंदेश्वरी प्रसाद मंडल जिनके नाम से मंडल कमीशन जाना जाता है, वे बिहार के मधेपुरा से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के विधायक चुनकर आये थे और राज्य सरकार में मंत्री थे। उस समय की कांग्रेस पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद का लालच दिया, सरकार गिराई गई और कुछ समय के लिये वे मंत्री बने और फिर उन्हें भी हटा दिया गया। बाद में वही श्री विंदेश्वरी मंडल 1969 में कांग्रेस के विभाजन के समय संगठन कांग्रेस याने मुरारजी कांग्रेस के साथ चले गये। उनके इन्हीं रिश्तों के चलते जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद जब जनता पार्टी की सरकार से उपप्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को मंत्रिमंडल से हटाया गया, तब उनके जनाधार को कम करने के लिये जनता पार्टी के तत्कालीन नेतृत्व ने पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिये आयोग बनाने की बात स्वीकार की और जब वह आयोग बना तब उसका अध्यक्ष उन्हीं श्री वी.पी. मंडल को बनाया, जो पिछड़े वर्ग को धोखा देकर कांग्रेस के हाथ के खिलौना बने थे।
देश में दलबदल की शुरुआत कराने वाली भी कांग्रेस और उसके मुखिया थे। जहां कहीं भी प्रतिपक्ष का आधार बढ़ा उसे कमजोर करने के लिये कांग्रेस नेतृत्व ने हर प्रकार के हथकंडे अपनाये। दल के भीतर रहकर, दल के निर्णय के खिलाफ कार्य करने की परिपाटी भी कांग्रेस ने ही शुरू की थी। 1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक कारण यह भी था कि कांग्रेस संगठन व सरकार के बीच गहरे मतभेद व टकराव थे। स्वः जवाहर लाल नेहरू ने यह परिपाटी शुरू कर दी थी कि संगठन की तुलना में सत्ता सर्वोपरि है और उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में धीरे-धीरे सत्ता का केंद्रीयकरण किया इसके परिणामस्वरूप या तो संगठन को अप्रभावी बनाया या अपने कब्जे में ले लिया। स्वः जवाहर लाल नेहरू के जीवनकाल में श्रीमती इंदिरा गांधी कार्यवाहक अध्यक्ष बनी थीं तथा वह सरकार के निर्णयों को प्रभावित करने लगी थी। राजनैतिक निर्णयों को करने के लिये स्वतः प्रधानमंत्री पार्टी के नेताओं को इंद्रा जी के पास जाने के इशारे देने लगे थे। एक प्रकार से अप्रत्यक्ष, अलिखित सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। इसी प्रक्रिया को 1971 के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया तथा अप्रत्यक्ष व अलिखित तौर पर सत्ता का नियंत्रक अपने बेटे संजय गांधी को बनाया था।
1969 में कांग्रेस संसदीय बोर्ड ने राष्ट्रपति पद के लिये स्व. नीलम संजीव रेड्डी को प्रत्याशी बनाया, इस पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक में प्रधानमंत्री के तौर पर श्रीमती इंदिरा गांधी उपस्थित थीं। उन्होंने न किसी नाम का प्रस्ताव किया और न कोई राय दी व चुप बैठी रहीं तथा बाद में वीवी गिरि को निर्दलीय तौर पर खड़ा कराया, उनका समर्थन किया, कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर निर्दलीय प्रत्याशी को ऐनकेन प्रकारेण जिताया। कांग्रेस में अनुशासनहीनता की विधिवत और उच्च स्तरीय शुरुआत तो स्वतः श्रीमती गांधी ने की थी। इसी प्रकार की अनेकों घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, उन्होंने पार्टी को व्यक्ति केन्द्रित या स्व केन्द्रित बनाया। कांग्रेस के संगठन व ढांचे का विभाजन और पिछलग्गूपन यहीं से शुरू हुआ तथा महात्मा गांधी के जीवनकाल में जो परंपरा रही थी, कि सत्ता की तुलना में संगठन सर्वोपरि है, उस आदर्श परंपरा को मिटा दिया गया। इस व्यक्तिपरक और सत्तापरक सत्ता के प्रभुत्व के सिद्धांत की शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी और अब धीरे-धीरे यह परिपाटी लगभग सभी पार्टियों में पहुंच चुकी है।
पार्टियों में अब अनुशासनहीनता वक्ती अपराध है याने चाहे वह कांग्रेस हो या भाजपा अब सबकी स्थिति विशेषतः संगठन की स्थिति दोयम दर्जे की है। जो लोग चुनाव का टिकिट नहीं मिलने पर, मंत्री नहीं बनने पर या मुख्यमंत्री नहीं बनने या हटाये जाने पर या केंद्रीय मंत्री नहीं बनाये जाने या हटाये जाने पर किसी सिद्धांत के लिये नहीं बल्कि स्वार्थों के लिये पार्टी छोड़ते हैं, दलबदल करते हैं और बाद में बहुमत में कमी रहती है तब उन्हें ही दलों की सत्ता व संगठन पर वापिसी के नाम पर ससम्मान बुलाती और सत्ता में हिस्सेदारी देती है, जो कार्यकर्ता और विशेषतौर पर जमीनी कार्यकर्ता दल के नीति सिद्धांत से बंधे रहते हैं, उन दल बदलुओं को उनके ही सिर पर थोप दिया जाता है। याने कुल मिलाकर सिद्धांत यह हो गया है कि कोई भी दल हो उसे सत्ता चाहिए, सत्ता के लिये जो भी अनैतिक कार्य करना हो वह करने को सत्ताधारी पक्ष तैयार रहता है।
आजकल यह जुमला चल गया है कि भाजपा वाशिंग मशीन है और यह इसलिये कि जिन लोगों को भाजपा ने विपक्ष के रूप में भ्रष्टाचारी कहा, सीबीआई से मुकदमे दर्ज कराये 100-200 करोड़ नहीं बल्कि हजारों करोड़ के आरोप लगाये परंतु अपनी सत्ता बनाने के लिये उन्हें ही ससम्मान वापिस लाकर पूरी पार्टी के सिर पर बैठा दिया गया। स्व. अजीत पंवार को सरकार बनाने के लिये एनसीपी से तोड़कर उपमुख्यमंत्री की शपथ दिलाई, उनको निर्दोष सिद्ध करने के लिये सीबीआई केस वापिस ले लिये गये और जब वे वापस एनसीपी में चले गये तो उसी सीबीआई ने बेशर्मी के साथ पुनः कार्यवाही की शुरुआत की। क्या सीबीआई के यह कार्य केंद्र की मोदी सरकार के इशारे पर नहीं थे? 2023 के विधानसभा चुनाव के समय फिर उन्हें मिलाया, फिर केस हटाया, फिर उपमुख्यमंत्री बनाया। याने जिन राजनैतिक अपराधों या राजैनतिक अनैतिकता की शुरुआत कांग्रेस ने अपने व्यापक राष्ट्र सत्ता के दौरान की थी उन्हीं तरीकों को और अधिक बेशर्मी के साथ भाजपा आगे ले जा रही है।
हरियाणा में दलबदल का खेल छुटपुट चलता रहा परंतु स्व.देवी लाल जी को, मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिये श्री भजनलाल को जो कांग्रेस के थे, पूरे विधायको के साथ जनता पार्टी में शामिल कराकर मुख्यमंत्री बनाया गया। 1980 के विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को बहुमत नहीं मिला और देवीलाल जी को लगभग बहुमत होने के बाद भी रोकने के लिये कि वह मुख्यमंत्री न बन सकें, श्रीमती इंदिरा गांधी ने जनता पार्टी के मुख्यमंत्री व मंत्रियों याने सारे मंत्रि मंडल को वापिस कांग्रेस में शामिल करा दिया। क्या बिगड़ जाता अगर कांग्रेस एक दो राज्यों में अपने विरोधी दलों की सरकार को बर्दाश्त करती और अपनी पार्टी को नैतिक तरीकों से मजबूत बनाती।
नैतिकता के सिद्धांत को तो कांग्रेस ने पहले आम चुनाव के बाद ही त्याग दिया दिया था जब समाजवादियों ने कांग्रेस से निकलकर सोशलिस्ट पार्टी बनाई तो आचार्य नरेन्द्र देव के नेतृत्व में कांग्रेस के चिन्ह पर निर्वाचित विधायकों ने विधायक पद से नैतिक आधार पर इस्तीफा दे दिये, तथा मध्यावधि चुनाव में सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी बनकर चुनाव लड़े तथा अपनी ही पार्टी के पुराने साथियों को हराने के लिये कांग्रेस ने अनैतिक रास्ते अपनाये। यह सर्वविदित तथ्य है कि आचार्य नरेन्द्र देव जी को हराने के लिये कांग्रेस ने बाबा राघवदास को खड़ा किया और अयोध्या में राम मंदिर बनाने के लिये वोट मांगे। अगर आचार्य जी वह चुनाव जीत जाते, कांग्रेस पार्टी नैतिक मूल्यों का सम्मान करती और उन्हें हटाने के लिये हिंदुत्व कार्ड नहीं खेलती तो देश में नैतिक मूल्यों की स्थापना होती तथा कटटरपंथ की राजनीति का उदय नहीं होता। आज कांग्रेस के ही अनैतिक व घिनौने अस्त्रों का इस्तेमाल, भाजपा कांग्रेस के खिलाफ कर रही है। दुखद यह है कि 1950 से लेकर 1960 के दशक तक राजनीति व चुनाव में, पैसे का चलन उतना नहीं हुआ था। समाज में भी कमोवेश नैतिक मूल्यों का सम्मान होता था। चुनाव में पैसे का खुलकर उपयोग 1971 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने शुरू किया था। उमा वासुदेव ने जिन्होंने उनकी आत्मकथा लिखी थी उसमें श्रीमती इंदिरा गांधी को एक प्रश्न के उत्तर में यह कहते हुये उद्धृत किया है कि मैं चुनाव इतने महंगे कर दूंगी कि कोई विरोधी चुनाव नहीं लड़ सकेगा।जिस राजनैतिक गंदगी की शुरुआत राजनीति में पैसे के चलन को कांग्रेस ने शुरू किया था अब उसी का इस्तेमाल और बड़े पैमाने पर भाजपा कर रही है।
भाजपा को उद्योगपतियों ने इस वर्ष 6600 करोड़ रुपये का चंदा दिया और कांग्रेस को 1900 करोड़ का। याने अब भाजपा की सत्ता उद्योगपतियों को अधिक पसंद है बजाय कांग्रेस के। अब तो हालात इतने चिंताजनक है कि पंचायतों के चुनावों में लाखों से लेकर करोड़ों रुपया खर्च होने लगे। मतदाता पंचायत से लेकर लोकसभा तक हर चुनाव में अपवाद छोड़कर सीधे रुपया लेकर वोट दे रहे हैं। जो लोग सीधे रुपया नहीं ले रहे हैं वे सरकार से कुछ हजार रुपये की सुविधाओं के बदले में वोट दे रहे हैं। यह भी लगभग उसी प्रकार वोट को बेचना है जिस प्रकार नगद रुपया देकर वोट को बेचना है। दिल्ली का उच्च मध्यमवर्ग और मध्यवर्ग जिसकी मासिक आमदनी औसतन लाख दो लाख प्रतिमाह से अधिक है, वह भी 200 यूनिट बिजली, 300 लीटर मुफ्त पानी, के लिये वोट देता है। अगर सामान्य व गरीब मतदाता 5-10 हजार रुपयों को लेकर अपना वोट बेचता है तो हमारा पढ़ा लिखा संभ्रांत मतदाता साल के 30-40 हजार रुपया और 5 साल के लिये लाख डेढ़ लाख रुपये में अपना वोट बेचता है। यह राजनीति के पतन का भयानक दौर है।
पहले मुस्लिम मतदाता ने केवल कांग्रेस को वोट दिया, अपने मतों का धु्रवीकरण किया और अब उसके प्रतिउत्तर में हिंदु मतदाताओं का धु्रवीकरण शुरु हुआ तथा हिंदु मतदाता भी अब आमतौर पर भाजपा का समर्थक मतदाता बन रहा है। पहले कांग्रेस अल्पसंख्यकों को डराकर उनके वोट लेती थी, अब बहुसंख्यक हिंदु संप्रदाय को भाजपा डरा कर उनका भयादोहन कर रही है। दल बदल अब इतना फैल चुका है कि जो राजनीति व राजनैतिक दलों के लिये कैंसर जैसा हो गया है। अब जो पार्टी सरकार से हटती है उसके लोग बड़े पैमाने पर पार्टी को छोड़कर सत्ता पक्ष की ओर चले जाते हैं जो कि एक चलन बन गया है। जब प.बंगाल में कांग्रेस व सीपीएम सरकार से हटी तो कांग्रेस के काफी लोग ममता बनर्जी के साथ चले गये। और इस बार जब ममता बनर्जी हार गई तो चुनाव के दो माह भी नहीं हुए और उनकी पार्टी के अधिकांश विधायक, सांसद, यहां तक कि राज्यसभा के सदस्य भी पार्टी छोड़कर चले गये। यह स्थिति करीब-करीब सभी सूबों में, सभी दलों के साथ हो रही है। जब कभी दिल्ली का ताज भाजपा से छिनेगा तो उनकी पार्टी में भी इससे ज्यादा भगदड़ मचेगी। राजनीति व राजनैतिक कार्यकर्ताओं को सत्ता का खून पीने की दाढ़ लग चुकी है और अब यह जल्दी रुकने वाली नहीं है। इसलिये भाजपा हर हाल में अपनी सत्ता को बनाये रखने के लिये हर अपराध करेगी, कानून को तोड़ेगी, संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनायेगी और व्यक्ति केन्द्रित सत्ता की परिपाटी को चलायेगी।
मैं उन सभी लोगों से जो सिद्धांत पर चलना चाहते हैं, अपील करता हूँ कि इस अनैतिकता की गिरावट, भयंकर आंधी और तूफान में भी आप तिनके के समान खड़े रहें। आंधी, तूफान जायेगा परंतु ये तिनके ही कल राजनीति की नैतिकता के मार्गदर्शक और आधार बनेंगे।
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




