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पंडवानी की अमर स्वर-सम्राज्ञी तीजन बाई नहीं रहीं, लोककला जगत में शोक

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रायपुर, 05 जुलाई। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर नई पहचान दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई का रविवार तड़के रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में निधन हो गया।

    तीजनबाई लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उपचार के दौरान उन्होंने भोर करीब 3:15 बजे अंतिम सांस ली। उनके निधन से छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के कला और सांस्कृतिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनकी आयु लगभग 70 वर्ष थी।

   परिजनों के अनुसार, पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत लगातार खराब चल रही थी, जिसके बाद उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था। उनकी बहू रेणु देशमुख ने उनके निधन की पुष्टि की। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव गनियारी, विकासखंड पाटन, जिला दुर्ग में किया जाएगा।

   तीजन बाई का जाना केवल एक महान कलाकार का निधन नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक सांस्कृतिक विरासत के एक स्वर्णिम युग का अवसान माना जा रहा है। उन्होंने अपना पूरा जीवन पंडवानी कला के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक इसकी समृद्ध परंपरा पहुंचाने के लिए समर्पित कर दिया। उनके निधन पर मुख्यमंत्री, विभिन्न जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों और सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे देश की सांस्कृतिक दुनिया की अपूरणीय क्षति बताया है।

साधारण परिवार से विश्व मंच तक का प्रेरणादायक सफर

   24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई ने बेहद साधारण परिवार से निकलकर अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाओं और पंडवानी गायन में विशेष रुचि थी। आर्थिक अभाव और सामाजिक विरोध के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को कभी नहीं छोड़ा।

   उस दौर में जब महिलाओं द्वारा पंडवानी की कापालिक शैली में प्रस्तुति देना समाज में स्वीकार्य नहीं माना जाता था, तब तीजन बाई ने सभी रूढ़ियों को तोड़ते हुए अपनी प्रभावशाली आवाज, दमदार अभिनय और सशक्त मंच प्रस्तुति से इस लोककला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी शैली ने पंडवानी को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई।

दुनिया भर में बिखेरी छत्तीसगढ़ की संस्कृति की चमक

     तीजन बाई ने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी सहित अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुतियां देकर भारतीय लोक संस्कृति और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का गौरव बढ़ाया। उनकी प्रस्तुतियों ने विश्वभर के दर्शकों को भारतीय लोक परंपराओं से परिचित कराया और पंडवानी को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया।

सम्मानों से सजा गौरवशाली जीवन

    लोककला के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें समय-समय पर कई प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया। वर्ष 1988 में पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए।

   तीजन बाई का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। उनकी बुलंद आवाज, जीवंत अभिनय और पंडवानी की अनूठी शैली भारतीय लोककला के इतिहास में सदैव अमर रहेगी।