(अशोक कुमार साहू)
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की जगह ‘विकसित भारत–जी रामजी योजना’गत एक जुलाई से देशभर में लागू हो गई है। केंद्र सरकार ने इसे ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन के क्षेत्र में एक बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत किया है। हालांकि, इस महत्वाकांक्षी योजना की सफलता का सबसे बड़ा प्रश्न राज्यों की 40 प्रतिशत वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर उठ रहा है। चुनावी वादों और सामाजिक कल्याण योजनाओं के कारण पहले से ही वित्तीय दबाव झेल रहे अधिकांश राज्यों के सामने यह चुनौती होगी कि वे अपने हिस्से का धन किस प्रकार उपलब्ध कराएं। वस्तुतः इस योजना की सफलता काफी हद तक इसी वित्तीय व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
ग्रामीण विकास मंत्रालय के अनुसार, इस योजना के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में 125 दिनों तक रोजगार की गारंटी दी जाएगी। मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है। यदि निर्धारित अवधि में रोजगार उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो संबंधित श्रमिक को बेरोजगारी भत्ता मिलेगा। योजना में डिजिटल जॉब कार्ड, तकनीक आधारित कार्य प्रबंधन प्रणाली, समयबद्ध एवं पारदर्शी भुगतान व्यवस्था तथा ग्राम सभाओं की भूमिका को पहले से अधिक सशक्त बनाने का दावा किया गया है।
नई योजना के अंतर्गत जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों का निर्माण, वृक्षारोपण तथा टिकाऊ परिसंपत्तियों के सृजन पर विशेष बल दिया गया है। साथ ही ग्रामीण युवाओं के लिए कौशल विकास और आजीविका के नए अवसर विकसित करने की भी बात कही गई है। सामाजिक अंकेक्षण और डिजिटल निगरानी के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास किया गया है। ग्राम पंचायतों की विकास कार्ययोजना ग्राम सभाओं के माध्यम से तैयार होगी, जिससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप कार्यों का चयन किया जा सके।
आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले के मुक्कावरिपल्ली गांव से गत गुरुवार इस योजना का शुभारंभ करते हुए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यूपीए सरकार के समय लागू मनरेगा में केवल 100 दिनों के रोजगार की गारंटी थी, जबकि नई योजना में इसे बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। उनके अनुसार यह केवल रोजगार के दिनों में वृद्धि नहीं, बल्कि सोच में बदलाव का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी श्रमिक बेरोजगार न रहे।
श्री चौहान ने बताया कि योजना के पहले ही वर्ष में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 95 हजार करोड़ रुपये से अधिक होगी। राज्यों की 40 प्रतिशत हिस्सेदारी जोड़ने पर वार्षिक व्यय लगभग 1.51 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। अगले पांच वर्षों में इस योजना पर 7.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। उनका कहना है कि यह राशि देश की 2.86 लाख ग्राम पंचायतों तक पहुंचेगी और प्रत्येक पंचायत को औसतन प्रति वर्ष दो करोड़ रुपये से अधिक का लाभ मिलेगा, जिससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण होगा।
उन्होंने यह भी कहा कि योजना में श्रमिकों के अधिकारों को कानूनी मजबूती दी गई है। यदि कोई श्रमिक रोजगार की मांग करता है तो उसे 15 दिनों के भीतर काम देना अनिवार्य होगा। ऐसा नहीं होने पर बेरोजगारी भत्ता देना पड़ेगा। मजदूरी भुगतान में देरी होने की स्थिति में श्रमिक को विलंबित भुगतान के साथ ब्याज भी मिलेगा। उनका कहना था कि अब श्रमिकों के अधिकारों की अनदेखी संभव नहीं होगी।
योजना के प्रभावी संचालन के लिए प्रशासनिक व्यय की सीमा 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 9 प्रतिशत कर दी गई है। इसके लिए लगभग 13 हजार करोड़ रुपये ग्राम रोजगार सहायकों, मेट्स और अन्य जमीनी कर्मचारियों के वेतन तथा सुविधाओं पर खर्च किए जाएंगे। सरकार का मानना है कि यदि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को समय पर उचित भुगतान मिलेगा तो पूरी व्यवस्था अधिक प्रभावी और जवाबदेह बनेगी।
केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट किया कि गांवों में कौन-से विकास कार्य होंगे, इसका निर्णय ग्राम पंचायत और ग्राम सभा ही करेगी। उन्होंने राज्यों को पंचायतों का ग्रेडेशन कर उन्हें ए, बी और सी श्रेणियों में विभाजित करने तथा पिछड़ी पंचायतों को अधिक संसाधन उपलब्ध कराने का सुझाव भी दिया। साथ ही यह घोषणा भी की कि अब किसी भी राज्य में मजदूरी 300 रुपये प्रतिदिन से कम नहीं होगी।
हालांकि सरकार के इन दावों से विपक्ष पूरी तरह सहमत नहीं है। कांग्रेस सहित अनेक विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर इस योजना का तीखा विरोध किया है। सबसे बड़ा विवाद राज्यों की 40 प्रतिशत वित्तीय हिस्सेदारी को लेकर है। मनरेगा में श्रमिकों की मजदूरी का पूरा भार केंद्र सरकार उठाती थी, जबकि सामग्री और अन्य मदों पर राज्य सरकारें निर्धारित अनुपात में खर्च करती थीं। इसके विपरीत नई व्यवस्था में कुल व्यय का केवल 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और शेष 40 प्रतिशत राज्य सरकारों को वहन करना होगा।
प्रख्यात अर्थशास्त्री तथा मनरेगा की परिकल्पना और क्रियान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ज्यां द्रेज का कहना है कि नए कानून में अधिकांश अधिकार केंद्र सरकार के पास केंद्रित कर दिए गए हैं, जबकि इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी गई है। उनके अनुसार केंद्र यह तय करेगा कि योजना कहां लागू होगी और किस राज्य को कितनी राशि मिलेगी। उन्होंने यह भी कहा कि 125 दिनों के रोजगार का प्रावधान तो किया गया है, लेकिन उसे मनरेगा जैसी मजबूत कानूनी गारंटी प्राप्त नहीं है। उनका तर्क है कि जब मनरेगा में भी केवल लगभग दो प्रतिशत परिवारों को ही 100 दिनों का रोजगार मिल पाता था, तब केवल अवधि बढ़ा देने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे।
ज्यां द्रेज ने इस कानून को ‘बुलडोजर बिल’ की संज्ञा देते हुए कहा कि मनरेगा को व्यापक जन-विमर्श और सर्वदलीय सहमति के बाद लागू किया गया था। उन्होंने याद दिलाया कि 2004 में जन आंदोलनों द्वारा तैयार प्रारूप राष्ट्रीय सलाहकार परिषद, प्रधानमंत्री कार्यालय और ग्रामीण विकास मंत्रालय से होते हुए संसद की स्थायी समिति में गया और उसके बाद सर्वसम्मति से पारित हुआ। इसके विपरीत, उनका आरोप है कि नए कानून पर पर्याप्त सार्वजनिक चर्चा नहीं हुई। उनके अनुसार नई योजना लाने के बजाय भुगतान प्रणाली में सुधार, पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई की आवश्यकता थी।
उल्लेखनीय है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने वर्ष 2005 में ग्रामीण गरीबों की आजीविका सुरक्षा के उद्देश्य से मनरेगा कानून लागू किया था। इसमें देश के सभी जिलों को शामिल किया गया था। मनरेगा के तहत मजदूरी का पूरा व्यय केंद्र सरकार वहन करती थी, जबकि सामग्री एवं अन्य मदों का खर्च निर्धारित अनुपात में राज्यों द्वारा उठाया जाता था। नई योजना में यह व्यवस्था बदल दी गई है। हालांकि पूर्वोत्तर राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा अन्य केंद्र शासित प्रदेशों के लिए केंद्र सरकार अब भी कुल व्यय का 90 प्रतिशत वहन करेगी।
नई योजना में यह प्रावधान भी है कि आवेदन के 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिलने पर श्रमिक को बेरोजगारी भत्ता मिलेगा, जिसका भार संबंधित राज्य सरकार पर होगा। यह व्यवस्था मनरेगा में भी थी। विपक्ष का आरोप है कि नई योजना का पूरा नियंत्रण केंद्र सरकार के हाथों में रहेगा, जबकि राज्यों को अधिक वित्तीय बोझ उठाना पड़ेगा और राजनीतिक श्रेय केंद्र सरकार को मिलेगा।
लोकसभा में कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने भी इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि मनरेगा को सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के समर्थन से लागू किया गया था, जिससे उसकी व्यापक स्वीकार्यता स्पष्ट होती है। उनका कहना था कि नए कानून में सभी महत्वपूर्ण अधिकार केंद्र सरकार को दे दिए गए हैं और वही तय करेगी कि किस राज्य को कितना वित्तीय आवंटन मिलेगा, जबकि मनरेगा में पंचायतों की भूमिका अधिक प्रभावी थी।
नई योजना की सफलता का एक महत्वपूर्ण पक्ष मजदूरी दर भी होगी। वर्ष 2024-25 में मनरेगा के तहत औसत मजदूरी लगभग 261 रुपये प्रतिदिन थी, जबकि मौजूदा वित्तीय वर्ष में यह बढ़कर लगभग 289 रुपये हो गई है। लेकिन बढ़ती महंगाई और ग्रामीण श्रम बाजार की बदलती परिस्थितियों के कारण अधिकांश राज्यों में इससे अधिक मजदूरी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में मनरेगा का आकर्षण लगातार कम हुआ। नई योजना में न्यूनतम मजदूरी 300 रुपये निर्धारित की गई है, लेकिन अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर और मध्य भारत के अधिकांश क्षेत्रों में जहां सामान्य मजदूरी 400 रुपये या उससे अधिक है, वहां यह दर श्रमिकों को पर्याप्त रूप से आकर्षित नहीं कर पाएगी।
निस्संदेह, विकसित भारत–जी रामजी योजना में तकनीकी सुधार, पारदर्शिता, डिजिटल प्रबंधन और रोजगार अवधि बढ़ाने जैसे कई सकारात्मक पहलू शामिल किए गए हैं। लेकिन इसकी वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यों को पर्याप्त वित्तीय सहयोग किस प्रकार उपलब्ध कराया जाता है, मजदूरी को बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप कितना बनाया जाता है और ग्राम पंचायतों की स्वायत्तता एवं श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा किस सीमा तक सुनिश्चित की जाती है। यदि इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान नहीं हुआ तो यह महत्वाकांक्षी योजना भी अपने घोषित उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल करने में कठिनाइयों का सामना कर सकती है।
सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।




