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’12 जून’ ऐतिहासिक फैसले के नायक ’जस्टिस सिन्हा’ का ’सुल्तानपुर’ से जुड़ा अनकहा अध्याय

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(संतोष कुमार यादव)

सुल्तानपुर। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 12 जून 1975 का दिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली से हुए लोकसभा चुनाव को निरस्त कर दिया था। इस फैसले ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव लाया और इसके कुछ दिनों बाद 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया।

         इस ऐतिहासिक फैसले के लिए प्रसिद्ध न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा वर्ष 1986 में सुल्तानपुर भी आए थे। जस्टिस सिन्हा ने न केवल किसी पद का मोह नहीं किया, बल्कि संभवतः सार्वजनिक कार्यक्रमों से भी पूरी तरह दूरी बना ली थी। फैसले के बाद वे भारत-भारती के कार्यक्रम को अपवाद मान ले तो संभवतः किसी कार्यक्रम में भी उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं हुई। नेताजी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर आयोजित भारत-भारती संस्था के पांचवें वार्षिकोत्सव में उन्होंने मुख्य अतिथि के रूप में हिस्सा लिया था। संस्था के संस्थापक सुंदर लाल टंडन के आमंत्रण पर सुल्तानपुर पहुंचे जस्टिस सिन्हा ने अपने संबोधन में देश की एकता, अखंडता और लोकतंत्र के प्रति लोगों को सजग रहने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि देश की जनता अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं होगी तो आजादी को सुरक्षित रखना कठिन हो जाएगा।

        उन्होने स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को याद करते हुए कहा था कि हमें केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके आदर्शों को जीवन में उतारना चाहिए। गौरतलब है कि 1971 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी ने रायबरेली सीट से समाजवादी नेता राजनारायण को हराया था। चुनाव परिणाम को चुनौती देते हुए राजनारायण ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। करीब चार वर्ष तक चली सुनवाई के बाद 12 जून 1975 को जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया और उन्हें छह वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। इस

     फैसले के बाद विपक्ष द्वारा इंदिरा गांधी के इस्तीफे की मांग तेज पकड़ने लगी थी। राजनीतिक संकट के बीच 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। इस दौरान विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लगी और नागरिक अधिकारों पर कई प्रतिबंध लगाए गए। आज 12 जून 1975 का यह फैसला भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक व्यवस्था की मजबूती के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। भारतीय लोकतंत्र ने आपातकाल का दौर देखा, उससे सबक लिया और आगे बढ़ा। लेकिन इतिहास का यह अध्याय आज भी चेतावनी देता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता, बल्कि असहमति के सम्मान, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है। 12 जून 1975 का फैसला इसी लोकतांत्रिक चेतना का एक अमिट दस्तावेज है। सुल्तानपुर में जस्टिस सिन्हा की मौजूदगी और उनके विचार भी इस ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है।

इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था : राज खन्ना

      वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक राज खन्ना कहते हैं कि राजनारायण बनाम इंदिरा गांधी मामले में आए इस फैसले ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। आपातकाल लागू होने के बाद प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई। विपक्ष के प्रमुख नेताओं को जेल भेज दिया गया। नागरिकों के मूल अधिकार निलंबित किए गए और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अभूतपूर्व दबाव देखने को मिला। पहली बार लोकसभा का कार्यकाल भी एक वर्ष के लिए बढ़ाया गया था।

ऐतिहासिक फैसले ने बदली राजनीति की दिशा : जयशंकर

    आपातकाल के दौरान अपने पिता विष्णुदेव गुप्त के साथ आजमगढ़ जेल में बंद रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादक जयशंकर गुप्ता ने बताया कि, उस दौर की घटनाओं को आज भी नहीं भूले हैं। वे कहते हैं कि, 1977 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई। इसके बाद केंद्र और राज्यों में सरकारों के बदलने तथा राजनीतिक समीकरणों के उलटफेर का नया दौर शुरू हुआ, जिसने भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।