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अनशन खत्म करने पर बोले सोनम वांगचुक, कहा- सरकार के लिखित आश्वासन के बाद ही लिया फैसला

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नई दिल्ली, 25 जुलाई। सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार के साथ किसी भी तरह के “समझौते” के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उन्होंने अपना 26 दिन का आमरण अनशन तभी समाप्त किया, जब केंद्र सरकार ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई नहीं करने का लिखित आश्वासन दिया।

      शुक्रवार देर रात जारी एक यूट्यूब वीडियो में वांगचुक ने कहा कि दिल्ली में आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की आशंका बढ़ रही थी। उन्हें वर्ष 2025 में लद्दाख में युवाओं पर हुई पुलिस गोलीबारी की घटना भी याद आ रही थी। ऐसे में उनकी सबसे बड़ी चिंता आंदोलन में शामिल छात्रों और युवाओं की सुरक्षा थी।

       उन्होंने बताया कि आधी रात के करीब उन्हें सूचना मिली कि केंद्र सरकार की ओर से लिखित आश्वासन देने पर सहमति बन गई है। इसके बाद उन्होंने अनशन समाप्त करने का निर्णय लिया। वांगचुक के अनुसार, यदि वह शांति बनाए रखने की अपील नहीं करते, तो प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की आशंका बनी हुई थी।

        वांगचुक ने स्पष्ट किया कि बातचीत के दौरान उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पर जोर नहीं दिया। उनका कहना था कि उस समय उनकी प्राथमिकता आंदोलन में शामिल लोगों को कानूनी कार्रवाई और संभावित हिंसा से बचाना था, इसलिए उन्होंने पहले उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया।

         सरकार के साथ समझौते के आरोपों का जवाब देते हुए वांगचुक ने कहा कि यदि उन्हें समझौता ही करना होता, तो वह 26 दिनों तक कठिन परिस्थितियों में भूख हड़ताल नहीं करते। उन्होंने कहा कि समझौता करना होता तो वह किसी कमरे में बैठकर भी किया जा सकता था, लेकिन उन्होंने लंबा अनशन इसलिए किया क्योंकि यह आंदोलन उनके सिद्धांतों और जनता के हितों से जुड़ा था।

         सोनम वांगचुक ने यह भी आरोप लगाया कि 18 जुलाई को प्रदर्शन स्थल से हटाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाने के बाद उनके साथ कैदियों जैसा व्यवहार किया गया। उन्होंने दावा किया कि अस्पताल में उन्हें स्वतंत्र रूप से आने-जाने की अनुमति नहीं थी, किसी से मिलने नहीं दिया गया और मोबाइल फोन तथा लैपटॉप रखने पर भी रोक लगा दी गई थी।

        उन्होंने यह भी कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा मेदांता अस्पताल ले जाने की अनुमति मिलने के बावजूद उन्हें कई घंटों तक सफदरजंग अस्पताल से बाहर नहीं जाने दिया गया। वांगचुक ने इस पूरे घटनाक्रम पर नाराजगी जताते हुए कहा कि उस दौरान उन्हें ऐसा महसूस हुआ मानो उनकी स्वतंत्रता पूरी तरह सीमित कर दी गई हो।