रायपुर, 4 सितंबर। शिक्षक दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश के शिक्षकों के नाम आत्मीय पत्र लिखकर उन्हें सादर नमन किया। उन्होंने अपने विद्यार्थी जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों का उल्लेख किया और शिक्षकों से प्रत्येक बच्चे की प्रतिभा पहचानकर उसे आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
मुख्यमंत्री ने पत्र में कहा कि मुख्यमंत्री के रूप में जब उन्हें प्रदेश के बच्चों के भविष्य और उनकी शिक्षा से जुड़े निर्णय लेने का अवसर मिलता है, तब अपना बचपन और विद्यार्थी जीवन विशेष रूप से याद आता है। जीवन में व्यक्ति कितना भी आगे बढ़ जाए, अपने शिक्षकों के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव कभी कम नहीं होता।
अपने बचपन का उल्लेख करते हुए श्री साय ने बताया कि उनका जन्म जशपुर जिले के बगिया गांव के एक साधारण किसान परिवार में हुआ और उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल से हुई। करीब दस वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में पढ़ रहे थे, पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार, खेती और छोटे भाइयों की जिम्मेदारियां भी उनके जीवन का हिस्सा बन गईं।
उन्होंने बताया कि गांव में पांचवीं तक पढ़ाई के बाद आगे की शिक्षा के लिए उन्हें कुनकुरी जाना पड़ा, जहां लोयोला उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में रहकर पढ़ाई की। आगे पढ़ने की इच्छा के बावजूद पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी शिक्षा जारी नहीं रह सकी। उन्होंने खेती की जिम्मेदारी संभालने के साथ छोटे भाइयों की पढ़ाई को आगे बढ़ाया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि उस दौर में गांव के बच्चों के लिए शिक्षा हासिल करना आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन था। विद्यालय दूर होते थे, आवागमन के साधन सीमित थे और आर्थिक व शैक्षणिक संसाधनों की कमी भी बच्चों के सपनों के सामने बड़ी चुनौती थी।
उन्होंने कहा कि आज शिक्षा की दुनिया में व्यापक बदलाव आया है। जिस पीढ़ी ने स्लेट, तख्ती और चॉक से पढ़ाई शुरू की थी, उसी छत्तीसगढ़ के बच्चे आज स्मार्ट क्लास, डिजिटल माध्यमों और आधुनिक तकनीक के जरिए दुनिया भर के ज्ञान से जुड़ रहे हैं। दूरस्थ अंचलों में भी बेहतर विद्यालय, आधुनिक शैक्षणिक संसाधन और नए अवसर बच्चों तक पहुंच रहे हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा के साधन और तकनीक भले ही बदल गए हों, लेकिन शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण आधार आज भी शिक्षक ही हैं। तकनीक जानकारी दे सकती है, पुस्तकें ज्ञान दे सकती हैं और आधुनिक संसाधन सीखने को आसान बना सकते हैं, लेकिन बच्चों में आत्मविश्वास जगाने, उनके संस्कार गढ़ने, प्रतिभा पहचानने और उन्हें बेहतर इंसान बनाने का कार्य एक संवेदनशील शिक्षक ही कर सकता है।
उन्होंने शिक्षकों से विशेष आग्रह किया कि वे उन बच्चों पर भी ध्यान दें जो अभाव, संकोच या किसी अन्य कारण से पीछे छूट रहे हैं। ऐसे बच्चों का हाथ थामकर उन्हें आगे बढ़ाना ही शिक्षक की सबसे बड़ी भूमिका और जिम्मेदारी है।




