होम छत्तीसगढ़ संकेत साहित्य समिति के 46वें स्थापना दिवस पर सजी काव्य गोष्ठी

संकेत साहित्य समिति के 46वें स्थापना दिवस पर सजी काव्य गोष्ठी

0

रायपुर, 24 सितम्बर। संकेत साहित्य समिति के 46वें स्थापना दिवस के अवसर पर राजभाषा हिन्दी पखवाड़े के अंतर्गत राजधानी के वृंदावन हॉल में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया।

      कार्यक्रम में कोलकाता से पधारे भाषाविद्, साहित्यकार एवं साहित्य त्रिवेणी के संपादक डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष शशांक शर्मा ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। भाषाविद् एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चित्तरंजन कर, व्यंग्यकार गिरीश पंकज तथा हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रेशमा अंसारी विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।

      कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती की पूजा-अर्चना से हुआ। इसके बाद संकेत साहित्य समिति की ओर से अतिथियों का अंगवस्त्र एवं श्रीफल भेंटकर सम्मान किया गया। इस अवसर पर डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड को संकेत साहित्य रत्न सम्मान’ से सम्मानित किया गया।

       समिति के संस्थापक एवं प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ ने स्वागत उद्बोधन में हिन्दी के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की संवाहिका भी है। यह देश-विदेश में रहने वाले करोड़ों लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य करती है।

     कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे शशांक शर्मा ने कहा कि संपर्क भाषा के रूप में हिन्दी के सामने कोई संकट नहीं है। उन्होंने कहा कि हिन्दी के समक्ष मुख्य चुनौती यह है कि अंग्रेजी को ज्ञान की भाषा के रूप में अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने हिन्दी के सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रभाव में हो रही वृद्धि का उल्लेख करते हुए साहित्य में हिन्दी के सरलीकरण को समय की आवश्यकता बताया।

       मुख्य अतिथि डॉ. कुँवर वीर सिंह मार्तण्ड ने हिन्दी भाषा के इतिहास और उसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हिन्दी केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह हमारी स्मृतियों, सांस्कृतिक चेतना, संवेदनाओं, संस्कृति और सामूहिक विचारधारा से जुड़ी भाषा है। उन्होंने राजभाषा हिन्दी को केंद्र में रखकर आयोजित कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे साहित्यिक चेतना, हिन्दी-प्रेम और रचनात्मक संवाद का सार्थक उदाहरण बताया।

     डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा कि भाषा अपने आप में संस्कृति और चेतना होती है। उन्होंने कहा कि हिन्दी में उन्होंने जीवन-जगत को महसूस किया है और इसमें व्यापक दृष्टि निहित है।व्यंग्यकार गिरीश पंकज ने कहा कि हिन्दी का प्रभाव पूरी दुनिया में बढ़ रहा है और कई देशों में इसे संवैधानिक स्तर पर स्थान प्राप्त है। उन्होंने हिन्दी के भविष्य को लेकर सकारात्मक संभावनाएं व्यक्त कीं।डॉ. रेशमा अंसारी ने वर्तमान परिवेश में हिन्दी की भूमिका पर चर्चा करते हुए कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से हिन्दी के विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने देवनागरी लिपि के संरक्षण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

     कार्यक्रम का संचालन पल्लवी झा ने किया। काव्य गोष्ठी में डॉ. कुँवर वीर सिंह ‘मार्तण्ड’, डॉ. चित्तरंजन कर, गिरीश पंकज, डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’, डॉ. रेशमा अंसारी, मीर अली ‘मीर’, राजेश जैन ‘राही’, उदयभान सिंह चौहान, सुरेन्द्र रावल, डॉ. दीनदयाल साहू, मधु मार्तंड, संजीव ठाकुर, डॉ. रविन्द्र सरकार, पल्लवी झा, सुषमा पटेल, हरीश कोटक, राजकुमार सोनी, छबिलाल सोनी, गणेशदत्त झा, यशवंत यदु, राजेन्द्र रायपुरी, विवेक राहटगांवकर, एच.एल. चन्द्राकर, दिलीप वरवंडकर, डॉ. सिद्धार्थ श्रीवास्तव, राजेन्द्र ओझा, कुमार जगदली, नर्मदा प्रसाद विश्वकर्मा, माधुरी कर, सीमा पांडे, डॉ. कोमल प्रसाद राठौर, मुरलीधर गोंडाने ‘नीर’, ऋषि साव, मन्नू लाल यदु ‘नाथ’, डॉ. एन.पी. यादव, वीरेन्द्र शर्मा ‘अनुज’, डॉ. (श्रीमती) कमल वर्मा, बीबीपी मोदी, भूपेंद्र शर्मा ‘भूप’, डॉ. गोपा शर्मा, कल्याणी तिवारी, विजया ठाकुर, गोपाल सोलंकी, मंजूषा अग्रवाल, प्रीतिरानी तिवारी, शशांक खरे, शोमकांत शर्मा एवं अमरदीप शर्मा सहित अनेक कवि-कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।