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बागबाहरा में गूंजी ग़ज़लों की महफिल, शायरों ने सामाजिक सरोकारों और समय की सच्चाइयों को दी आवाज़

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बागबाहरा (महासमुंद), 8 जुलाई। स्थानीय साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं ‘साहित्य संदेस’ और ‘लोक कलाकार संरक्षण समिति’ के संयुक्त तत्वावधान में बागबाहरा में जिले के शायरों और कवियों की एक यादगार ग़ज़ल संध्या का आयोजन किया गया। लालपुर स्थित सुरमाल साहू समाज के सभाकक्ष में आयोजित ‘ग़ज़लों की गूंज’ शीर्षक इस मुशायरे में साहित्य प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

     बारिश से भीगे खुशनुमा माहौल में आयोजित इस कार्यक्रम में महासमुंद के अशोक शर्मा, सलीम कुरैशी और श्लेष चंद्राकर, बागबाहरा के हबीब खान ‘समर’, पिथौरा के प्रवीण ‘प्रवाह’, स्वराज्य करुण, निर्वेश दीक्षित तथा धनराज साहू सहित कई रचनाकारों ने अपनी ग़ज़लों और काव्य पाठ से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पड़ोसी गांव कोमाखान से आए राजू कोमाखान (राजकुमार अग्रवाल) ने भी अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया।

     मुशायरे की विशेषता यह रही कि अधिकांश रचनाओं में आम आदमी के जीवन से जुड़े मुद्दे, सामाजिक विसंगतियां, आर्थिक असमानताएं और बदलते समय की विडंबनाएं प्रमुखता से उभरकर सामने आईं। कवियों ने अपनी संवेदनशील अभिव्यक्तियों के माध्यम से समाज में घटित घटनाओं और मानवीय पीड़ा को शब्द दिए।

     कार्यक्रम का आगाज हबीब खान ‘समर’ की ग़ज़ल से हुआ। उनकी पंक्तियां—

ज़िन्दगी को नया मोड़ देना पड़ा,कसमें, वादे, वफ़ा तोड़ देना पड़ा।जब चमन को किसी की ज़रूरत नहीं,बागबाँ को चमन छोड़ देना पड़ा।”

—ने शुरुआत से ही श्रोताओं का दिल जीत लिया।

सलीम कुरैशी ने बदलते सामाजिक मूल्यों पर कटाक्ष करते हुए कहा—

इज़्ज़तों-अदब का तरीका भूल चुके हैं,बात तो करते हैं, लोग सलीका भूल चुके हैं।”

   श्लेष चंद्राकर ने ईमानदारी और मानवीय मूल्यों पर आधारित अपनी ग़ज़लों से खूब सराहना बटोरी, जबकि प्रवीण ‘प्रवाह’ ने प्रकृति और संवेदनाओं को अपनी रचनाओं में प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया।

   अशोक शर्मा ने वर्तमान समय की विसंगतियों को शब्द देते हुए अपनी ग़ज़ल में कहा—

ठौर कोई न कोई डेरा है,वक़्त बेघर है, बेबस-बसेरा है।मंत्र साँपों ने इस तरह साधा,बीन पर नाचता सपेरा है।”

    स्वराज्य करुण ने समकालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण किया, वहीं नवोदित कवि निर्वेश दीक्षित ने सच लिखने की कठिनाइयों को अपनी पंक्तियों में प्रभावी ढंग से व्यक्त किया।

    मुशायरे के संयोजक धनराज साहू ने छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल प्रस्तुत कर स्थानीय बोली की मिठास और मिट्टी की खुशबू से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।

  कार्यक्रम के अंत तक सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। बागबाहरा नगर पालिका के उपाध्यक्ष देवेश साहू मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उनके साथ जनक साहू, जसवंत भारती, सी.पी. तिवारी, लायक राम, पांडेय जी, अविनाश जी, चेतन महाराज, अनुराग द्विवेदी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी नागरिक देर तक कार्यक्रम में मौजूद रहे।

   मुशायरे के समापन पर सभी शायरों, कवियों और साहित्य प्रेमियों ने आयोजन की सराहना करते हुए सामूहिक छायाचित्र भी खिंचवाया। बागबाहरा में आयोजित यह ग़ज़ल संध्या साहित्य और संवेदनाओं का एक यादगार आयोजन बन गई।