जब मैं किसी बच्चे के लिए चश्मे की सलाह देती हूं, तो माता-पिता के मन में गुस्सा, निराशा, दुख और अपराधबोध जैसी भावनाएं बारी-बारी से आती हैं। मैं इस सिलसिले को न केवल अपने क्लिनिक में हर रोज देखती हूं, बल्कि मैंने इसे खुद तब जिया था जब मेरी अपनी पांच साल की बेटी को पहली बार चश्मा लगा था। इसके बाद माता-पिता का यही सवाल होता है कि क्या इसे रोका जा सकता था?
वे अक्सर कहते हैं कि हमारी उम्र में हमें चश्मे की जरूरत नहीं थी। दरअसल, आज के बच्चों का जीवन पूरी तरह बदल चुका है। पहले बच्चे स्कूल के बाद देर शाम तक गलियों में साइकिल चलाते और दौड़ते-भागते रहते थे। आज का बचपन छोटे घरों, लंबे स्कूल घंटों, ट्यूशन और संगीत कक्षाओं के बीच सिमट कर रह गया है। सुरक्षित बाहरी जगहों की कमी के कारण बच्चे अब घरों के अंदर बंद रहने को मजबूर हैं।
बदलता हुआ बचपन
आज संयुक्त परिवारों का सहारा न होने के कारण माता-पिता ने स्क्रीन को एक व्यावहारिक समाधान मान लिया है। टीवी, टैबलेट और स्मार्टफोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। यह माता-पिता द्वारा बच्चों की अनदेखी नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन का एक समझौता है। लेकिन बढ़ती आंखों के लिए इसके परिणाम बहुत गंभीर हैं। लगातार पास की चीजों को देखना मायोपिया यानी निकट-दृष्टि दोष को बढ़ाने वाला सबसे बड़ा कारण है। इसके विपरीत, बच्चे की नजर को सुरक्षित रखने वाले दो सबसे बड़े सुरक्षा कवच-प्राकृतिक धूप और बाहर खुले में खेलना-आज के बच्चों की दिनचर्या से पूरी तरह गायब हो चुके हैं।
आंकड़ों की गवाही
शहरी इलाकों के बच्चों में ग्रामीण बच्चों की तुलना में मायोपिया होने की संभावना दो से तीन गुना अधिक होती है। गुरुग्राम की झुग्गी-झोपड़ियों में हमारे काम के दौरान एक बड़ा अंतर दिखा। वहां स्कूल न जाने वाले बच्चों में चश्मे की जरूरत 2% से कम थी, जबकि स्कूल जाने वाले बच्चों में यह 20% के करीब थी। जो बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, वे अपनी परिस्थितियों के कारण दिनभर बाहर खुली धूप में बिताते थे। वे मिट्टी, पत्थरों और डंडों से आपस में खेलते थे। हालांकि वे कुपोषित थे और उन पर किसी की निगरानी नहीं थी, फिर भी उन्हें चश्मे की जरूरत नहीं थी। यह शोध साफ दिखाता है कि बढ़ती आंखों को धूप की सख्त जरूरत है।
आंखों का बचाव
जब बच्चा लगातार मोबाइल, टैबलेट या किताबों जैसी पास की चीजों को देखता है, तो उसकी आंखें उसी के अनुकूल ढल जाती हैं। वैज्ञानिक अभी भी इस पर शोध कर रहे हैं कि धूप आंखों की रक्षा कैसे करती है, लेकिन यह साबित हो चुका है कि बाहर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में मायोपिया का खतरा बहुत कम होता है। स्कूलों में होने वाली वार्षिक आंखों की जांच हर मामले को नहीं पकड़ पाती क्योंकि नजर कभी भी बदल सकती है। बच्चे अक्सर अपनी दृष्टि की कमजोरी को छिपाते हैं या समझ नहीं पाते। ऐसे में माता-पिता को खुद ध्यान देना होगा कि बच्चा टीवी के पास तो नहीं बैठता या पढ़ते समय आंखें तो नहीं मलता।
कुछ जरूरी आदतें
इस समस्या से बचने के लिए बच्चों को हर दिन कम से कम दो घंटे बाहर धूप में खेलने के लिए प्रोत्साहित करें। घर में कुछ समय पूरी तरह स्क्रीन-फ्री रखें और आंखों की नियमित जांच करवाएं। स्क्रीन देखते समय ’20-20-20′ के नियम का पालन करें; हर 20 मिनट बाद 20 फीट दूर किसी वस्तु को 20 सेकंड तक देखें। बच्चों के विकास के लिए तकनीक जरूरी है, लेकिन उनकी आंखों के स्वास्थ्य के लिए धूप, शारीरिक गतिविधि और खुला स्थान उससे भी ज्यादा जरूरी हैं। माता-पिता के रूप में आप आज जो सबसे आसान और बड़ा काम कर सकते हैं, वह यह है कि घर का दरवाजा खोलें और बच्चों को बाहर खेलने भेजें।




