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हिंदू धर्म में किसी भी पूजा के बाद प्रसाद बांटना क्यों जरूरी माना जाता है? 

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हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के कई नियम बताए गए हैं जिनमें से एक सबसे जरूरी है किसी भी पूजा के बाद देवताओं को भोज अर्पित करना।

यही नहीं पूजा के समापन के बाद आपको प्रसाद दूसरों को बांटना और स्वयं भी ग्रहण करना चाहिए। इससे पूजा का पूर्ण फल मिलता है और प्रसाद खाने से शरीर के रोगों को मुक्ति भी मिलती है।

प्रसाद चढ़ाने और इसे दूसरों को बांटकर खाना धर्म के अनुकूल माना जाता है और श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार भी पूजा के बाद प्रसाद बांटने को जरूरी बताया गया है और इस बारे में भी बताया गया है कि कैसे प्रसाद ग्रहण करने से समस्त पापों को दूर करने में मदद मिलती है। आइए आपको बताते हैं प्रसाद के महत्व के बारे में और इससे जुड़े कुछ अन्य नियमों के बारे में।

हिंदू धर्म के अनुसार क्या होता है प्रसाद
हिंदू परंपरा में, प्रसाद उस पवित्र भोजन को दर्शाता है जो देवताओं को भक्तों द्वारा अर्पित किया जाता है और फिर इसे भगवान को चढ़ाने के बाद भक्तों को आशीर्वाद के रूप में बांटा जाता है। किसी भी प्रसाद को प्यार, शुद्धता और धार्मिक परंपराओं का पालन करते हुए तैयार करने की सलाह दी जाती है जिससे यह पूजा के लिए एक जरूरी हिस्सा बन जाए।

प्रसाद का महत्व क्या है
किसी भी हिंदू पूजा में प्रसाद का महत्व आध्यात्मिक गहराई से जुड़ा होता है। देवताओं के लिए भोजन तैयार करने या अर्पित करने से पहले, भक्त स्नान करते हैं, साफ कपड़े पहनते हैं और मन को शुद्ध रखते हैं।

इन परंपराओं पालन करने के बाद जो प्रसाद तैयार किया जाता है वो ईश्वर को स्वीकार्य माना जाता है। प्रसाद को नैवेद्यम भी कहा जाता है और भगवान को प्रसाद चढ़ाना समर्पण का एक कार्य माना जाता है।

मान्यता है कि पूजा में प्रसाद चढ़ाने और ग्रहण करने से मानसिक शांति मिलती है और नकारात्मकता दूर होती है। इसके साथ ही प्रसाद चढ़ाने और ग्रहण करने से आध्यात्मिक विकास भी होता है। प्रसाद की हर एक सामग्री आध्यात्मिक ऊर्जा और पूजा के दौरान पढ़े गए मंत्रों से ओत-प्रोत होती है। इसलिए यह भी अत्यंत शुभ बन जाती है।

प्रसाद के महत्व को बताता है श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक
श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के तेरहवें श्लोक में प्रसाद का महत्व एक श्लोक के माध्यम से बताया गया है। यह श्लोक है ‘ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।’ इस श्लोक का मतलब यह है कि जो लोग पूजा या यज्ञ में भगवान को भोग लगाकर बचा हुआ अन्न और प्रसाद खाते हैं, वे सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। इसी वजह से प्रसाद तैयार करना और इसे दूसरों को बांटकर स्वयं ग्रहण करना जरूरी माना जाता है।

पूजा के बाद प्रसाद बांटना जरूरी है
ऐसी मान्यता है कि यदि आप प्रसाद बांटकर ग्रहण करते हैं तो इससे आपके घर में धन-धान्य की कमी नहीं होती है और पूजा का पूर्ण फल भी मिलता है।

यही नहीं अगर आप प्रसाद के रूप में चीनी भी अर्पित कर रहे हैं तो उसे भी बांटकर ही खाना चाहिए। इससे ईश्वरीय आशीर्वाद आपके जीवन में सदैव बना रहता है।

जिस प्रकार पूजा-पाठ के कई नियम बनाए गए हैं, वैसे ही पूजा के समापन पर प्रसाद अर्पित करना और दूसरों को बांटना भी पूजा की पूर्णता का ही हिस्सा माना जाता है।