पिछले दिनों भारत सरकार ने यह फैसला किया था कि देश में 100 विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति देंगे और जून माह तक 15 विदेशी विवि को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी विवि को अनुमति के पीछे औपचारिक कारण या तर्क यह बताया जा रहा है कि जो विद्यार्थी बाहर पढ़ने जाते थे उनके ऊपर औसतन 80 लाख से 1 करोड़ रुपया खर्च होता था और अब यह खर्च बच जायेगा। यह भी कि जो लोग बाहर पढ़ने जाते हैं उनमें से मुश्किल से 1 प्रतिशत विद्यार्थियों को विदेशों में रोजगार मिल पाता है। यह दोनों बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं और यह भी है कि अब अमेरिका, ब्रिटेन जैसे देश अपने यहां पढ़ने आने वाले लोगों को स्थाई रूप से बसने में कई प्रकार के प्रतिबंध लगा रहे हैं। जैसे पहले अमेरिका में पढ़ने वाले छात्र के लिए पढ़ाई के बाद वहां रहकर नौकरी तलाशते रहने की समयावधि कई वर्ष थी परंतु अब अमेरिका ने घटाकर 1 से 3 माह कर दी और इतने में अगर नौकरी नहीं मिलती है तो उन्हें देश वापस आना होगा। वीजा नियमों में भी काफी सख्ती की जा रही है और उसका कारण है कि अब अमेरिका भी बाहर से आने वालों के बोझ सहने से मुक्त होना चाहता है तथा अमेरिका की बढ़ती बेरोजगारी को दूर करने के लिये अमेरिकी नौजवानों को अघोषित पात्रता देना चाहती है। श्री डोनाल्ड ट्रंप के इस दूसरे कार्यकाल में फिर से वह पुराना नारा दुहराया जाने लगा है। अमेरिकन फर्स्ट या वी अमेरिकन, बाय अमेरिकन। इतना ही नहीं अब बाहर के देशों से गये हुये लोग अपने आपको पहले जैसा सुरक्षित नहीं मानते हैं। क्योंकि पिछले वर्षों में हेट क्राइम की घटनायें बढ़ी हैं। जिसका शिकार कुछ भारतीय परिवार भी हुये हैं। ऐसी घटनायें अब ब्रिटेन में भी शुरू हुई हैं और वहां भी बदलाव आ रहे हैं।
1950 के बाद से अमेरिका भारतीयों और विशेषतः भारत के श्रेष्ठ वर्ग का प्रिय देश रहा है। भले ही देश की सरकार और अमेरिकन सरकार में वैचारिक फर्क रहा हो परंतु वहां की तरक्की, सिस्टम, व्यवस्था की चर्चा भारतीय उच्च, उच्च मध्यम परिवारों में आम थी। पिछले दशकों में बहुत से भारतीय अमेरिकी नागरिक बने और वहीं बस गये। उस समय भारत के बुद्धिजीवी इसका तर्क देते थे कि यह ब्रेन ड्रेन हो रहा है क्योंकि भारत में योग्यता की वह कीमत नहीं मिलती जो अमेरिका में मिलती है। यह भी गर्व करते थे कि अमेरिका के वैज्ञानिक खोजों के पीछे भारतीयों का बौद्धिक योगदान है। हर गोविन्द लाल खुराना जिन्होंने जीन्स की खोज की थी, उनको उद्धृत किया जाता था। नासा में काम करने वाले वैज्ञानिकों का उल्लेख किया जाता था परंतु अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। अब अमेरिका में वीजा लेने के लिये या नागरिकता लेने के लिये अप्रवासियों से पैसा वसूला जा रहा है। जिस व्यक्ति को वहां की नागरिकता चाहिये उसको योग्यता के आधार पर प्रवेश नहीं है बल्कि धन और पूँजी के आधार पर प्रवेश मिलेगा। ऐसी स्थिति यूरोप के सभी देशों में बन रही है और यह स्वाभाविक ही है क्योंकि अब उन देशों में आबादी बढ़ी है, बेरोजगारी बढ़ी है। बहुत संभव है इन्हीं परिस्थितियों के दबाव में भारत सरकार ने यह नई नीति बनाई है जो कि उनके घोषित स्वदेशी नारे के खिलाफ है। एक तरफ भारत सरकार व उनके नियंत्रक कहते हैं कि हम विश्व गुरु हैं और दूसरी तरफ भारत के छात्रों को पढ़ाने के लिये विदेशी गुरु आयेंगे। पर हमारे देश में इन बातों पर कोई प्रश्न नहीं उठाता, क्योंकि सब चलता है, यह संस्कृति उभर रही, पर इनके पीछे अंदरूनी कारण कुछ और है।
अब सरकार से यह पूछा जा रहा है कि जो विवि देश में आ रहे हैं इनका पाठयक्रम कौन तय करेगा? जाहिर है कि इन विदेशी विवि के जो पाठयक्रम वहां के हैं, वही चलेंगे। एक तरफ यही सत्ताधीश कहते हैं कि अंग्रेज के लार्ड मैकाले ने भारतीय शिक्षा को नष्ट किया है और अपने लिये बाबू तैयार करने के लिये शिक्षा का ढाँचा बनाया। दूसरी तरफ अब यही लोग लार्ड मैकाले को, विदेशी शिक्षा को वापस भारत ला रहे हैं। भारतीय शिक्षा की स्थिति यह है कि भारत का एक भी विवि विश्व की गणना में शीर्ष में शामिल नहीं हो पाता।
इसके अलावा जो दो अन्य तर्क दिये गये हैं उनकी पड़ताल जरूरी है। एक सरकारी अनुमान के अनुसार लगभग 5.50 लाख विद्यार्थी भारत में ही विधिवत शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और बाहर रहने किराये आदि या खर्च आदि में लाखों रुपया बचेगा। मुझे इस आंकड़े पर कोई आपत्ति नहीं है परंतु दूसरा पहलू देश जानना चाहेगा कि जो यह विवि यहां आ रहे हैं उन्हें इससे कितना लाभ होगा? अगर एक विद्यार्थी की फीस तीन-चार वर्षों में साल के 10 लाख रुपये के हिसाब से मान लिया जाये जो कि कम ही है तो एक वर्ष में इन विद्यार्थियों की फीस से न्यूनतम 5 लाख करोड़ बच जायेगा और चार वर्ष में 20 लाख करोड़ रुपया विदेशों में फीस के रूप में जायेगा। यह आंकड़ा भी मैंने मात्र 10 लाख रुपया प्रतिवर्ष की फीस पर जोड़ा है। हालांकि अलग-अलग विवि के अलग-अलग रेट हैं। कुछ विवि की फीस तो साल में करोड़ों रुपयों की है। दूसरे ये जो विद्यार्थी जहां पात्र होंगे, इनमें से जो विदेशी सरकारों के जरूरत के होंगे वे, उन्हें ही वे ले जायेंगे, शेष भारत में ही अपने रोजगार की संभावना तलाशेंगे। भारतीय लोगों का विदेशों में काम करने का या बड़ी नौकरी करने का प्रतिशत मुश्किल से 20 प्रतिशत रह जायेगा। 80 प्रतिशत नौजवान याने लगभग 4 लाख नौजवान भारत में ही रहकर नौकरी की तलाश करेंगे। उनकी जीवनशैली, मानसिक और जरूरतों के हिसाब से कितनों को भारत में रोजगार मिल पायेंगे, यह भी एक सवाल है?
एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि तकनीकी अध्ययन व ज्ञान के लिये छात्र विदेशी संस्थाओं के क्लाउड का इस्तेमाल कर सकेंगे, और इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उस तकनीक की खोज और उसका ज्ञान इन्हें उस रूप में नहीं हो सकेगा, बल्कि एक प्रकार से निर्भरता स्थाई रूप से पैदा होगी।
पाश्चात्य या विदेशी संस्कृति को अभी ये भारतीय छात्र बाहर जाकर देखते और सीखते थे अब देश में ही बन रहे इन विदेशी टापुओं में ये लाखों छात्र जब विदेशी जीवनशैली, मानसिक संस्कार और भाषा पर निर्भर होंगे तब वे भारत के आम मानस को उसी दिशा में ले जाने के लिये प्रेरित करेंगे। अभी तक जो 5.50 लाख विद्यार्थी बाहर पढ़ने जाते थे वे 4-5 साल तक उस विदेशी वातावरण में रहते थे परंतु देश में लौटने के बाद वे अपने मूल को फ्रिर यादकर उससे जुड़ने का प्रयास करते थे। अब हो सकता है कि 5.50 लाख छात्र अपने देश के याने भारतीय छात्रों जो अन्य विवि या कालेज में पढ़ रहे को उस जीवनशैली के लिये आकर्षण का केंद्र बन जाये और देश में विदेशी मानसिकता और जीवनशैली को प्रभावित करें। स्वाभाविक है कि जिन परिवारों के बच्चे होंगे, उनके परिवार भी इनसे प्रभावित होंगे।
इसका प्रभाव भारतीय राजनीति पर भी अनेक रूप से पड़ेगा। अभी जो छात्र विदेशों से पढ़कर आये हैं वे देश की राजनीति को विदेशी राजनीति के पैमाने से देखते हैं उनके विदेशों में राजनैतिक प्रचार, राजनीति दृष्टिकोण और सोचने के तरीके बदलेंगे। जो भारत वसुधैव कुटुम्बकम की सोच पर, समरसता चाहता है। गरीब-अमीर के भेद को मिटाना चाहता है और अभी तक भारतीय राजनीति के चुनाव के आधार इस आधार पर होते रहे हैं वे मापदंड बदले जा सकते हैं। और मैं, केवल अपने लिये, अपने निजी परिवार के लिये, इस दृष्टिकोण पर जा सकते हैं। विषमता को मिटाना और समता का समाज बनाना आदर्श लक्ष्य होना चाहिये वह पूँजीवादी सोच में बदल सकता है। हम अपने वर्ग के लिए जिसे सिविल सोसायटी और सेलिब्रिटी तक ही देखा जाता है संवेदनायें व मानवीय पीड़ायें यही तक सिमट सकती हैं। पहले ही देश में लाखों की संख्या में विदेशी फंडिंग प्राप्त एनजीओ कार्यरत हैं जो भारतीय राजनीति को विचारधारा से हटाकर केवल तात्कालिकता के सिद्धांत पर ले जाने के माध्यम बने हैं। हमारे देश में परंपरा रही है कि जो हमारी संस्कृति भी है कि भविष्य में पानी की आवश्यकता पड़ेगी इसलिये पहले कुआं व बावड़ी तैयार करो परंतु विदेशी पूंजीवादी विचारधारा का कहना है कि पहले कुआं खोदने की आवश्यकता नहीं है। जब प्यास लगेगी तब खोदेंगे। और यह पाश्चात्य दर्शन, देश, प्रकृति और मानवता के बुनियादी मूल्यों को नष्ट करने वाला है। आज एआई, चैट जीपीटी और कितने ही नये माध्यम आये हैं सेाशल मीडिया पर, फेसबुक, वाटसअप से आगे बढ़कर एक्स और इंस्टाग्राम पर पहुंचे हैं। इन सबसे देश में एक बड़े झूठ का पहाड़ खड़ा हो रहा है। तकनीक का इस्तेमाल मानवता के लिये हो यह तो स्वीकार है मगर तकनीक इंसान बनने लगे, इंसान को वैचारिक रूप से शैतान और हैवान बनाने लगे, रोजगारों को मिटाकर बेरोजगारी की फसल पैदा करने लगे, देश की पूंजी विदेश में जाने लगे तो ऐसी तकनीक व ऐसा विकास न केवल अत्याज्य है बल्कि एक अर्थ में राष्ट्रीय अपराध और धार्मिक दृष्टिकोण में पाप के समान है। क्या कभी सरकारें, देश अपने शिक्षा के नये खोल रही विदेशी दुकानों को इन कसौटियों पर कसेगी?
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।




