नई दिल्ली, 14 सितंबर। समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर जारी राजनीतिक और कानूनी बहस के बीच केंद्र सरकार ने इसके व्यापक क्रियान्वयन को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक कानून लागू करना केवल चुनावी वादा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक आवश्यकता है।
श्री शाह ने उत्तराखंड में लागू समान नागरिक संहिता को इसके सफल क्रियान्वयन का उदाहरण बताते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए अपनी इस वैचारिक प्रतिबद्धता को तय समय सीमा में जमीन पर उतारने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। उनके अनुसार, इससे देश के नागरिक कानूनों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।
गृह मंत्री के मुताबिक, 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के 21 राज्यों में व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर समान नागरिक संहिता लागू करने का लक्ष्य है। उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन चुका है, जहां यूसीसी लागू किया गया है। वहीं गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और असम सहित कुछ अन्य राज्यों में इसे लेकर मसौदा तैयार करने और कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ाने का काम जारी है।
समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद विवाह, तलाक, गोद लेने और पैतृक संपत्ति में अधिकार जैसे नागरिक मामलों में धर्म के आधार पर अलग-अलग प्रावधानों के स्थान पर समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। केंद्र सरकार का तर्क है कि इससे नागरिकों के लिए कानूनों में समानता आएगी और विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों को अधिक प्रभावी कानूनी संरक्षण मिल सकेगा।
हालांकि, यूसीसी के दायरे को लेकर गृह मंत्री ने आदिवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकारों और रीति-रिवाजों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर सहित देश के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों की पारंपरिक व्यवस्थाओं और सांस्कृतिक अधिकारों को यूसीसी से बाहर रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृति और उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं की जाएगी।
विपक्षी दलों की ओर से यूसीसी को लेकर उठाए जा रहे सवालों के जवाब में शाह ने गोवा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि गोवा में लंबे समय से कॉमन सिविल कोड लागू है और उत्तराखंड में भी यूसीसी के सकारात्मक परिणाम देखने को मिल रहे हैं।
गृह मंत्री ने कहा कि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में समान नागरिक संहिता की परिकल्पना की गई है। उनके अनुसार, संविधान निर्माताओं की इस सोच को आगे बढ़ाना सरकार की जिम्मेदारी है और मोदी सरकार इसी प्रतिबद्धता के साथ यूसीसी को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
यूसीसी को लेकर केंद्र की यह समयसीमा देश में व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से जुड़े मामलों में व्यापक बदलाव की संभावना की ओर संकेत करती है। हालांकि, विभिन्न राज्यों में इसकी प्रक्रिया और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार इसके प्रावधानों का स्वरूप महत्वपूर्ण रहेगा।




