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बस्तर दशहरा जनजातीय विरासत एवं सामाजिक समरसता का जीवंत प्रतीक : राष्ट्रपति मुर्मु

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जगदलपुर, 23 अक्टूबर। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने कहा कि विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक गौरव, सामूहिक आस्था, सामाजिक समरसता और समृद्ध जनजातीय विरासत का जीवंत प्रतीक है। लगभग 75 दिनों तक चलने वाला यह अनूठा उत्सव विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में बांधने और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को संरक्षित रखने का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने बस्तर दशहरा में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए माँ दंतेश्वरी को नमन किया।

    राष्ट्रपति शुक्रवार को यहां आयोजित बस्तर दशहरा उत्सव को संबोधित कर रही थीं। उन्होंने कहा कि इस उत्सव की सबसे बड़ी विशेषता विभिन्न गोत्रों, समुदायों और समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी है। रथ निर्माण से लेकर पूजा-अर्चना और विभिन्न अनुष्ठानों तक प्रत्येक समुदाय अपनी परंपरागत जिम्मेदारी निभाता है। यह सामूहिक सहभागिता सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और सांस्कृतिक निरंतरता का असाधारण उदाहरण है।

    श्रीमती मुर्मु ने मुरिया दरबार को जमीनी स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए कहा कि यहां समाज के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधि एक साथ बैठकर जनसमस्याओं और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं। सामूहिक संवाद से समाधान निकालने की यह परंपरा भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है और लोकतांत्रिक मूल्यों को नई प्रतिष्ठा प्रदान करती है।

    उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज में अपार प्रतिभा और संभावनाएं हैं। उचित अवसर, प्रोत्साहन और संसाधन मिलने पर जनजातीय समाज के बेटे-बेटियां हर क्षेत्र में देश का गौरव बढ़ा सकते हैं। राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों की सराहना करते हुए कहा कि ये आयोजन युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने और उनकी प्रतिभा को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उचित मंच मिलने पर बस्तर के युवा अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं, यहां तक कि ओलंपिक में भी देश के लिए पदक जीत सकते हैं।

    राष्ट्रपति ने छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद से मुक्ति तथा सुरक्षा और विकास के क्षेत्र में हो रहे सकारात्मक बदलावों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि नक्सलवाद की पीड़ा से मुक्त होकर बस्तर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ेगा और यहां के युवा अपनी प्रतिभा, परिश्रम एवं सहभागिता से देश की विकास यात्रा में महत्वपूर्ण योगदान देंगे।

    प्रकृति संरक्षण को जनजातीय परंपराओं का अभिन्न अंग बताते हुए श्रीमती मुर्मु ने कहा कि जनजातीय समाज पेड़-पौधों, जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को जीवनदाता के रूप में देखता है। प्रकृति हमें ऑक्सीजन, जल, भोजन और औषधियां प्रदान करती है, इसलिए उसकी पूजा के साथ संरक्षण और संवर्धन भी आवश्यक है। उन्होंने नागरिकों से अधिकाधिक पौधरोपण करने, वनों की रक्षा करने और प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने का आह्वान किया, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए यह अमूल्य धरोहर सुरक्षित रह सके।

     बस्तर के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि रामायण में इस क्षेत्र का संबंध दंडकारण्य से जोड़ा जाता है। भगवान श्रीराम के वनवास और माता शबरी से जुड़े प्रसंग यहां की सांस्कृतिक स्मृतियों का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता की पवित्रता और माता शबरी की भक्ति से प्रेरणा लेकर समाज को नैतिकता, मर्यादा और मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। बस्तर की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण प्रत्येक नागरिक का दायित्व है।

     श्रीमती मुर्मु ने कहा कि छत्तीसगढ़ में विकास की नई संभावनाएं खुल रही हैं। जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सुविधाओं और बाजार से जोड़ने के प्रयास समावेशी विकास की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि समाज के सभी वर्गों को समान अवसर उपलब्ध कराकर वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में जनजातीय समाज की भागीदारी और मजबूत होगी। उन्होंने माँ दंतेश्वरी से बस्तरवासियों के उज्ज्वल भविष्य, छत्तीसगढ़ की प्रगति और समग्र विकास की कामना की।

     इस अवसर पर राज्यपाल  रमेन डेका ने बस्तर दशहरा को सामूहिकता, संवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक बताया। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति का स्वागत करते हुए कहा कि बस्तर दशहरा जनजातीय संस्कृति और लोकतांत्रिक परंपराओं की सुंदर अभिव्यक्ति है। उन्होंने बस्तर के विकास के लिए सड़क, रेल, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयासों की जानकारी देते हुए विश्वास जताया कि बस्तर विकास की नई ऊंचाइयों को छुएगा।