नई दिल्ली, 7 नवंबर। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की संभावनाओं को लेकर भरोसा जताया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की राजनीतिक स्थिति और चुनावी संभावनाएं लगातार बेहतर हो रही हैं। पार्टी समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों के साथ मिलकर आगे बढ़ रही है और उसके नेता तथा कार्यकर्ता देशभर में सक्रिय हैं। सोनिया गांधी ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में देश की जनता बेहतर शासन और नीतियों को प्राथमिकता देगी।
सोनिया गांधी ने ये बातें अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द हिंदू’ को दिए एक विशेष इंटरव्यू में कहीं। उनकी पुस्तक Belonging: A Journey of Love का प्रकाशन 10 नवंबर को दुनिया भर में होने जा रहा है। पुस्तक के प्रकाशन से पहले दिए गए इस इंटरव्यू में उन्होंने कांग्रेस की राजनीतिक रणनीति, 2029 के लोकसभा चुनाव, लोकतंत्र, निर्वाचन आयोग, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर), आपातकाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी।
कांग्रेस के भविष्य को लेकर निराशा की संभावनाओं को खारिज करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि पार्टी मुश्किल राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद लगातार आगे बढ़ रही है। कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता गांवों से लेकर जिला स्तर तक सक्रिय हैं और संविधान में निहित मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के सामने अनेक चुनौतियां हैं, लेकिन इसके बावजूद नेताओं और कार्यकर्ताओं का उत्साह कम नहीं हुआ है। यही कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत है।
2029 में सत्ता परिवर्तन की जताई उम्मीद
इंटरव्यू के दौरान सोनिया गांधी से पूछा गया कि क्या 2029 के लोकसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद देश की राजनीति दोबारा नीतियों और कार्यक्रमों पर केंद्रित हो सकेगी? इस पर उन्होंने कहा कि वह निराशावादी नहीं हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा सरकार के कार्यकाल में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिले हैं। इसके बावजूद विपक्ष अपनी राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।
उन्होंने विश्वास जताया कि कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं दिन-ब-दिन बेहतर हो रही हैं। पार्टी समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर काम कर रही है और आने वाले समय में बेहतर शासन, विकास तथा जनहित से जुड़े मुद्दे राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आएंगे।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थिति पर जताई चिंता
सोनिया गांधी ने देश के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं की मौजूदा स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं की भूमिका को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। लोकतंत्र की मजबूती के लिए इन संस्थाओं की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखना जरूरी है। इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
उन्होंने निर्वाचन आयोग, मुख्यधारा के मीडिया और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी राय रखी। सोनिया गांधी के अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था तभी मजबूत रह सकती है, जब संवैधानिक संस्थाएं निष्पक्ष तरीके से काम करें और जनता का उन पर भरोसा कायम रहे।
उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि चुनाव व्यवस्था में पारदर्शिता के साथ मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
इमरजेंसी के फैसले का किया बचाव, अधिकारों के निलंबन का भी जिक्र
सोनिया गांधी ने 1975 से 1977 के बीच देश में लागू आपातकाल यानी इमरजेंसी के दौर पर भी विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के संदर्भ में कहा कि देश में हालात तेजी से बिगड़ रहे थे। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हिंसक हो रहे थे। सरकारी कार्यालयों और सार्वजनिक परिवहन को आग के हवाले किया जा रहा था। संगठित विरोध प्रदर्शनों के साथ-साथ नौकरशाही और सशस्त्र बलों से सरकारी आदेशों की अवहेलना करने की अपीलें भी की जा रही थीं।
सोनिया गांधी ने कहा कि जब वह उस समय की परिस्थितियों को इंदिरा गांधी के नजरिये से देखती हैं, तो उन्हें लगता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री तेजी से बिगड़ते हालात पर काबू पाने की कोशिश कर रही थीं।
हालांकि, उन्होंने इमरजेंसी के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगे प्रतिबंधों और बंदी प्रत्यक्षीकरण (हैबियस कॉर्पस) के अधिकार के निलंबन का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि आपातकाल के बाद इंदिरा गांधी ने परिस्थितियों की गंभीरता को समझा और मार्च 1977 में लोकसभा चुनाव कराने का फैसला किया। इस तरह सोनिया गांधी ने उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ आपातकाल के लोकतांत्रिक प्रभावों को भी स्वीकार किया।
पीएम मोदी की राजनीतिक छवि पर टिप्पणी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा और उनकी साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ी छवि पर टिप्पणी करते हुए सोनिया गांधी ने कहा कि उनकी चाय बेचने वाले परिवार से आने और संघर्ष के जरिए राजनीति में आगे बढ़ने की छवि को उनकी प्रचार टीम ने संभवतः जरूरत से ज्यादा प्रचारित किया है।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के भीतर एक साधारण पृष्ठभूमि से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की और धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई।
सोनिया गांधी ने इस संदर्भ में कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि राजनीति में आगे बढ़ने के कई रास्ते होते हैं और हर व्यक्ति की अपनी अलग यात्रा होती है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक सफलता को केवल उसकी पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए।




