Saturday , January 17 2026

दिल्ली विस्फोट कांड : एक विश्लेषण – रघु ठाकुर

 समय बहुत सारे घाव भर देता है और घटनाओं को समाज की याददाश्त से पीछे कर देता है।जब तक मीडिया घटनाओं को जिंदा रखता है, जब तक वह आम और जन चर्चा में नजर आती हैं, परंतु मीडिया से ओझल होने के बाद केवल याद में दर्ज होकर रह जाती हैं। ऐसी ही घटना 10 नवंबर 25 को दिल्ली में हुई थी जो कुछ समय तक मीडिया और देश में चर्चित रही। 10 नवंबर की शाम को दिल्ली का विस्फोट कांड, जिसमें लगभग 13 लोग मारे गए थे।

   इसके कुछ माह पहले पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था, जिसमें पर्यटक मारे गए थे, उसके बाद भारत सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर के माध्यम से पाक सीमा के अंदर जाकर अनेकों आतंकवादियों को मारा था और पाक सेना के कई मुख्य आतंकवादी अड्डों को नष्ट किया था, क्योंकि पहलगाम आतंकवादी घटना में सीधा पाक शामिल था अतरू सरकार के पास इसका ठोस आधार भी था और देश ऐसी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा भी कर रहा था। अब दिल्ली में जो विस्फोट कांड हुआ है अभी तक प्राप्त सूचनाओं के अनुसार उसके पीछे भी पाकिस्तान की खुफियां एजेंसियां हैं, जो भारत में पहले भी आतंकवाद को प्रायोजित करती रही हैं और अभी भी कर रही हैं। इस आतंकवादी विस्फोट में जो मुख्य सूत्रधारों के नाम आए हैं उनके नाम डॉक्टर मुजम्मिल शकील, डॉक्टर आदिल, डा उमर अहमद और शाहीन शाहिद के नाम मुख्य हैं, इनमें से एक शाहीन को छोड़कर बाकी तीनों लोग कश्मीरी हैं। यह बताया जा रहा है कि पाक के ड्रोन की मदद से जम्मू के खेतों में विस्फोटक गिराया था जहां से सेव फल की आड़ में फरीदाबाद तक वे उस विस्फोटक को लाए थे। यह आश्चर्य की बात है कि इतनी लंबी यात्रा के बाद भी कई राज्यों की सीमाएं पार करने के बाद भी जम्मू कश्मीर से फरीदाबाद तक बिना रोक-टोक के वह विस्फोटक ले आए। ना रास्ते में जांच हुई, ना कोई पकड़ा गया। मतलब साफ है कि भारत की पुलिस चाहे किसी राज्य की या धर्म की हो, भ्रष्टाचार के मामले में एक समान है। यह संभव नहीं है कि जम्मू कश्मीर की सीमा से लेकर फरीदाबाद तक की सारी पुलिस मुसलमान हो। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, बल्कि मुंबई के विस्फोट कांड में भी जो विस्फोटक लाया गया था उसे लाने और निकलवाने वाले सभी अधिकारी हिंदू थे।अच्छा होता कि सरकार जम्मू कश्मीर से फरीदाबाद तक सीमाओं के सुरक्षाकर्मियों और पुलिसकर्मियों के नाम प्रकाशित करती, ताकि हिंदू समाज भी जान सकता था कि हमारा राष्ट्रवाद कितना सस्ता है जो चंद रुपयों में बिक जाता है। जो लोग दिल्ली विस्फोट घटना के लिए जिम्मेदार थे या जो मरे या गिरफ्तार हुए वे नूह के चिकित्सा विद्यालय में पढ़े और चिकित्सक भी थे, शाहीन भी चिकित्सक थी। इसके पहले भी देश और दुनिया में जो लोग आतंकवाद की घटनाओं में शामिल या प्रायोजित रहे, वह सुशिक्षित वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ रहे हैं। अमेरिका में न्यूयॉर्क पर वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला करने वाले भी पढ़े-लिखे लोग थे। अतः एक प्रश्न यह भी आम चर्चा में है कि पढ़े-लिखे लोग आतंकवादी घटनाओं में क्यों शामिल होते हैं? क्या इसमें शिक्षा व्यवस्था का कोई दोष है या शिक्षा की कोई कमी है जो इंसान को तकनीक का ज्ञान तो देती है परंतु मानव नहीं बनाती? आतंकवाद के पढ़े-लिखे समर्थकों ने दिल्ली के विस्फोट की घटना की तुलना भगत सिंह से की, जिस पर से सिख समाज के लोगों ने आपत्ति की, यह आपत्ति सही है कि भगत सिंह ना आतंकवादी थे ना हिंसक थे। उन्होंने तो बम-जानबूझकर ऐसे स्थान पर फेंका था जहां सांसद लोग नहीं थे। उन्होंने कहा भी था कि मैं तो बहरों तक आवाज पहुंचाना चाहता हूं अगर उनका उद्देश्य हिंसा का होता तो वह बम वहां फेंकते जहां सांसद बैठे हुए थे। शहीद उधम सिंह ने भी जनरल डायर को गोलियां मारी थी किसी निर्दोष अंग्रेज की हत्या नहीं की थी, इसलिए ऐसी तुलना करना आतंकवाद की हिंसा का बचाव करने जैसा है।

कुछ लोग इन हिंसक आतंकवादी घटनाओं के लिए इस्लाम धर्म को ही दोषी मानते हैं और कुरान की कुछ पंक्तियों का उल्लेख भी करते हैं, कुछ लोग इसका संबंध जिहाद शब्द से जोड़ते हैं, हालांकि जिहाद का तात्पर्य उन लोगों के विरुद्ध था जो किसी पर जुल्म ढहाते हैं। जिहाद कोई व्यक्ति की प्रतिक्रिया नहीं है ना व्यक्ति समूह के हिंसा का दर्शन है, बल्कि वह तो किसी भी जुर्म करने वाले व्यक्ति या समूह के हमले के खिलाफ प्रति उत्तर का विचार है। निसंदेह वह अहिंसक नहीं है। वह तो उस समय के समाज और काल के जीवन में उस समय की मान्यताओं और परिस्थितियों के अनुसार बताया हुआ रास्ता है। अगर कोई व्यक्ति निजी तौर पर दंड देता है वह भी अपराधी होता है जिस प्रकार के व्यवस्थागत नियमों में परिवर्तन हिंदू मतावलंबियों में हुए हैं और लोकतंत्र तथा आधुनिक कानूनों को स्वीकार किया है। उसी प्रकार के परिवर्तन अन्य धर्मों में भी होना चाहिए। परंतु जो कई धार्मिक संप्रदाय हैं वे अपने धार्मिक परंपराओं में कोई बदलाव नहीं चाहते।यह समस्या इस्लाम के साथ भी है। इस पर विचार होना चाहिए कि धर्म के कौन से हिस्से आज प्रासंगिक है और कौन से हिस्से परिवर्तनीय है। आमतौर पर धर्म में कुछ जीवन मूल्य और दर्शन होता है, कुछ मानवता के सूत्र होते हैं, कुछ परंपराएं होती हैं और कुछ दंड विधान के नियम होते हैं जो शाश्वत, मानवीय मूल्य है वे तो स्थाई है, बकाया परिवर्तनशील है। मैं समझता हूं कि अगर सभी धर्म के धर्म गुरु इन चार खंडों में बँटकर धर्म को नए सिरे से परिभाषित करें तो निदान हो सकता है, यानी मानवता के जीवन दर्शन के जो सामाजिक मूल्य हैं और जो एक मानवीय दुनिया बनाने के लिए आवश्यक हैं उन्हें स्थाई रखा जाए परंतु परंपराओं और दंड विधान में समसामयिक और लोकतांत्रिक परिवर्तन किए जाएं। जब आजादी के पहले का भारत जिसमें पाकिस्तान, बंगलादेश और भारत शामिल था, अंग्रेजों के अधीन था तब हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी धर्म के लोगों ने एक दंड विधान स्वीकार किया और अपने-अपने धार्मिक नियम या विधान छोड़ दिए। एक आईपीसी और एक सीआरपीसी स्वीकार की। परंतु अब अनेक लोग ऐसे हैं जो 1500 साल पीछे जाना चाहते हैं और मजहबी व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं। देश दुनिया का एक बड़ा हिस्सा यह मानता है कि इस्लाम में हिंसा व प्रति हिंसा जैसे प्रावधान है जो कुरान में लिखे गए हैं। यानी इस्लाम जिन्हें अपरिवर्तनीय मानता है और अपने अनुयायियों में हिंसा का भाव पैदा करता है इसी आधार पर कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं कि इस्लामी देशों में और इस्लाम के विभिन्न पंथों में भी आपस में इतनी हिंसा और मार काट है कि वह एक-दूसरे के अनुयायियों को लाखों की संख्या में मार देती है। इस्लामी देशों में अमूमन पंथी गृह युद्ध है और जिन देशों में मुस्लिम और अन्य धर्मावलंबी लगभग बराबर हैं वहां भी धर्म के नाम की हिंसा और गृह युद्ध अमूमन है। सीरिया, लेबनान जैसे कितने ही देशों का उदाहरण देखा जा सकता है। इस गंभीर प्रश्न पर मुसलमान भाइयों और धर्म गुरुओं को भी विचार करना चाहिए।

मुझे छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के बरेलवी संप्रदाय के मुस्लिम भाइयों ने एक ज्ञापन दिया था जिसमें राज्यपाल से प्रार्थना की गई कि वहां के दूसरे पंथ के मुस्लिम भाई उन्हें कब्रिस्तान में मुर्दा नहीं गाड़ने देते। इसको लेकर कई बार आपस में काफी संघर्ष भी हो चुके हैं, आखिर यह विचारणीय तो है। मदरसों में भी जहां इस्लामी शिक्षा दी जाती है उस पर भी मुस्लिम भाइयों को विचार करना चाहिए। मैंने अनेक छोटे-छोटे बच्चों को देखा है जो इन मदरसों में पढ़ने को जाते हैं और लौटकर आने के बाद उनकी सामाजिक समरसता कम हो जाती है। मेरे पड़ोस में एक बच्चा रहता था जिसका नाम बिलाल है, वह यदा कदा हमारे पास आ जाता था, बैठता था, खुलकर बातचीत करता था। जब वह 7 वर्ष का हो गया तो उसके पिता ने उसे धार्मिक शिक्षा के लिए मदरसा ले गए। आरंभ में वह सुबह जाता था और शाम को लौटता था और धीरे-धीरे उसका वहां कुछ दिन रुकना हो गया, जो उनके यहां शिक्षण की प्रक्रिया होती है। कुछ दिनों बाद उसका मिलना-जुलना कम हो गया। ऐसा अनुभव मुझे कई बार आया है कि मदरसे की शिक्षा के बाद बच्चे कुछ सीमित दुनिया के हो गए, उनमें खुलेपन के स्थान पर कुछ बंद और छुपाव जैसा रहने लगा। यह उनकी धार्मिक शिक्षा व्यवस्था की कुछ कमी है, या क्या कारण है, इस पर भी विचार होना चाहिए। हिंदू विद्यालयों और संस्कृत विद्यालयों में भी जो बच्चे पढ़ने जाते हैं, वे अध्ययन के साथ-साथ बाह्य प्रतीकों के पर्याय बन जाते हैं। सभी धर्मों या धार्मिक संस्थाओं को यह देखना चाहिए कि धार्मिक शिक्षा व्यक्ति को अलग-अलग ना करें, बल्कि उन्हें व्यापक और समरस बनाएं।

कश्मीर के आतंकवाद की घटना और दिल्ली के विस्फोटक की घटनाओं में जो लोग पकड़े गए हैं या जिनके नाम आए हैं उनमें आमतौर पर कश्मीरी ही है, भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर उसे संपूर्ण विलय कहा है, परंतु ऐसा महसूस हो रहा है कि इतने दिनों के बाद भी अभी तक इस विलय को और उसकी उपयोगिता को कश्मीरी भाई समझ नहीं सके। 370 का कोई वैचारिक या तार्किक पक्ष पहले भी नहीं बचा था, यह केवल भावनात्मक जैसा था। परंतु दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत सरकार भी अभी तक कश्मीर के लोगों को तार्किक आधार पर यह महसूस नहीं करा सकी। मैं मानता हूँ कि कश्मीर की संकीर्ण और मजहबी राजनीति इसके पीछे है परंतु इन शक्तियों को उत्तर देना और समझाना यह तो अंततः भारत को ही करना होगा। विदेशी ताकतें जो भारत को मजबूत और स्थिर नहीं होने देना चाहती हैं उनसे कोई अपेक्षा करना व्यर्थ है, उनका उपयोग तर्क के रूप में भले ही करते रहें, परंतु उससे कोई हल नहीं निकलेगा। एक राज्य के तौर पर हमें विदेशी पूंजी और विदेशी ताकतों को खुद रोकना होगा। यह एक स्थाई तर्क या बहाना नहीं हो सकता, अगर हम कश्मीरी अवाम को समझाकर साथ नहीं ले सकेंगे तो बंदूक की ताकत से ना राज्य बनाए जा सकते हैं, ना चलाए जा सकते हैं। भारत के विपक्षी दलों को भी अपनी भूमिका पर राष्ट्रीय दृष्टिकोण से विचार करना चाहिए। दल और सत्ता बाद में है, पहले तो देश होता है। साथ ही पाक अधिकृत कश्मीर जो वैधानिक रूप से भारत का हिस्सा है इसे वापस मिलाना भी, अगर कश्मीरी अवाम दिल से सहमत नहीं होंगे तो कठिन होगा। पाक की जनता पाक सरकार से असंतुष्ट है और विद्रोह की कगार पर है, परंतु वह भारत के पक्ष में भी नहीं है। हमें एक ऐसा वतन बनाना होगा कि कश्मीर और पीओके की आवाम यह कहे कि हम भारतीय हैं और अपनी स्वेच्छा से भारत के साथ रहना कबूल करें। 370 के हटाये जाने के बाद एक अवसर आया था परंतु सरकार ने इसका बेहतर इस्तेमाल नहीं किया।

दिल्ली की आतंकवादी घटना में शामिल लोगों ने 2900 किलोग्राम विस्फोटक जमा किया था और उसके साथ इस्तेमाल किए गए 26 लाख रुपए की राशि इकठ्ठा कर 26 क्विंटल खाद भी खरीदी थी। एक प्रश्न यह है कि आखिर भारत सरकार के गोपनीय विभाग और अधिकारियों को इसकी जानकारी क्यों नहीं हो सकी, यह उनकी स्पष्ट असफलता है। चाणक्य ने कहा था कि राज्य की गोपनीय सूचना तंत्र को ऐसा होना चाहिए जो दुश्मन की हर खबर रख सके। भगवान राम ने भी भरत मिलाप में भरत से पूछा था कि अयोध्या के शत्रुओं की गुप्त सूचना होती हैं या नहीं।अब इसका उत्तर तो भारत सरकार को ही देना होगा कि भगवान राम से लेकर चाणक्य तक जो राष्ट्रीय सुरक्षा के सिद्धांत बताए गए थे उन पर सरकार ने अमल क्यों नहीं किया?

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।