होम आलेख कलम की घेराबंदी: लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी लड़ाई” –हबीब खान

कलम की घेराबंदी: लोकतंत्र में मीडिया की सबसे बड़ी लड़ाई” –हबीब खान

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       (विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर विशेष)

आज 03 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। यह दिन किसी औपचारिक शुभकामना के लिए नहीं, बल्कि एक कड़वी समीक्षा के लिए है। दुनिया भर में लोकतंत्र का ‘चौथा स्तंभ’ आज जिस तरह दबाव, धमकी, धन और दमन के चौतरफा घेरे में है, वह अभूतपूर्व है। एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में यह कहते हुए कोई गुरेज नहीं कि सत्ता और प्रेस के बीच का स्वाभाविक तनाव अब खुले युद्ध में बदल चुका है। और इस जंग में सबसे बड़ी चोट सत्य और नागरिक के सूचना अधिकार को पहुँच रही है।

   दुनिया के हर कोने में सत्ता ने ‘राष्ट्रवाद’ को ढाल की तरह फलक पर सजा लिया है, ताकि हर सवाल को आसानी से ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दिया जा सके। अमेरिका में पत्रकारों को ‘जनता का दुश्मन’ कहना हो, तुर्की और हंगरी में मीडिया संस्थानों का अधिग्रहण कर उन्हें प्रचार तंत्र में बदलना हो, या फिर अफ्रीकी व एशियाई देशों में सीधे शारीरिक हमले—हर जगह सूत्र एक ही है: प्रेस को आत्मसमर्पण के लिए विवश करो।

   भारत की स्थिति पर विचार करें तो मीडिया भीतर से ज़्यादा ख़तरनाक दमन का शिकार नज़र आएगा।भारत में तो दमन का चरित्र अधिक परिष्कृत है। यहाँ राष्ट्रवाद की लगातार उभारी जा रही लहर में गंभीर पत्रकारिता को पहले ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ और फिर ‘शहरी नक्सली’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है। राजद्रोह, गैर-कानूनी गतिविधि अधिनियम (UAPA) और सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धाराओं की लाठी लेकर सरकारी एजेंसियाँ पत्रकारों के दरवाज़े पर पहुँच जाती हैं। फर्जी एफआईआर, संपत्ति कुर्की और लगातार निगरानी ने समूचे मीडिया जगत को भय और स्व-सेंसरशिप के सागर में डुबो दिया है।

   पिछले कुछ वर्षों में अदालतों और सड़कों से जो तस्वीरें आई हैं, वे चिंताजनक हैं। पत्रकारों की हत्याओं के मामले में सज़ा की दर नगण्य है। पेगासस जैसे स्पाइवेयर के ज़रिए सरकार और उसके सहयोगी निजी बातचीत, स्रोतों और परिवार तक की टोह लेते रहे हैं। आर्थिक हथियार भी उतने ही पैने हैं—विज्ञापनों का केन्द्रीकृत बंटवारा, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर का चाबुक, और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सरकार के कहने पर कंटेंट हटाने का निर्देश देकर प्रताड़ित करना। इस पूरी संरचना ने स्वतंत्र प्रेस की साँसों पर शिकंजा कस दिया है।

     प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का गिरता ग्राफ केवल एक संख्या नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक दंभ का दर्पण है। कोरोना काल में हाशिए पर पड़े मजदूरों की सच्चाई को कवर करने वालों पर मुकदमे ठोक दिए गए, जबकि सरकारी एवं सरकार से उपकृत चैनल ‘राष्ट्रभक्ति’ का ढिंढोरा पीटते रहे। यह संकट केवल पत्रकारों का नहीं, जनता का भी है—क्योंकि बिना स्वतंत्र प्रेस के मतदाता कभी सत्ता का सही मूल्यांकन नहीं कर सकता।

    इसी दमन के बीच मीडिया का स्वरूप भी बदल रहा है। कॉर्पोरेट और राजनीतिक स्वामित्व वाले बड़े घरानों ने न्यूज़रूम को सौदेबाजी के बाज़ार में बदल दिया है। टीआरपी की होड़ ने एंकरों को चीखने वाले कार्यकर्ता बना दिया है। ऐसे में सोशल मीडिया एक संजीवनी बनकर उभरा था—आम नागरिक को अपना वीडियो पत्रकार, अपना स्टोरीटेलर बनने का अवसर मिला। नागरिक पत्रकारिता ने कई बार मुख्यधारा की चूक को उजागर किया, चाहे वे नागरिकता कानून पर हुए बवाल की ज़मीनी रिपोर्ट हों या किसान आंदोलन के वे पहलू जो प्राइम टाइम पर नहीं दिखाए गए।

    किंतु यहाँ भी खतरा साथ-साथ चल रहा है। सोशल साइट्स ने स्वर तो दिया, पर साथ ही पोलराइजेशन, फेक न्यूज़ और एल्गोरिद्म-पोषित घृणा का अंधड़ भी खड़ा कर दिया। दुखद यह है कि सत्ता ने इसी अफरा-तफरी को तर्क बनाकर सोशल मीडिया को काबू करने की मुहिम छेड़ दी है। आईटी नियम 2021 के तहत सरकार के लिए किसी भी कंटेंट को ‘सार्वजनिक हित में’ हटवाने की शक्ति ने मध्यस्थ प्लेटफॉर्मों को जकड़ लिया है। आज एक व्यंग्य, एक रिपोर्ताज या एक खोजी स्टोरी कब गायब हो जाए, कहना मुश्किल है। प्लेटफॉर्म भी प्रतिबंधों के डर से स्थानीय सरकार की इच्छा के आगे झुक रहे हैं। सत्य और अभिव्यक्ति का यह नया द्वंद्व हमें याद दिलाता है कि तकनीक तटस्थ नहीं रहती—वह सत्ता के हाथों का औज़ार बन जाती है।

निष्पक्ष आलोचना: ज़रूरी है आइना दिखाना

   निष्पक्ष आलोचना का अर्थ यह नहीं कि दोनों पक्षों में बराबर का दोष बाँट दिया जाए। सत्ता के पास अधिकार, धन और बल का त्रिशूल है; प्रेस के पास केवल शब्द। जब कथनी और करनी का अंतर मिट जाए, तो पत्रकार का धर्म है कि वह आँख में आँख डालकर सवाल पूछे। राष्ट्रवाद का उपयोग यदि असहमति को कुचलने के लिए हो, तो वह देशभक्ति नहीं, बल्कि सस्ता जुमला-शासन है। भारत का संविधान हमें वाणी की स्वतंत्रता देता है, महिमा-मंडन का ठेका नहीं।पत्रकारों को जेल में डालना, उन पर मुकदमे लादना, सरकारी विज्ञापन रोककर आर्थिक भूख हड़ताल करवाना,यह लोकतंत्र की शालीन परिभाषा नहीं हो सकती।

    विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर हमें प्रण लेना होगा कि डर को मात देंगे। आत्म-सेंसरशिप आसान रास्ता है, मगर इतिहास उन्हें याद रखता है जिन्होंने बेड़ियों में भी सच लिखा। सोशल मीडिया का इस्तेमाल सत्य को ऊर्जा देने के लिए हो, दुष्प्रचार के लिए नहीं। युवा पत्रकारों को संस्थागत संरक्षण की ज़रूरत है, पाठकों को सक्रिय विवेक की। और सत्ता को यह समझना होगा कि आवाज़ दबाने से विचार नहीं मरते; वे खामोश सुलगते हैं और इतिहास के किसी मोड़ पर चिनगारी बनकर पूरे तंत्र को प्रश्नांकित कर देते हैं।

    स्वतंत्र प्रेस केवल पत्रकार का नहीं, लोकतंत्र का अस्तित्व-रक्षक है। सांसों को सताने वाली हर सरकार अनिवार्यतः निरंकुशता की ओर बढ़ती है। आज, इस दिवस पर मैं साथी पत्रकारों से, पाठकों से और न्यायप्रिय नागरिकों से बस इतना कहूँगा—सत्य का सूरज चाहे बादलों से ढक जाए, मगर कभी बुझता नहीं। उसे पाने का संघर्ष ही पत्रकारिता का धर्म है।

सम्प्रति- लेखक श्री हबीब खान छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित वरिष्ठ पत्रकार है।श्री खान कई दशक तक एक दौर की प्रमुख संवाद समिति यूएनआई से जुड़े रहे है।