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लोकतंत्र में संवाद का संकट: जनसंपर्क की बदलती भूमिका- डा.राजाराम त्रिपाठी

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 कल ही देश ने बेशुमार राष्ट्रीय दिवसों की श्रृंखला में से एक और राष्ट्रीय-दिवस “राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस” धूमधाम से मनाया। इस बार भी शुभकामनाओं के संदेश थोक के भाव में आए, विभागों ने अपनी-अपनी उपलब्धियों के पुल बांधे, और अखबारों में एक बार फिर रंगीन विज्ञापनों की बहार छा गई।

    परंतु लाख टके का यह सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि जिस “जनसंपर्क” का जश्न मनाया गया, उसमें “जन” कितना है और “संपर्क” कितना?

भारत में जनसंपर्क की औपचारिक शुरुआत स्वतंत्रता के बाद 1940 और 1950 के दशक में हुई, जब केंद्र सरकार ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो (PIB) और डीएवीपी (अब ब्यूरो ऑफ आउटरीच एंड कम्युनिकेशन) जैसी संस्थाओं का गठन किया। इनका उद्देश्य स्पष्ट था: सरकार की नीतियों को जनता तक पहुंचाना और जनता की प्रतिक्रियाओं को शासन तक लाना। इन्होंने इस दौरान इस दिशा में कई उल्लेखनीय सकारात्मक कार्य भी किए। हमने बचपन में उपकार तथा शहीद जैसी सकारात्मक प्रभाव वाली फ़िल्में बस्तर के दूरस्थ गांव में इन्हीं विभागों की सौजन्य से देखी थी। इन बेहतरीन फीचर फिल्मों के साथ ही हमें राष्ट्रीय महत्व की सूचनाओं तथा उपलब्धियां से संबंधित डॉक्यूमेंट्री भी दिखाई जाती थी।

राज्यों में भी 1960 और 1970 के दशक में जनसंपर्क विभाग स्थापित हुए। उस समय उनका कार्य सीमित था। गांवों में जाकर योजनाओं की जानकारी देना, लोकनाट्य, पोस्टर, रेडियो के माध्यम से जागरूकता फैलाना और सबसे महत्वपूर्ण, जनता की समस्याओं को शासन तक पहुंचाना।  और धीरे-धीरे इस विभाग की हालत वही हो गई कि, निकले थे हरि भजन को ओटन लगे कपास।  पता ही नहीं चला जनसंपर्क की  प्राथमिकता सूची से ‘जन’ कब निकाल दिया गया।

खर्च का बढ़ता ग्राफ:-  यदि हम आंकड़ों पर नजर डालें तो 1980 के दशक में केंद्र सरकार का वार्षिक विज्ञापन और जनसंपर्क बजट लगभग 50 से 100 करोड़ रुपये के बीच था। राज्यों का बजट भी अपेक्षाकृत सीमित था, औसतन 5 से 20 करोड़ रुपये प्रति राज्य।

आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। केंद्र सरकार का जनसंपर्क और विज्ञापन बजट विभिन्न माध्यमों से मिलाकर सालाना 1200 से 1500 करोड़ रुपये से अधिक आंका जाता है। कुछ वर्षों में यह 2000 करोड़ रुपये के आसपास भी पहुंचा है। राज्यों में भी यह खर्च तेजी से बढ़ा है। बड़े राज्यों जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि में यह बजट 300 से 800 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच चुका है।

ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस खर्च में हम अलग-अलग मंत्रालयों द्वारा अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीटने के लिए मंत्रियों की फोटो के साथ जो विज्ञापन दिए जाते हैं, उस बड़े खर्च को शामिल नहीं कर रहे हैं। यानी 40-50 वर्षों में यह खर्च 20-30 गुना नहीं, बल्कि कई मामलों में 100 गुना तक बढ़ गया।

लेकिन इस 100 गुना खर्च का जनता को क्या और कितना फायदा मिला? क्या इस दिन-प्रतिदिन बढ़ते खर्च के अनुपात में जनता को सूचना, सुविधा और संवाद मिला?

हकीकत यह है कि जनसंपर्क विभाग अब केवल “वन वे ट्रैफिक” बनकर रह गया है। सरकार बोलती है, सरकार बहादुर बोलते हैं, जनता सुनती है। पर जनता बोलती है, तकलीफ से रोती-बिलखती है, चीखती-चिल्लाती है, तो कोई सुनने वाला नहीं।

आपने शायद ही कभी देखा होगा कि जनसंपर्क विभाग किसी गांव की पानी की समस्या, किसी बीमार बच्चे की असहायता, या किसी टूटी सड़क की रिपोर्ट शासन तक प्रमुखता से पहुंचाए। वह केवल “सफलता की कहानियां” दिखाता है। वह भी ऐसी, जिनमें आंकड़ों की आतिशबाजी ज्यादा होती है और जमीन की सच्चाई कम।

इसी विभाग की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का फर्क है।

कागजों में जनसंपर्क विभाग का उद्देश्य है:-

जनता और सरकार के बीच पुल बनना,जनहित में हर स्तर पर पारदर्शिता बढ़ाना,जनमत और जन आकांक्षाओं को समझना।

  परंतु व्यवहार में यह बन गया है:-

नेताओं की व्यक्तिगत छवि निर्माण का माध्यम,सत्ताधारी पार्टी का अघोषित भोंपू,विज्ञापन-मलाई वितरण का केंद्र, और सत्ता हित में मीडिया मैनेजमेंट का उपकरण।

इसलिए यहां एक बड़ा नैतिक प्रश्न उठता है कि क्या जनता के टैक्स का पैसा नेताओं की व्यक्तिगत छवि गढ़ने , चमकाने में खर्च किया जाना चाहिए?

सरकारी योजनाओं का प्रचार-प्रसार निश्चित रूप से आवश्यक है, इसमें कोई विवाद नहीं। परन्तु जब हर विज्ञापन में योजनाओं से ज्यादा नेताओं के चेहरे दिखें, तो यह “सूचना” कम और “प्रचार” ज्यादा हो जाता है।

एक और गंभीर समस्या है, बड़े मीडिया बनाम छोटे प्रकाशन के बीच हर स्तर पर भेदभाव। जनसंपर्क विभाग के विज्ञापन वितरण के नियम ऐसे हैं कि बड़े मीडिया घरानों को इसका सबसे बड़ा हिस्सा मिलता है।

लोकतंत्र में मीडिया को वह शक्तिशाली चौथा स्तंभ माना जाता है जो न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका तीनों पर जरूरी अंकुश लगाकर संतुलन कायम रखता है। परंतु देखने में यह आया है कि मीडिया भले ही अन्य सभी सरकारी विभागों की आलोचना करे, किंतु “जनसंपर्क विभाग” के खिलाफ लिखने से प्रायः परहेज करती है।

यह भी उल्लेखनीय है कि छोटे साप्ताहिक और क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाएं, सोशल मीडिया जो वास्तव में जमीनी मुद्दों को उठाते हैं, उन्हें विज्ञापन मिलना बहुत ही कठिन होता है। परिणामस्वरूप, अधिकांश छोटी पत्रिकाएं कुछ अंकों के बाद बंद हो जाती हैं। यह स्थिति वैसी ही है जैसे तालाब में बड़ी मछलियां तैरती रहें और छोटी मछलियां धीरे-धीरे पूरी तरह से समाप्त हो जाएं।

अब प्रश्न उठता है कि क्या अन्य देशों में भी ऐसे विभाग होते हैं? हाँ, विकसित देशों में भी सरकारी कम्युनिकेशन विभाग होते हैं।

उदाहरण के लिए: ब्रिटेन में गवर्नमेंट कम्युनिकेशन सर्विस (GCS) तथा सरकारी डिजिटल सेवा (GDS), और अमेरिका में व्हाइट हाउस कम्युनिकेशन ऑफिस (WHCO) लोक संपर्क कार्यालय (OPA) और सरकारी सूचना पोर्टल ( USA.gov) जैसे तंत्र नीतियों की जानकारी देना, नियमित प्रेस संवाद करना, जन-प्रश्नों के उत्तर देना, गलत सूचनाओं का खंडन करना तथा सरकारी सेवाओं को सरल और सुलभ बनाना सुनिश्चित करते हैं। इन व्यवस्थाओं की विशेषता यह है कि यहां संचार का केंद्र व्यक्ति नहीं बल्कि नीति और तथ्य होते हैं, और सबसे महत्वपूर्ण, यह तंत्र एकतरफा प्रचार नहीं बल्कि दो-तरफा संवाद स्थापित कर जनता की प्रतिक्रिया को शासन तक प्रभावी रूप से पहुंचाता है।

पर वहां और हमारे यहां में एक महत्वपूर्ण अंतर है। वहां सरकार का प्रचार “सूचना आधारित” होता है, “व्यक्तिगत महिमामंडन” नहीं। विज्ञापनों में नेताओं के चेहरे कम और जानकारी ज्यादा होती है। और सबसे महत्वपूर्ण, वहां “फीडबैक सिस्टम” मजबूत होता है।

भारत जैसे विकासशील देश में, जहां संसाधन सीमित हैं और गरीबी अब भी एक बड़ी चुनौती है, वहां जनसंपर्क पर इतना बड़ा निरर्थक खर्च एक गंभीर बहस का विषय है।

क्या गरीब देश के गरीब नागरिकों के खून पसीने की कमाई से निचोड़कर लिए गए  “टैक्स” का यह पैसा बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और ग्रामीण विकास में नहीं लगाया जा सकता? या फिर, क्या इस खर्च को इस तरह पुनर्गठित किया जा सकता है कि यह वास्तव में “जनसंपर्क” बन सके, न कि मात्र “शासकीय प्रचार तंत्र”?

खैर हमने सवाल तो बहुत सारे उठा लिए, अब वक्त है इनके जवाब ढूंढने का।

हमारा मानना है कि जनसंपर्क विभाग को चाहिए कि वह प्राथमिकता के आधार पर दो-तरफा स्वस्थ संवाद की परंपरा स्थापित करे। घर-घर, गांव-गांव से हर वर्ग की समस्याओं, पीड़ाओं और जन आकांक्षाओं को एकत्र कर शासन तक पहुंचाए।

योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन और उनके परिणामों की सच्ची, निष्पक्ष स्थिति का फीडबैक अपेक्षित तेजी से देवें। छोटे और स्वतंत्र मीडिया को भी समान अवसर दें और जहां आवश्यक हो, उन्हें संरक्षण भी प्रदान करे।

प्रचार के साथ ही सूचना और समस्या समाधान पर भी ध्यान केंद्रित करे।

“राष्ट्रीय जनसंपर्क दिवस”  के विशिष्ट अवसर पर यह आत्ममंथन जरूरी है कि यह विभाग अपने मूल उद्देश्य से कितना भटक गया है। आज यह केवल “सरकार की आवाज़” बनकर रह गया है, जबकि लोकतंत्र के मापदंडों के अनुसार इसे “ जन‌ यानी जनता की ईमानदार आवाज़” बनना चाहिए था।

जब तक यह संतुलन नहीं बनेगा, तब तक जनसंपर्क केवल एक महंगा प्रचार तंत्र बना रहेगा, जिसका खर्च जनता उठाएगी और लाभ सीमित वर्ग को मिलेगा।

लोकतंत्र में स्वस्थ संवाद जरूरी है, और यह संवाद तभी संभव है जब दोनों पक्ष बोलें भी और सुनें भी। अभी स्थिति यह है कि “माइक सरकार के हाथ में है, और जनता सिर्फ श्रोता बनी हुई है।”

और यदि लोकतंत्र के नाम पर यही स्थिति बनी रही,ये कारवां यूं ही इसी दिशा में आगे बढ़ता रहा तो…  “वन वे ट्रैफिक” के नियंत्रण के नाम पर यदि कभी जनता के मुंह पर भी सरकारी टेप चिपका दिया जाए, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

सम्प्रति- लेखक डा.राजाराम त्रिपाठी सामाजिक चिंतक तथा “अखिल भारतीय किसान महासंघ” (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक हैं।