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महंत की वन अधिकार अधिनियम लागू कराने राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग

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रायपुर, 30 मई। छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राज्य में अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी परिवारों के अधिकारों के संरक्षण को लेकर राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र भेजकर वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू कराने का अनुरोध किया है।

      राष्ट्रपति को भेजे गए पत्र में डॉ. महंत ने कहा है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 दिसंबर 2007 से पूरे देश में लागू है। अधिनियम की धारा 3(1)(घ) के तहत वन भूमि पर स्थित जलाशयों में मछली पालन तथा अन्य जलीय संसाधनों के उपयोग का सामुदायिक अधिकार पात्र व्यक्तियों और समुदायों को प्रदान किए जाने का प्रावधान है। उन्होंने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ में अधिनियम लागू होने के लगभग 18 वर्ष बाद भी इस प्रावधान का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो सका है।

      डॉ. महंत के अनुसार, राज्य की वन भूमि में लगभग 1.58 लाख हेक्टेयर जलक्षेत्र मौजूद है, जहां मछली पालन और मत्स्याखेट के माध्यम से 50 हजार से अधिक अनुसूचित जनजाति एवं अन्य वन निवासी परिवार अपनी आजीविका चलाते हैं। उनका कहना है कि वर्तमान मत्स्य नीति वन अधिकार अधिनियम की भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।

      उन्होंने आरोप लगाया कि वन क्षेत्रों के जलाशयों को पट्टे पर दिया जा रहा है तथा 1000 हेक्टेयर से बड़े जलाशयों के लिए निविदाएं जारी कर उन्हें ठेकेदारों के हवाले किया जा रहा है। इससे स्थानीय आदिवासी और वन निवासी, जिनका इन संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार होना चाहिए, वे अपने ही क्षेत्रों में ठेकेदारों के अधीन मजदूर के रूप में काम करने को विवश हैं।

      नेता प्रतिपक्ष ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों के आर्थिक एवं कानूनी हितों की रक्षा के लिए वन अधिकार अधिनियम की धारा 3(1)(घ) को तत्काल प्रभाव से लागू कराने हेतु आवश्यक कदम उठाए जाएं। उन्होंने राष्ट्रपति से राज्यपाल और मुख्यमंत्री को इस संबंध में आवश्यक निर्देश जारी करने का भी अनुरोध किया है।

     डॉ. महंत ने उम्मीद जताई कि राष्ट्रपति स्तर पर हस्तक्षेप होने से राज्य सरकार और प्रशासन इस विषय की गंभीरता को समझेंगे तथा प्रभावित परिवारों को उनके अधिकार दिलाने की दिशा में ठोस कार्रवाई करेंगे। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा हजारों वनवासी परिवारों की आजीविका और अधिकारों से जुड़ा हुआ है, जिस पर शीघ्र निर्णय लिया जाना आवश्यक है।