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श्रावण सोमवार पर बाबा महाकाल भी रखते हैं उपवास, कब लगता है भोग? 

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श्रावण माह की शुरुआत होते ही विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में लाखों श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है। मान्यता है कि जो भक्त श्रावण सोमवार का व्रत रखकर बाबा महाकाल के दर्शन-पूजन करते हैं, उनके जन्म-जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

वैसे तो पूरे श्रावण माह में बाबा महाकाल के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है, लेकिन श्रावण सोमवार को इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। देशभर से करोड़ों श्रद्धालु इस दिन व्रत रखकर भगवान शिव की आराधना करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रावण माह के प्रत्येक सोमवार को स्वयं बाबा महाकाल भी उपवास रखते हैं। इसी दिन भगवान प्रजा का हाल जानने के लिए नगर भ्रमण पर निकलते हैं। नगर भ्रमण से लौटने के बाद ही उन्हें भोग अर्पित किया जाता है।

जानिए बाबा महाकाल की पांच आरतियां और भोग की परंपरा
प्रतिदिन सुबह सबसे पहले बाबा महाकाल की भस्म आरती वंश परंपरा से जुड़े पुजारी संपन्न कराते हैं। इसके बाद सुबह 7 बजे आरती होती है, जिसमें चावल, दही और शक्कर का भोग लगाया जाता है। सामान्य दिनों में पूजा और श्रृंगार के बाद नियमित भोग अर्पित किया जाता है, लेकिन श्रावण सोमवार को भगवान को केवल फलाहार का भोग लगाया जाता है।सुबह 10 बजे पंचामृत पूजन होता है, जिसके बाद दाल, चावल, रोटी, सब्जी, भजिए और लड्डू का भोग अर्पित किया जाता है। इसे भोग आरती कहा जाता है।

शाम 5 बजे भगवान का स्नान होने के बाद जलाभिषेक बंद कर दिया जाता है। इसके बाद विशेष श्रृंगार कर बाबा महाकाल राजा स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। शाम 7 बजे संध्या आरती होती है, जिसमें दूध का भोग लगाया जाता है। रात 10:20 बजे शयन आरती के दौरान मेवे का प्रसाद अर्पित किया जाता है। इसके बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।

महाकाल के दर्शन से होता है पापों का नाश
मंदिर के पुजारी पंडित महेश शर्मा के अनुसार, श्रावण माह में भगवान शिव के दर्शन और पूजा-अर्चना से सभी पापों का नाश होता है। इस माह में जो भक्त भगवान शिव को जल, दुग्ध और बेलपत्र अर्पित करते हैं, उनके तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उन्हें अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

उन्होंने बताया कि एक से लेकर एक लाख तक बिल्व पत्र अर्पित करने का विशेष धार्मिक महत्व माना गया है और इससे अनेक यज्ञों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। उनके अनुसार, श्रावण माह में किए जाने वाले अधिकांश व्रत माता सती और माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने तथा उन्हें पति रूप में प्राप्त करने के लिए किए थे।