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जीडीपी के नए आंकड़ों पर जयराम रमेश ने उठाए सवाल, बोले- पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक करे मोदी सरकार

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नई दिल्ली, 03 सितंबर। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने अप्रैल-जून 2026 तिमाही के लिए जारी 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार से नई राष्ट्रीय आय गणना पद्धति और इसके तहत किए गए बदलावों का पूरा विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि जीडीपी आकलन की नई पद्धति तैयार करने में किन विशेषज्ञों और संस्थाओं से सलाह ली गई तथा अलग-अलग आर्थिक घटकों को शामिल करने का आधार क्या रहा।

      श्री रमेश ने गुरुवार को जारी एक बयान में कहा कि अप्रैल-जून तिमाही के लिए जारी 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि के आंकड़े कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं। उन्होंने दावा किया कि इस वृद्धि दर की गणना में इस्तेमाल किए गए पिछले आधार वर्ष, अप्रैल-जून 2025, के जीडीपी आंकड़े में कई बार संशोधन किया गया है।

       कांग्रेस नेता के मुताबिक, अप्रैल-जून 2025 का जीडीपी आंकड़ा पहले करीब 86 लाख करोड़ रुपये था, लेकिन बाद के संशोधनों के बाद यह लगभग 80 लाख करोड़ रुपये रह गया। उन्होंने कहा कि आधार वर्ष के आंकड़े में इतनी बड़ी कमी का असर स्वाभाविक रूप से मौजूदा तिमाही की वृद्धि दर की गणना पर पड़ता है।

        रमेश ने पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के आकलन का हवाला देते हुए कहा कि यदि पुराने आधार आंकड़े को बरकरार रखा जाता तो नाममात्र की जीडीपी वृद्धि करीब 2.6 प्रतिशत होती, जबकि सरकार द्वारा 10.3 प्रतिशत की वृद्धि बताई गई है। उन्होंने सरकार से इस अंतर के पीछे की गणना और पद्धति को स्पष्ट करने की मांग की।

चार वर्षों के आंकड़ों में संशोधन पर भी सवाल

        जयराम रमेश ने पिछले चार वर्षों के जीडीपी आंकड़ों में किए गए व्यापक संशोधनों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने दावा किया कि वित्त वर्ष 2022-23 से लेकर पिछले चार वर्षों के आंकड़ों में नई श्रृंखला के तहत नाममात्र जीडीपी के अनुमान में हर वर्ष और लगभग हर तिमाही में कमी आई है।

       उनके अनुसार, चार वर्षों के दौरान कुल मिलाकर करीब 43 लाख करोड़ रुपये की कमी की गई है। रमेश ने सवाल किया कि नई पद्धति में ऐसा क्या बदलाव किया गया, जिसके कारण अर्थव्यवस्था के अनुमानित आकार में इतनी बड़ी गिरावट दिखाई दे रही है।

       उन्होंने कहा कि सरकार को यह बताना चाहिए कि नई जीडीपी पद्धति तैयार करते समय किन विशेषज्ञों, अर्थशास्त्रियों और संस्थाओं से परामर्श लिया गया था। साथ ही, पद्धति में किए गए बदलावों और उनके प्रभाव का विस्तृत विवरण भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

जीडीपी डिफ्लेटर पर भी उठाया सवाल

        कांग्रेस महासचिव ने जीडीपी डिफ्लेटर को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी डिफ्लेटर करीब 2.5 प्रतिशत रहा, जबकि इसी अवधि में खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़ों में काफी अंतर दिखाई देता है।

        रमेश के मुताबिक, इससे वास्तविक जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों और आम लोगों द्वारा महसूस की जा रही कीमतों में बढ़ोतरी के बीच अंतर को लेकर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने डिफ्लेटर की गणना के आधार और उसमें इस्तेमाल किए गए विभिन्न घटकों को सार्वजनिक करने की मांग की।

       जीडीपी डिफ्लेटर अर्थव्यवस्था में उत्पादित घरेलू वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में होने वाले बदलाव को मापने का व्यापक पैमाना है। इसके जरिए नाममात्र जीडीपी को कीमतों में बदलाव के प्रभाव से समायोजित कर वास्तविक आर्थिक वृद्धि का आकलन किया जाता है।

विनिर्माण और निजी खपत के आंकड़ों पर भी चिंता

        जयराम रमेश ने विनिर्माण और निजी खपत से जुड़े आंकड़ों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि सुभाष चंद्र गर्ग की गणना के अनुसार विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धन (GVA) में 5.2 प्रतिशत और निजी खपत में 5.4 प्रतिशत की गिरावट आई है।

         उन्होंने कहा कि एक ओर सरकार मजबूत आर्थिक वृद्धि के आंकड़े पेश कर रही है, वहीं दूसरी ओर अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्सों से जुड़े आंकड़ों को लेकर अलग तस्वीर सामने आती है। ऐसे में जीडीपी गणना की पद्धति और आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार को जवाब देना चाहिए।

          रमेश ने कहा कि जीडीपी के आंकड़ों की विश्वसनीयता को लेकर पहले भी अर्थशास्त्रियों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की ओर से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे माहौल में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह राष्ट्रीय आय के नए आकलन की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बरते।

        उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि नई राष्ट्रीय आय पद्धति तैयार करने की प्रक्रिया, विशेषज्ञों से किए गए परामर्श, आंकड़ों में किए गए बड़े संशोधनों और विभिन्न आर्थिक घटकों के मूल्यांकन के आधार का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक किया जाए।

        कांग्रेस नेता ने विशेष रूप से सवाल उठाया कि पिछले चार वर्षों के जीडीपी आंकड़ों में इतनी बड़ी कटौती क्यों की गई और नई पद्धति के किन घटकों के कारण अर्थव्यवस्था के अनुमानित आकार में यह बदलाव आया। उन्होंने यह भी पूछा कि ऐसी डिफ्लेशन पद्धति अपनाने का आधार क्या है, जो उनके आरोप के मुताबिक वास्तविक जीडीपी वृद्धि की गणना में महंगाई के प्रभाव को कम करती दिखाई देती है।

        रमेश ने कहा कि जीडीपी जैसे महत्वपूर्ण आर्थिक आंकड़े केवल सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं, निवेशकों, उद्योग जगत और आम नागरिकों के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इनके आकलन की पद्धति और उसमें होने वाले बड़े बदलावों को लेकर पारदर्शिता जरूरी है।