जगदलपुर/गढ़चिरौली, 03 सितम्बर। कभी जंगलों में हथियारों के साथ संगठन के लिए संघर्ष करने वाले पूर्व माओवादियों की जिंदगी अब नई दिशा में आगे बढ़ रही है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली स्थित पुनर्वास केंद्र में रह रहे 50 पूर्व माओवादियों को गुरुवार को उनके गृहक्षेत्र बस्तर के अलग-अलग जिलों और गांवों के लिए रवाना किया गया। घर वापसी के इस मौके पर पुनर्वास केंद्र में भावुक माहौल देखने को मिला।
रवानगी से पहले पूर्व माओवादी एक-दूसरे से गले मिले। लंबे समय तक जंगलों में साथ रहने वाले पुराने साथियों से विदाई के दौरान कई लोगों की आंखें नम हो गईं। कभी संघर्ष और हथियारों से जुड़ी रही जिंदगी से निकलकर अब ये लोग सामान्य सामाजिक जीवन की ओर लौट रहे हैं।
दरअसल, पिछले वर्ष महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में पूर्व माओवादी नेता वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति के नेतृत्व में बड़ी संख्या में माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया था। आत्मसमर्पण के बाद सुरक्षा कारणों से उन्हें पुलिस के पुनर्वास केंद्र में रखा गया। यहां उन्हें मुख्यधारा में लौटने और आत्मनिर्भर जीवन शुरू करने के लिए विभिन्न प्रकार का प्रशिक्षण दिया गया।
पुनर्वास अवधि के दौरान कई पूर्व माओवादियों को रोजगार और स्वरोजगार से जुड़ी स्किल ट्रेनिंग दी गई। वहीं, कुछ लोगों के रिवर्स नसबंदी ऑपरेशन भी कराए गए। पुनर्वास केंद्र में रहते हुए कुछ पूर्व माओवादी जोड़ों ने विवाह कर अपने जीवन की नई शुरुआत भी की।
अब पुनर्वास प्रक्रिया के अगले चरण के तहत आत्मसमर्पण कर चुके लोगों को धीरे-धीरे उनके गृह जिलों और गांवों में वापस भेजा जा रहा है। इसी क्रम में पहले चरण में 50 पूर्व माओवादियों को गढ़चिरौली से बस्तर के विभिन्न इलाकों में उनके गृहग्राम के लिए रवाना किया गया।
इनकी घर वापसी को आत्मसमर्पण के बाद सामान्य सामाजिक जीवन में पुनर्स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि, पूर्व माओवादी नेता जिनुगु नरसिम्हा रेड्डी उर्फ जम्पन्ना ने पुनर्वास प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। उन्होंने एक प्रेस नोट जारी कर कहा कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को लंबे समय तक पुलिस निगरानी वाले पुनर्वास केंद्रों में रखने के बजाय जल्द से जल्द उनके परिवार और गांव तक पहुंचाया जाना चाहिए।
जम्पन्ना का कहना है कि आत्मसमर्पण के बाद लोगों को सामान्य जीवन में लौटने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए और उन्हें अपने परिवार तथा समाज के बीच जल्द से जल्द बसने दिया जाना चाहिए।
गढ़चिरौली से बस्तर लौटे इन 50 पूर्व माओवादियों की कहानी केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने की नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी भी है, जिसमें हथियारों और जंगल के जीवन से निकलकर ये लोग परिवार, गांव और समाज के बीच सामान्य जिंदगी शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। आत्मसमर्पण के बाद इनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती हथियार नहीं, बल्कि बदली हुई परिस्थितियों में खुद को समाज की मुख्यधारा में फिर से स्थापित करना है।




