(हिन्दी दिवस 14 सितम्बर पर विशेष)
महाराष्ट्र सरकार के परिवहन विभाग ने आदेश जारी किया है कि महाराष्ट्र में जितने भी गैर मराठी ऑटो चालक, ड्राइवर, टैक्सी चालक हैं उन्हें मराठी जानने का प्रमाण पत्र बताना होगा, अन्यथा उनके ऊपर भारी जुर्माना किया जायेगा। उन्हें अपमानित भी किया जा रहा है। यहां तक कि कई स्थानों पर उनके साथ पुलिस के द्वारा या अन्य लोगों के द्वारा मारपीट और दुर्व्यवहार के समाचार भी सामने आये हैं। ये चालक लोग कई दशकों से बम्बई महाराष्ट्र में रह रहे हैं और जितनी काम चलाऊ मराठी जो यात्रियों को समझने के लिये जरूरी है, वे बोल भी लेते हैं और समझ भी लेते हैं, परंतु उनके पास औपचारिक मराठी शिक्षा के ज्ञान का प्रमाण पत्र नहीं है। अकेले बम्बई में ही चालकों की संख्या लगभग तीन लाख और समूचे महाराष्ट्र में इनकी संख्या लगभग छह लाख के आसपास है।
यह घटना तीसरी है। इसके पहले भी गैर मराठी भाषियों और हिंदी भाषियों के साथ मारपीट की घटनायें घट चुकी हैं। पिछले कुछ वर्षों से महाराष्ट्र में यह अभियान चलाया जा रहा है विशेषतः हिन्दी भाषियों को अपमानित किया जा रहा है। उनके साथ मारपीट की जा रही है। वर्ष 2025 में कई ऐसी घटनायें हुई थी जहां हिंदी बोलने वालों को सार्वजनिक रूप से मारा पीटा गया, यहां तक कि एक मराठी भाषी नौजवान अर्णव खैरे ने सरकारी बस में एक सह यात्री से हिंदी बोली तो इस गुनाह में उसे मारा पीटा गया और इस घटना से वह इतना क्षुब्ध हुआ कि उसने अपने घर जाकर आत्महत्या कर ली।
महाराष्ट्र में हिंदी बोलना अपराध होगा यह कल्पना भी कठिन है भारत के हिंदी भाषी क्षेत्रों में सदैव महाराष्ट्र की विभूतियों का सम्मान दिया गया और उन्हें स्वीकार किया है। 19वीं सदी के आरंभ में देश में लाल, बाल पाल नाम अति सम्मान से लिये जाते थे। लाल याने लाजपतराय, याने बालगंगाधर तिलक जिन्हें बाद में लोकमान्य तिलक कहा गया और विपिन चन्द्र पाल ये तीनों भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नाम थे। किसी हिंदी भाषी या गैर मराठी भाषी ने कभी इन लोगों को भाषायी आधार पर नहीं देखा। आचार्य बिनोवा भावे, ज्योतिबा फुले, बाबा साहब अम्बेडकर, संत तुकाराम, संत गाडगे, साबित्री बाई फुले, दादा धर्माधिकारी, मधु लिमये, एसएम जोशी, मधु दंडवते आदि ऐसे कितने महापुरुषों के नाम हैं जो मराठी भाषी थे परंतु जिन्हें समूचे देश ने और हिंदी भाषीयों ने सदा सम्मान दिया। मधु लिमये हिंदी भाषी क्षेत्र बाँका व मुंगेर से चुनाव लड़े और जार्ज फर्नांडीज बिहार के मुज्जफरपुर से चुनाव लड़े और जीते। हिन्दी भाषियों ने उन्हें सदैव सम्मान दिया। परंतु अब महाराष्ट्र में महाराष्ट्र सरकार जो कदम उठा रही है और जिस प्रकार गैर मराठी भाषियों को अपमानित कर रही है, वह चिंता का विषय है। समुचे महाराष्ट्र में 60-70 लाख लोग हिन्दी भाषी हैं, लगभग 90 लाख लोग गैर मराठी भाषी हैं, जिनमें गुजराती, तेलगु, तमिल, कन्नड़, पंजाबी आदि शामिल हैं। बम्बई और महाराष्ट्र के महानगरों को बनाने में गैर मराठी भाषियों का कम योगदान नहीं है? पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र सरकार के द्वारा उठाये जा रहे कदम और उन पर संघ के पदाधिकारियों की चुप्पी चिंताजनक है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में जिसे भारत सरकार ने ही पारित किया है और जिसकी काफी चर्चा भी की है।त्रिभाषा फार्मूला स्वीकृत किया गया था और भारत सरकार ने जिसे लागू करने की घोषणा की है। इस फार्मूले में सरकार ने एक राष्ट्र भाषा दूसरी कोई एक भारतीय भाषा और तीसरी कोई एक विदेशी भाषा एच्छिक रूप से स्वीकार कर लागू करने की नीति बनाई थी। महाराष्ट्र सरकार ने भी इस फार्मूला को महाराष्ट्र मे लागू किया तथा महाराष्ट्र के स्कूलों में भारतीय भाषा के रूप में हिंदी को पढ़ाने का प्रावधान किया था। परंतु कुछ दिनों बाद श्री उद्धव ठाकरे एवं श्री राज ठाकरे ने मुम्बई में हिंदी की पढ़ाई के विरोध में रैली निकालने का ऐलान किया और इस रैली के नाम पर रैली के पूर्व ही राज्य की भाजपा सरकार ने हिंदी को स्कूली पाठयक्रम से हटा दिया। इह रैली की घोषणा और पाठयक्रम से हिन्दी को हटाना एक सुनियोजित कदम जैसा था।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो हिंदी-हिंन्दु-हिन्दुस्तान का नारा लगाता रहा है और इस नारे से गुमराह करके हिंदी भाषियों का समर्थन प्राप्त किया, उसने भी इस मुद्दे पर संस्थागत रूप से मौन धारण कर लिया। संघ के एक पदाधिकारी ने अवश्य मुंबई के किसी कार्यक्रम में भाषण देते हुए हिंदी का समर्थन किया था परंतु उसके बाद उन्होंने भी चुप्पी साध ली। संघ के संगठनात्मक अनुशासन को जानने वालों का मत है कि इस चुप्पी के पीछे संघ का संस्थागत आदेश है। वरना एक केन्द्रीय पदाधिकारी और राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकारें अचानक मौन धारण नहीं करती।
स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे जो स्वतः मूलतः बिहार के मिथिला के रहने वाले थे ने पहले यह विरोध अपनी मराठा राजनीति के लिए किया था। जिस पर उनके पुत्र चल रहे है।पर अब बाकायदा भारतीय जनता पार्टी सरकार ने ही इसे अपना एजेंडा बना लिया है।
जिस प्रकार सत्ता प्राप्ति के लिए बाल ठाकरे ने अपनी मूलभूमि को भुला दिया उसी प्रकार अब संघ के वर्तमान बड़े पदाधिकारी जो देशस्थ ब्राह्मण है अपने मूल को भूल रहे हैं। इनके पुरखे भी कभी उत्तर भारत के हिंदी भाषी थे। जो वहां से चलकर महाराष्ट्र में पहुंचे थे। प्रधानमंत्री स्वतः गुजराती है।
केंद्र सरकार की नीतियां दो मुखी हैं उसने तमिलनाडु की पिछली स्टालिन सरकार द्वारा नई शिक्षा नीति नहीं लागू करने व हिंदी विरोध के कारण तमिलनाडु का केंद्रीय अनुदान रोक दिया था,पर महाराष्ट्र में यहां उनकी अपनी सरकार है वहां का अनुदान यथावत जारी है। डॉ राम मनोहर लोहिया कहते थे सभी भारतीय भाषाएं बहनें हैं। वे अंग्रेजी के साम्राज्यवाद के खिलाफ थे।क्या हम लोग भी इसी भाषा नीति को मानते हैं। अंग्रेजी के ज्ञान से हमारा विरोध नहीं है परंतु एक राष्ट्र भाषा के तौर पर हिंदी को मानना उचित होगा। महात्मा गांधी, रविंद्र नाथ ठाकुर, लोकमान्य तिलक आदि की भी अपनी राय यही थी।
यह दुखद है कि हिंदी भाषी क्षेत्र के नेतागण अपनी सत्ता की भूख में अपनी मातृभाषा व राष्ट्र भाषा का स्वाभिमान खो चुके हैं। यहां तक की हिंदी में जीविका व नाम कमाने वाले बुद्धिजीवी साहित्यकार भी इस हिंसक व असंवैधानिक हिंदी विरोध पर चुप हैं। क्या संघ यह नहीं समझ रहा है कि अगर मराठी साम्राज्यवाद चलाया जाएगा, हिंदी की उपेक्षा या हिन्दी को अपमानित किया जाएगा तो अंततः यह राष्ट्रीय एकता पर असर डालेगा। तमिलनाडु की डीएमके व देश की भारतीय जनता पार्टी में क्या फर्क रहेगा? बल्कि तमिलनाडु के भाषाई सोच को और बल मिलेगा। कल कर्नाटक आदि अहिंदी व गैर मराठी भाषी राज्यों में भी ऐसे विचार पनप सकते हैं,और देश एक भाषाई गृह युद्ध में फंसकर कमजोर होगा।
मैने प्रधानमंत्री जी और देश के सभी राजनीतिक दलों के अध्यक्षों को पत्र लिखकर उनसे हस्तक्षेप की अपील की है। देखें राजनीति और हिंदी वासी क्षेत्र का नेतृत्व क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।देश के हिन्दी जगत, के प्रबुद्ध जन, साहित्यकार कब तक मूक बने रहेंगे, यह चिंता का विषय है।
सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।



