रायपुर, 15 सितम्बर। प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर छत्तीसगढ़ में लंबे समय से चल रही सियासी खींचतान मंगलवार को रायपुर प्रेस क्लब में आमने-सामने की बहस में बदल गई। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री एवं पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री विजय शर्मा के बीच करीब 80 मिनट तक चली इस सीधी बहस में पीएम आवास के आंकड़ों, स्वीकृति, राशि जारी होने, निर्माण और केंद्र के पोर्टल के संचालन को लेकर तीखी नोकझोंक हुई। दोनों नेताओं ने अपने-अपने दस्तावेज और आंकड़े सामने रखे और एक-दूसरे के दावों को चुनौती दी।
बहस का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षण तब आया, जब भूपेश बघेल ने कहा कि उनके कार्यकाल में जिन लोगों को आवास नहीं मिल पाए, जनता ने उसका फैसला चुनाव में कर दिया। उन्होंने कहा कि यदि उनकी सरकार से आवास निर्माण में कमी रह गई तो जनता ने उन्हें उसकी सजा दे दी। दूसरी ओर विजय शर्मा लगातार इस बात पर जोर देते रहे कि आंकड़ों को अलग-अलग श्रेणियों में देखा जाना चाहिए और स्वीकृति, हितग्राही की स्वीकार्यता, राशि जारी होने तथा मकान पूर्ण होने को एक ही आंकड़ा मानकर पेश नहीं किया जा सकता।
18 लाख आवास से शुरू हुई आंकड़ों की जंग
विजय शर्मा ने बहस में दावा किया कि भाजपा सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में 18 लाख प्रधानमंत्री आवास स्वीकृत किए गए थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी 25 सितंबर 2023 को करीब सात लाख आवासों की स्वीकृति का दावा किया गया था, लेकिन इनमें से लगभग 84 हजार हितग्राहियों तक ही राशि पहुंच पाई। विजय शर्मा ने कहा कि वर्तमान सरकार के कार्यकाल में 11.75 लाख से अधिक पीएम आवास पूरे किए जा चुके हैं और वित्तीय वर्ष 2025-26 में छत्तीसगढ़ देश में सबसे अधिक पीएम आवास बनाने वाला राज्य रहा।
श्री शर्मा ने कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि पांच साल के कार्यकाल में करीब तीन लाख पीएम आवास ही बन पाए। उन्होंने आरोप लगाया कि गरीबों के आवास के मामले में तत्कालीन सरकार की गंभीर लापरवाही रही। उन्होंने यह भी कहा कि पीएम आवास को लेकर भाजपा की ओर से चलाया गया ‘मोर आवास, मोर अधिकार’ आंदोलन इसी समस्या को लेकर था।
पोर्टल बंद होने के मुद्दे पर सबसे ज्यादा तकरार
बहस में सबसे ज्यादा गर्मी प्रधानमंत्री आवास योजना के पोर्टल को लेकर दिखाई दी। भूपेश बघेल ने दावा किया कि उनके कार्यकाल के दौरान केंद्र सरकार ने पीएम आवास का पोर्टल बंद कर दिया था। उनके अनुसार कोरोना काल में आर्थिक संकट के बीच राज्यों की वित्तीय स्थिति भी प्रभावित हुई थी और केंद्र से राशि नहीं मिलने तथा पोर्टल बंद होने के कारण आवास निर्माण की प्रक्रिया प्रभावित हुई।
श्री बघेल ने कहा कि उनकी सरकार ने केंद्र से अपने हिस्से की राशि और योजना को आगे बढ़ाने के लिए लगातार पत्राचार किया था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि कोरोना के दौर में राज्यों को वेतन तक देने में कठिनाई हो रही थी और उनकी सरकार ने आरबीआई से कर्ज लेकर परिस्थितियों को संभाला।
वहीं विजय शर्मा ने पोर्टल बंद होने के दावे को सिरे से खारिज किया। उन्होंने कहा कि पीएम आवास का पोर्टल बंद नहीं था और कोरोना काल में भी दूसरे राज्यों में योजना का काम आगे बढ़ता रहा। उन्होंने कहा कि यदि 84 हजार हितग्राहियों को राशि जारी होने का दावा किया जा रहा है तो फिर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि राशि किस पोर्टल के माध्यम से जारी हुई थी।
’84 हजार का पैसा गया तो पोर्टल कहां बंद था‘
बहस के दौरान विजय शर्मा ने भूपेश बघेल से सवाल किया कि यदि उनकी सरकार के समय 84 हजार हितग्राहियों को राशि जारी की गई थी, तो फिर पोर्टल बंद होने का दावा कैसे किया जा सकता है। इस पर बघेल ने कहा कि चार साल पुराने आंकड़े उन्हें तत्काल याद नहीं हैं।
विजय शर्मा ने इसी बिंदु को पकड़ते हुए कहा कि आंकड़ों को लेकर भ्रम पैदा नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि वे राजनीतिक आरोप लगाने नहीं, बल्कि आंकड़ों पर चर्चा करने आए हैं। उन्होंने बघेल से कहा कि वे समझ सब रहे हैं, लेकिन समझाने की कोशिश कुछ और कर रहे हैं। बहस के दौरान विजय शर्मा ने कई बार आंकड़ों की गणना सही रखने और गलत जानकारी नहीं देने की बात कही।
बघेल का सवाल- 18 लाख के बाद 10 लाख और फिर 46 लाख कैसे?
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वर्तमान सरकार के पीएम आवास संबंधी आंकड़ों पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की ओर से 18 लाख आवास स्वीकृत किए जाने की बात कही जाती है, जबकि केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की ओर से अलग से करीब 10 लाख आवासों की स्वीकृति का उल्लेख किया गया है। ऐसे में आंकड़ा जोड़ते-जोड़ते 46 लाख तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, तो इसकी वास्तविक स्थिति जनता के सामने स्पष्ट होनी चाहिए।
श्री बघेल ने सवाल किया कि यदि 18 लाख आवास स्वीकृत किए गए थे तो बाकी चार लाख आवास कहां हैं। उन्होंने सरकार से स्वीकृति और वास्तविक निर्माण के आंकड़े स्पष्ट करने की मांग की। उनका कहना था कि अलग-अलग घोषणाओं और स्वीकृतियों को जोड़कर बड़ी संख्या बताने के बजाय यह बताया जाना चाहिए कि जमीन पर कितने मकान वास्तव में बने हैं।
‘स्वीकृति, स्वीकार्यता और निर्माण अलग-अलग हैं‘
विजय शर्मा ने बघेल के सवालों का जवाब देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना में स्वीकृति, हितग्राही की स्वीकार्यता, राशि जारी होना और निर्माण पूरा होना अलग-अलग चरण हैं। इन सभी को एक ही आंकड़े में जोड़कर प्रस्तुत करने से भ्रम पैदा होता है।
उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री होने के नाते भूपेश बघेल को इन प्रक्रियाओं का अंतर पता होना चाहिए। शर्मा ने आरोप लगाया कि बघेल जानबूझकर अलग-अलग आंकड़ों को जोड़कर जनता के बीच गलतफहमी पैदा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के आंकड़े आधिकारिक प्रक्रिया के आधार पर हैं और इन्हें उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
कोरोना काल पर भी आमने-सामने
विजय शर्मा ने कांग्रेस सरकार की ओर से कोरोना काल का हवाला दिए जाने पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान देश के कई राज्यों में पीएम आवास योजना के तहत काम और स्वीकृतियां जारी रहीं। उनके मुताबिक राजस्थान, पश्चिम बंगाल, केरल और अन्य राज्यों के उदाहरण मौजूद हैं।
उन्होंने तर्क दिया कि केवल कोरोना को आधार बनाकर पीएम आवास की स्वीकृति और निर्माण में कमी को उचित नहीं ठहराया जा सकता। शर्मा ने कहा कि यदि अन्य राज्य उस समय योजना को आगे बढ़ा सकते थे तो छत्तीसगढ़ में भी इसके लिए प्रयास किए जा सकते थे।
इसके जवाब में भूपेश बघेल ने कहा कि कोरोना काल की परिस्थितियां असाधारण थीं। राज्यों की वित्तीय स्थिति बेहद खराब थी और उनकी सरकार को भी वेतन भुगतान तक के लिए आरबीआई से कर्ज लेना पड़ा था। उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल में जितना लक्ष्य केंद्र से मिला, उसके अनुरूप स्वीकृति देने का प्रयास किया गया।
‘हमने नहीं बनाए तो जनता ने सजा दे दी‘
बहस के दौरान भूपेश बघेल का यह बयान खासा चर्चा में रहा कि यदि उनके कार्यकाल में पर्याप्त आवास नहीं बन पाए तो जनता ने उन्हें चुनाव में सजा दे दी। उन्होंने कहा कि गरीबों के लिए आवास का काम जितना होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ और जनता ने इसका फैसला कर दिया। इस बयान को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि बहस के दौरान पहली बार बघेल ने इस मुद्दे पर अपने कार्यकाल की कमी को इस अंदाज में स्वीकार किया।
हालांकि, बघेल ने यह भी स्पष्ट किया कि आवास निर्माण में कमी को केवल राज्य सरकार की विफलता बताना उचित नहीं है। उन्होंने केंद्र से राशि और पोर्टल से जुड़ी अड़चनों को इसके लिए जिम्मेदार बताया।
‘झूठ परोसना बंद कीजिए‘ बनाम ‘गलतफहमी मत फैलाइए‘
बहस कई बार व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप के स्तर तक भी पहुंची। विजय शर्मा ने बघेल के आंकड़ों को गलत बताते हुए उनसे झूठ नहीं बोलने की अपील की। दूसरी ओर बघेल ने सरकार पर ‘झूठ परोसने’ का आरोप लगाया।
विजय शर्मा ने कहा कि वे व्यक्तिगत आरोपों के लिए नहीं बल्कि आंकड़ों पर चर्चा करने आए हैं। उन्होंने बघेल से कहा कि जनता के बीच गलतफहमियां नहीं फैलानी चाहिए। वहीं बघेल ने कहा कि आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश करने के बजाय सरकार को वास्तविक स्थिति बतानी चाहिए।
बहस के दौरान ‘गणित’ भी राजनीतिक तंज का विषय बना। बघेल ने स्वयं को गणित का विद्यार्थी बताते हुए आंकड़ों पर अपनी बात रखी, जबकि शर्मा लगातार बघेल से आंकड़ों की गणना और उनके स्रोत स्पष्ट करने की मांग करते रहे।
TS सिंहदेव के इस्तीफे का मुद्दा भी उठा
विजय शर्मा ने कांग्रेस सरकार के तत्कालीन पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टीएस सिंहदेव के इस्तीफे का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि पीएम आवास योजना को लेकर तत्कालीन सरकार के भीतर भी मतभेद थे और सिंहदेव ने आवास नहीं बन पाने के मुद्दे पर इस्तीफा दिया था। शर्मा ने इस घटनाक्रम को कांग्रेस सरकार की स्थिति से जोड़ते हुए बघेल सरकार पर सवाल उठाए।
बघेल ने हालांकि बहस का फोकस मौजूदा सरकार के आंकड़ों पर रखने की कोशिश की और कहा कि अब आगे बढ़कर वर्तमान सरकार को यह बताना चाहिए कि उसके दावों के मुताबिक वास्तव में कितने मकान बन चुके हैं और कितने निर्माणाधीन हैं।
प्रेस क्लब के बाहर भी गरमाया माहौल
प्रेस क्लब के भीतर दोनों नेताओं के बीच बहस चल रही थी, वहीं बाहर भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच भी विवाद की स्थिति बनी। बहस से पहले और बाद में दोनों दलों के समर्थक आमने-सामने आ गए। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और स्थिति को नियंत्रित किया गया। इस घटनाक्रम ने पीएम आवास के राजनीतिक विवाद को और गरमा दिया।
करीब 80 मिनट चली इस बहस का कोई औपचारिक विजेता घोषित नहीं हुआ, लेकिन दोनों पक्षों ने अपने-अपने राजनीतिक दावों को मजबूती से रखने की कोशिश की। विजय शर्मा ने कांग्रेस सरकार के दौरान कम आवास बनने, सात लाख की स्वीकृति के बावजूद केवल करीब 84 हजार हितग्राहियों तक राशि पहुंचने और पोर्टल बंद होने के दावे को गलत बताया। दूसरी ओर भूपेश बघेल ने केंद्र सरकार पर पोर्टल बंद करने और राशि से जुड़े अड़चनों का आरोप लगाते हुए मौजूदा सरकार के 18 लाख, 10 लाख और 46 लाख के अलग-अलग आंकड़ों पर सवाल उठाया।




