
हिन्दू से ईसाई बनने पर आरक्षण प्रदत्त सुविधा से वंचित रहना पड़ सकता है।हिन्दू समाज जाति आधारित विभेद से प्रभावित था।इस विभेद को समाप्त करने व आर्थिक-सामाजिक उन्नयन हेतु आरक्षण की व्यवस्था की गयी थी।अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति ( अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 बना। इधर देश में सक्रिय ईसाई मिशनरियों ने विभिन्न प्रलोभनों के साथ ही यह बताकर धर्मांतरण का खेल शुरू किया कि उनके मत/धर्म में जाति आधारित व्यवस्था न होने के कारण कोई जातिगत विभेद नही है। संविधान(अनुसूचित जाति) आदेश 1950 में भी स्पष्ट कर दिया है कि हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म से इतर धर्म के अनुयायी अनुसूचित जाति के सदस्य नही रहेंगे, फिर भी छुटपुट धर्मांतरण की आहट मिलती रहती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में पहले ही कहा है कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले अनुसूचित जाति के सदस्य कोई सुविधा नही ले सकते हैं।जितेन्द्र साहनी मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने इस विषय पर एक विधिक विमर्श की शुरुआत कर दी है। हालांकि यह कोई नया निर्णय नही है।सर्वोच्च न्यायालय पिछले वर्ष ही इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ बता चुका है।
संविधान (अनुसूचित जाति ) आदेश- 1950 के प्रस्तर 3 में स्पष्टतया कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति जो हिंदू ,सिख या बौद्ध धर्म से अलग धर्म मानता है उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने सी .सेल्वारानी बनाम स्पेशल सेक्रेट्री- कम- जिला कलेक्टर व अन्य (2024 एस सी सी ऑन लाइन एस सी 3470) 930 में अभिनिर्धारित कर चुका है कि ईसाई धर्म अपनाने पर कोई भी व्यक्ति अपनी मूल जाति का नहीं रहता है।इसी निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि सिर्फ लाभ लेने के उद्देश्य से धर्म बदलना संविधान के साथ धोखा है और आरक्षण नीति के सिद्धांतों के खिलाफ है। सी. सेल्वारानी (पूर्वोक्त) निर्णय के पैरा -15 का मूलपाठ इस तरह है।
“15-… भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उसे मानने का अधिकार है। कोई व्यक्ति किसी अन्य धर्म में
तभी धर्मांतरित होता है जब वह उसके सिद्धांतों और आध्यात्मिक विचारों से वास्तव में प्रेरित होता है। हालाँकि, यदि धर्मांतरण का उद्देश्य मुख्यतः आरक्षण का लाभ प्राप्त करना है, लेकिन दूसरे धर्म में कोई वास्तविक विश्वास नहीं है, तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि ऐसे गुप्त उद्देश्य वाले लोगों को आरक्षण का लाभ देना आरक्षण नीति के सामाजिक मूल्यों को ही नष्ट करेगा। इस मामले में, प्रस्तुत साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि अपीलकर्ता ईसाई धर्म को मानती है और नियमित रूप से चर्च जाकर इस धर्म का सक्रिय रूप से पालन करती है। इसके बावजूद, वह हिंदू होने का दावा करती है और रोजगार के उद्देश्य से अनुसूचित जाति समुदाय का प्रमाण पत्र चाहती है। उसका ऐसा दोहरा दावा अस्वीकार्य है और वह बपतिस्मा के बाद भी स्वयं को हिंदू के रूप में पहचान जारी नहीं रख सकती। इसलिए, अपीलकर्ता को अनुसूचित जाति का सांप्रदायिक दर्जा प्रदान करना, जो धर्म से ईसाई है, लेकिन रोजगार में आरक्षण का लाभ उठाने के उद्देश्य से अभी भी हिंदू धर्म अपनाने का दावा करती है, आरक्षण के मूल उद्देश्य के खिलाफ होगा और संविधान के साथ धोखाधड़ी होगी।”
ऐसा नहीं है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार 26 नवंबर 2025 को पूर्वोक्त मामले में इस विषय पर अपना मत व्यक्त किया है।सर्वोच्च न्यायालय सुसाइ व अन्य बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया व अन्य (एआईआर 1986 एस सी 733) और के पी मनु बनाम चेयरमैन स्क्रूटिनी कमेटी (2015) 4 एस सी सी 1 मामले में भी अभिनिर्धारित कर चुका है कि अनुसूचित जाति के सदस्यों के लिए संविधान में प्रदत्त सुविधाओं का लाभ इस जाति के वह सदस्य नहीं ले सकते, जिन्होंने धर्मांतरण कर हिंदू धर्म से ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया है।
प्रश्नगत निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरी ने सर्वोच्च न्यायालय के सी .सेल्वारानी व अन्य निर्णयों (पूर्वोक्त) का आधार लिया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के सम्पूर्ण प्रशासनिक मशीनरी को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि राज्य में ईसाई बने लोग अनुसूचित जातियों का लाभ लेना जारी न रखें। धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जाति का स्टेटस बनाए रखना “संविधान के साथ धोखाधड़ी” है। उच्च न्यायालय ने राज्य के सभी जिला मजिस्ट्रेट को विधिसम्मत तरीके से ऐसे मामलों की पहचान करने और उन्हें रोकने के लिए चार माह की कड़ी समय सीमा (डेडलाइन) तय की है।
उच्च न्यायालय ने मंत्रिमंडल सचिव (कैबिनेट सेक्रेटरी) भारत सरकार, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव/ अपर प्रमुख सचिव अल्पसंख्यक कल्याण और अपर मुख्य सचिव समाज कल्याण उत्तर प्रदेश को भी निर्देशित किया है कि इस निर्णय के आलोक में विधिसम्मत कार्यवाही सुनिश्चित करें जिससे कानून का पालन हो सके।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति गिरी ने निर्णय में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के अक्काला रामी रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2025 एस सी सी ऑन लाइन ए पी 1685) मामले में दिए गए निर्णय का भी उल्लेख किया है ।इस निर्णय में भी कहा गया है कि कोई व्यक्ति जिसने ईसाई धर्म अपना लिया है और सक्रिय रूप से उस धर्म को मानता है ,वह अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं रह सकता है क्योंकि ईसाई धर्म में जाति आधारित विभेद नही है।अनुसूचित जाति जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को अधिनियमित करने का उद्देश्य जाति आधारित भेदभाव को झेल रहे समाज को इससे मुक्ति दिलाना ही था।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने पहले से निर्गत अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को विधिशून्य करार दिया है।
उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण रोकने के लिए “उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 (संशोधित 2024)” प्रवृत्त है।अधिनियम में धोखा, जबरन व लालच देकर खासकर कमजोर, गरीब, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के सदस्यों का धर्मांतरण रोकने का कड़ा प्रावधान है।
उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के थाना सिंदुरिया निवासी जितेंद्र साहनी केवट (हिन्दू) से पादरी(ईसाई) बनकर जीसस क्राइस्ट का उपदेश सार्वजनिक स्थान पर आयोजित सभा में दिया था। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 153 ए व 295 ए के तहत अभियोग पंजीकृत कर आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया था।जितेंद्र ने आरोप पत्र और अपर न्यायिक मजिस्ट्रेट के संज्ञान व तलब करने के आदेश निरस्त करने के लिए माननीय उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने आरोप पत्र तो निरस्त नहीं किया बल्कि हिंदू से ईसाई बनने वाले अनुसूचित जाति के लोगों को संविधान प्रदत्त सुविधाएं न देने के संबंध में एक विस्तृत दिशा निर्देश उत्तर प्रदेश राज्य के अधिकारियों को अलग से दे दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों और संवैधानिक प्रावधान पर आधारित इलाहाबाद उच्च न्यायालय का यह निर्णय धर्मांतरण( खासकर हिन्दू से ईसाई )रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकता है, बशर्ते उच्च प्रशानिक पदों पर बैठे अधिकारी न्यायालय के निर्देश को गम्भीरता से लें।
सम्प्रति- लेखक डा.चन्द्रगोपाल पांडेय वरिष्ठ पत्रकार है।डा.पांडेय के विभिन्न विषयों पर लेख प्रमुख समाचार पत्रों में छपते रहते है।
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