अखिलेश के दौरे में शक्ति प्रदर्शन के बीच अनूप संडा की ‘खामोश रणनीति’ चर्चा में

(सन्तोष यादव)
सुलतानपुर, 14 अप्रैल। जिले की राजनीति एक बार फिर उस समय गरमा गई, जब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का हालिया दौरा यहां चर्चा का केंद्र बन गया। आधिकारिक तौर पर यह दौरा एक निजी कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए था, लेकिन जैसे ही सपा सुप्रीमो सुलतानपुर पहुंचे, यह आयोजन देखते ही देखते शक्ति प्रदर्शन और आगामी 2027 विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की दावेदारी का बड़ा मंच बन गया।
जिले की पांचों विधानसभा सीटों से दावेदारी ठोक रहे नेताओं ने इस मौके को पूरी तरह भुनाने की कोशिश की। जगह-जगह भव्य स्वागत, लंबी-लंबी वाहन रैलियां, समर्थकों की भीड़ और सोशल मीडिया पर वायरल होती रील्स के जरिए हर नेता ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। हर चेहरा यह संदेश देने में जुटा दिखा कि वही आने वाले चुनाव में सबसे मजबूत दावेदार है।
इस राजनीतिक हलचल और भीड़-भाड़ के बीच एक ऐसा चेहरा भी रहा, जिसने अपने अलग अंदाज से सबका ध्यान खींचा। यह चेहरा था सुलतानपुर सदर सीट से दो बार विधायक रह चुके और सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनूप संडा का। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में महज लगभग एक हजार वोटों के अंतर से हार का सामना करने वाले संडा इस पूरे घटनाक्रम में बेहद संयमित और सीमित भूमिका में नजर आए।
जहां अन्य दावेदार अपने-अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन में व्यस्त थे, वहीं अनूप संडा ने लो-प्रोफाइल रणनीति अपनाई। न उनके काफिले की भव्यता चर्चा में रही और न ही सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता विशेष रूप से दिखाई दी। वे केवल कार्यक्रम स्थल तक सीमित रहे और औपचारिक उपस्थिति दर्ज कराकर चुपचाप लौट गए।
अब सवाल यह उठ रहा है कि जब अन्य नेता खुलकर अपनी ताकत दिखाने में लगे थे, तब संडा ने यह शांत और संयमित रास्ता क्यों चुना? राजनीतिक जानकारों की मानें तो इसे एक सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। उनका मानना है कि 2022 में बेहद कम अंतर से हारने के बावजूद अनूप संडा का जनाधार अब भी मजबूत है। जिले की पांचों सीटों में सबसे कम हार का अंतर उनके खाते में रहा, जो उनकी पकड़ को दर्शाता है।
ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि संडा भीड़ और दिखावे की राजनीति से अलग रहकर नेतृत्व के सामने एक संतुलित, गंभीर और परिपक्व नेता की छवि प्रस्तुत करना चाहते हैं। यह संदेश भी देने की कोशिश हो सकती है कि उनकी दावेदारी भीड़ जुटाने या दिखावे पर नहीं, बल्कि उनके राजनीतिक अनुभव, कार्यशैली और जमीनी पकड़ पर आधारित है।
दूसरी ओर, इसे संगठनात्मक अनुशासन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। जब कई नेता व्यक्तिगत शक्ति प्रदर्शन में जुटे हुए थे, तब संडा का संयमित रहना यह दर्शाता है कि वे पार्टी लाइन और नेतृत्व की प्राथमिकताओं को समझते हुए नियंत्रित राजनीति में विश्वास रखते हैं।
हालांकि, इस रणनीति के कुछ जोखिम भी हैं। वर्तमान समय में राजनीति केवल जमीनी स्तर तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह पूरी तरह से दृश्य और डिजिटल माध्यमों पर भी निर्भर हो चुकी है। सोशल मीडिया पर सक्रियता, भीड़ का आकार और सार्वजनिक प्रदर्शन को ही अक्सर राजनीतिक ताकत का पैमाना माना जाने लगा है। ऐसे में संडा की यह सीमित मौजूदगी कहीं उनकी सक्रियता को लेकर सवाल न खड़े कर दे, यह आशंका भी जताई जा रही है।
समाजवादी पार्टी के भीतर टिकट को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। एक ओर वे नेता हैं जो आक्रामक अंदाज में अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनूप संडा जैसे नेता हैं, जो शांत, संयमित और प्रतीकात्मक उपस्थिति के जरिए अपनी जगह मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं।
फिलहाल, सुलतानपुर की सियासत में अनूप संडा की यह ‘खामोश मौजूदगी’ उतनी ही चर्चा में है, जितना अन्य नेताओं का जोरदार शक्ति प्रदर्शन। अब देखना यह होगा कि आने वाले समय में पार्टी नेतृत्व इस ‘शोर’ और ‘खामोशी’ के बीच किसे ज्यादा अहमियत देता है।


