(संतोष कुमार यादव)
सुलतानपुर 23 मई। जब सड़क पर क्रांति कम, कंटेंट ज्यादा बनने लगे तो पार्टी ने संज्ञान लेकर प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल की संस्तुति पर जिलाध्यक्ष समेत पूरी कार्यकारिणी भंग कर संदेश देने की कोशिश की गई कि, आंदोलन और अभिनय में फर्क होता है।
इस कार्रवाई के साथ समाजवादी पार्टी की छात्र राजनीति में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान भी आखिर खुलकर सामने आ गई। मामला यूपी के सुल्तानपुर जिले का है जहां छात्र राजनीति में ‘फोटोक्रांति’ पर पार्टी ने सख्त रुख अपनाया। छात्र सभा के जिलाध्यक्ष रहे राम प्रकाश मौर्य को न सिर्फ पद से हटाया गया बल्कि उनके नेतृत्व वाली पूरी जिला कार्यकारिणी भी भंग कर दी गई। यह कार्रवाई प्रदेश अध्यक्ष श्यामलाल पाल की संस्तुति पर समाजवादी छात्रसभा के प्रदेश अध्यक्ष विनीत कुशवाहा द्वारा की गई।
वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस कार्रवाई को समाजवादी पार्टी के भीतर एक ’संगठनात्मक चेतावनी’ के रूप में देखा जा रहा है। संदेश साफ है कि अब पार्टी केवल सोशल मीडिया आधारित सक्रियता या प्रतीकात्मक धरनों से संतुष्ट नहीं होगी। यह फैसला यह भी बताता है कि आने वाले चुनाव में पार्टी ’अनुशासन बनाम व्यक्तिगत ब्रांडिंग’ की लड़ाई में संगठन को प्राथमिकता देने वाली है। राजनीति अब केवल कैमरे में दिखने की नहीं, जमीन पर दिखने की कसौटी पर कसी जाएगी। हालांकि जिले में छात्रसभा की कार्यकारिणी की सूची सार्वजनिक या संगठन को उपलब्ध न कराना भी पार्टी नेतृत्व की नाराजगी का एक बड़ा कारण माना जा रहा है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, संगठन लगातार इस बात से नाराज था कि जिला इकाई पार्टी की निर्धारित गाइडलाइन से हटकर काम कर रही थी। आरोप है कि छात्र सभा के कुछ पदाधिकारी सुल्तानपुर में संगठन विस्तार और छात्र मुद्दों पर काम करने के बजाय आए दिन लखनऊ पहुंचकर छोटे-छोटे धरना, प्रदर्शन और नारेबाजी कर रहे थे। इन कार्यक्रमों में सीमित संख्या में लोग शामिल होते थे, लेकिन सोशल मीडिया और मीडिया कवरेज के जरिए उन्हें बड़े आंदोलन के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती थी।
सूत्र बताते हैं कि कई बार चार से छह लोगों का समूह अचानक राजधानी में किसी मुद्दे को लेकर सड़क पर उतर आता था। कुछ देर नारेबाजी, फिर पुलिस की मौजूदगी, फोटो और वीडियो शूट, उसके बाद गिरफ्तारी की औपचारिकता और दस मिनट में कार्यक्रम समाप्त। पार्टी के भीतर इसे ’सस्ती लोकप्रियता’ और ’अनियोजित राजनीति’ के तौर पर देखा जाने लगा था। सपा के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि राजधानी में कम संख्या वाले प्रदर्शन पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाते हैं। उनका कहना था कि जब किसी जिले के नाम पर आंदोलन हो और वहां कार्यकर्ताओं की संख्या नगण्य दिखे, तो विपक्ष को पार्टी पर सवाल उठाने का मौका मिल जाता है।
वहीं छात्रसभा के एक प्रदेश पदाधिकारी ने साफ कहा कि संगठनात्मक व्यवस्था का पालन जरूरी है। उनके अनुसार, जिला इकाइयों को अपने-अपने जिलों में जिलाध्यक्ष और पार्टी संगठन की अनुमति से आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन कार्यक्रम करने चाहिए। प्रदेश मुख्यालय पर बड़े आंदोलन और प्रदर्शन के लिए प्रदेश नेतृत्व और उसकी अधिकृत टीम पहले से मौजूद है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह कार्रवाई केवल एक जिला इकाई तक सीमित नहीं है, बल्कि समाजवादी पार्टी का यह संदेश भी है कि संगठन में अनुशासनहीनता और व्यक्तिगत प्रचार की राजनीति अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। खासकर ऐसे समय में जब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है, पार्टी जिला स्तर पर मजबूत और नियंत्रित संगठनात्मक ढांचा चाहती है।
छात्र राजनीति से जुड़े लोगों का कहना है कि छात्र संगठनों की भूमिका केवल नारेबाजी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि जिला इकाइयां अपने क्षेत्र के विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और युवाओं के मुद्दों पर सक्रिय रहें, तो संगठन की पकड़ अधिक मजबूत हो सकती है। लेकिन जब राजनीति केवल कैमरे और सोशल मीडिया तक सिमटने लगे, तो संगठनात्मक विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
फिलहाल छात्र सभा की जिला कार्यकारिणी भंग होने के बाद सुल्तानपुर इकाई में नए नेतृत्व को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में पार्टी ऐसे चेहरों को आगे ला सकती है जो संगठनात्मक अनुशासन के साथ-साथ जमीनी सक्रियता पर भी खरे उतरें। वहीं यह पूरा प्रकरण केवल अनुशासनहीनता का नहीं, बल्कि संगठनात्मक अव्यवस्था का भी संकेत देता है। संवाददाता से बातचीत दौरान समाजवादी छात्र सभा के प्रदेश अध्यक्ष विनीत कुशवाहा असली वजह बताने से बचते रहे। उन्होंने बताया कि, छात्र सभा जिलाध्यक्ष से बार–बार कार्यकारिणी की सूची मांगे जाने पर उपलब्ध नहीं कराई गई। वे इस पद पर कार्य करने के इच्छुक नहीं थे, उनकी इच्छा से उन्हें पदमुक्त किया गया। जिला महासचिव सलाहुद्दीन कहते हैं कि, उनके पास सूची कभी जमा ही नहीं हुई, वहीं छात्र सभा जिलाध्यक्ष रहे राम प्रकाश मौर्य ने कार्रवाई को लखनऊ में आंदोलन की सक्रियता से जोड़ा, हालांकि सूची के सवाल पर उन्होंने स्वयं के पास होने से इनकार कर जिम्मेदारी दूसरे पदाधिकारी पर डाल दिया। संभवतः इसी वजह से पार्टी नेतृत्व ने कठोर कदम उठाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब ’व्यक्तिगत सक्रियता’ नहीं, बल्कि व्यवस्थित संगठन ही प्राथमिकता होगा।




