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मतदाता सूची पुनरीक्षण पर भड़के पूर्व सीईसी कुरैशी, बोले- नाम जोड़ने नहीं, काटने पर है पूरा जोर

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नई दिल्ली, 15 जुलाई। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) एस.वाई. कुरैशी ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की मौजूदा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली की आलोचना की है।

      श्री कुरैशी के अनुसार वर्तमान प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य नए मतदाताओं को जोड़ना नहीं, बल्कि अधिक से अधिक लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाना प्रतीत होता है। उन्होंने इसे लोकतंत्र और स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए चिंताजनक बताया।

     अपनी नई पुस्तक ‘इंडिया एंड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज़, नॉट ए मेमॉयर’ के विमोचन से पहले दिए एक साक्षात्कार में कुरैशी ने कहा कि मतदाता के रूप में पंजीकरण प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था ऐसा आभास कराती है मानो निर्वाचन आयोग मतदाता सूची में नाम जोड़कर कोई एहसान कर रहा हो।

      देश के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे कुरैशी ने कहा कि एसआईआर की वर्तमान प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं दिखती और इसका पूरा ध्यान मतदाता सूची से नाम हटाने पर केंद्रित है। उनके अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारियों का मूल्यांकन इस आधार पर किया जा रहा है कि वे कितने लोगों के नाम सूची से हटा पाए।

     उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान व्यवस्था में करोड़ों लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला हैं और यदि मतदाता सूची से योग्य नागरिकों के नाम हटते हैं तो यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है।

     कुरैशी ने अपने कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय चुनाव अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाते थे कि यदि किसी मतदाता के नाम की वर्तनी, आयु या पते में मामूली त्रुटि हो, लेकिन उसकी पहचान स्पष्ट हो, तो केवल तकनीकी कारणों से उसका नाम सूची से बाहर नहीं किया जाए। प्राथमिकता इस बात पर होती थी कि कोई पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न रहे।

     उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग पहले भी अपने संवैधानिक दायित्व के तहत हर वर्ष मतदाता सूची का नियमित पुनरीक्षण करता था। वर्ष 2002-03 में बिहार में हुए व्यापक पुनरीक्षण के बाद यह निर्णय लिया गया था कि चूंकि मतदाता सूचियां कंप्यूटरीकृत हो चुकी हैं, इसलिए हर बार नए सिरे से घर-घर जाकर गहन पुनरीक्षण की आवश्यकता नहीं होगी।

    कुरैशी के अनुसार, यदि अधिकांश मतदाताओं का रिकॉर्ड पहले से सही है, तो हर घर जाकर पूरी प्रक्रिया दोहराना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने बताया कि पहले बूथ स्तरीय अधिकारी (बीएलओ) केवल सूची का सत्यापन करते थे। यदि किसी नए मतदाता का नाम जोड़ना होता था तो फॉर्म-6 भरवाया जाता था, जबकि स्थानांतरण या मृत्यु की स्थिति में नाम हटाने के लिए फॉर्म-7 का उपयोग किया जाता था।

    उन्होंने कहा कि इस वार्षिक व्यवस्था से लगभग 99 प्रतिशत मतदाता सूची सही और अद्यतन बनी रहती थी तथा अनावश्यक परेशानियों से भी बचा जा सकता था।