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मुकदमों के डर ने थामे टिकट दावेदारों के कदम, सड़क की लड़ाई में अकेले पड़े ’अनूप संडा’

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(संतोष यादव)

सुलतानपुर 23 जुलाई।नीट परीक्षा में कथित धांधली के विरोध में दिल्ली के जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन को लेकर समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर पूरी ताकत के साथ मैदान में है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, सांसद डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव समेत कई सांसद छात्रों के समर्थन में सड़क से संसद तक आवाज बुलंद कर रहे हैं। गिरफ्तारी दे रहे हैं, केंद्र सरकार को घेर रहे हैं और आंदोलन को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में जुटे हैं। लेकिन इसके उलट सुल्तानपुर की तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई दी। यहां सुल्तानपुर विधानसभा को छोड़ दें तो जिले की बाकी चार विधानसभाओं में विपक्षी आंदोलन लगभग नदारद रहा।

       जिले में छात्र आंदोलन के समर्थन में सबसे मुखर भूमिका पूर्व विधायक अनूप संडा की रही। 17 जुलाई को उन्होंने पहले शहर में कैंडल मार्च निकालकर छात्रों के समर्थन में जनमत तैयार करने की कोशिश की और फिर 23 जुलाई से तिकोनिया पार्क में अनिश्चितकालीन धरने का ऐलान कर दिया। प्रशासन ने धरने की अनुमति नहीं दी। इसके बावजूद जब वह अपने आवास से समर्थकों के साथ नारेबाजी करते हुए निकले तो पुलिस ने उन्हें, ज्ञान प्रकाश यादव, त्रियुगी यादव, विकास चौरसिया, जमीरुद्दीन हाशमी, जयंत यादव , मंगल निषाद, राजू चौधरी, देव यादव सहित कई महिलाओं को हिरासत में लेकर पुलिस लाइन भेज दिया। इस घटनाक्रम के बाद जिले में विपक्ष की सक्रियता का केंद्र सिर्फ अनूप संडा ही दिखाई दिए।

       उधर, राजनीतिक गलियारों में चर्चा इस बात की भी रही कि जिले की सदर, इसौली, कादीपुर, लंभुआ और सुल्तानपुर विधानसभा सीटों पर दावेदारी कर रहे अधिकांश नेता आंदोलन की बजाय लखनऊ और दिल्ली की राजनीतिक गतिविधियों में अधिक व्यस्त नजर आए। 2027 के लिए शीर्ष नेतृत्व के समक्ष चेहरे दिखाने की इन सबमें होड़ लगी है।

       दूसरी ओर, पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा भी है कि कई वरिष्ठ नेता और संभावित प्रत्याशी कानूनी कार्रवाई या मुकदमों की आशंका के कारण खुलकर आंदोलन से दूरी बनाए हुए हैं। यही कारण रहा कि जिले में विपक्ष की भूमिका कुछ गिने-चुने नेताओं तक सीमित दिखाई दी। कार्यकर्ताओं का मानना है कि संघर्ष की राजनीति में जोखिम उठाने का साहस ही नेता की पहचान होता है और यदि आंदोलन के समय नेतृत्व पीछे हट जाए तो कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित होता है। एक बुजुर्ग नेता का कहना है कि जिस सुल्तानपुर में समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान पांच-पांच दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री सक्रिय रहते थे और हर बड़े मुद्दे पर पार्टी सड़क पर दिखाई देती थी, वहीं आज हालात बदल चुके हैं। संगठन के कई बड़े चेहरे सार्वजनिक आंदोलनों से दूर हैं। इससे न केवल विपक्ष की धार कमजोर पड़ती है, बल्कि कार्यकर्ताओं के बीच भी नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ने लगता है।

       हालांकि समाजवादी छात्र सभा, युवजन सभा, यूथ ब्रिगेड और लोहिया वाहिनी के कुछ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई, लेकिन जिलेभर में मुख्य विपक्षी दल होने के नाते व्यापक लामबंदी नहीं बन सकी। यही वजह है कि राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष का संदेश देने वाली समाजवादी पार्टी की स्थानीय इकाई की सक्रियता अब चर्चा का विषय बन गई है।

      कई कार्यकर्ताओं ने बातचीत दौरान कहा कि, ऐसे समय में जब दिल्ली में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व आंदोलन का चेहरा बना हुआ है, तब सुल्तानपुर में टिकट के दावेदारों एवं अधिकांश बड़े नेताओं की खामोशी और गैरमौजूदगी कई ऐसे सवाल छोड़ रही है, जिनका जवाब शायद आने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी संगठन को स्वयं देना पड़े।

‘तटस्थ’ कौन? दिनकर की पंक्तियों ने सपा में छेड़ी नई सियासी बहस

    जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के समर्थन में प्रस्तावित धरने से पहले प्रशासनिक कार्रवाई और फिर पूर्व विधायक अनूप संडा की सोशल मीडिया पोस्ट अब राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है। खासतौर पर पोस्ट के अंत में लिखी गई राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध पंक्तियां “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याघ्र, जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध” को लेकर तरह-तरह के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

       लोगों का मानना है कि यह केवल साहित्यिक उद्धरण नहीं, बल्कि एक सियासी संदेश भी हो सकता है। जिस समय राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व छात्र आंदोलन के समर्थन में सड़क से संसद तक सक्रिय दिखाई दे रहा है, उसी दौरान सुल्तानपुर में पार्टी के अधिकांश बड़े चेहरे सार्वजनिक आंदोलनों से दूर रहे। ऐसे में पूर्व विधायक अनूप संडा की यह टिप्पणी संगठन के भीतर निष्क्रियता पर सवाल खड़ा करने वाली मानी जा रही है।

       पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच भी यह चर्चा है कि 2027 विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की दावेदारी करने वाले कई नेता इस समय आंदोलन की बजाय राजनीतिक समीकरण साधने में अधिक व्यस्त हैं। ऐसे में दिनकर की इन पंक्तियों को टिकट की चाहत रखने वाले उन नेताओं के लिए एक राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है, जो संघर्ष के समय तटस्थ बने हुए हैं। हालांकि अनूप संडा ने अपनी पोस्ट में किसी नेता या पदाधिकारी का नाम नहीं लिया है।