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बस्तर की नई सुबह: सुरक्षा के साथ ही अब विकास को जमीन पर उतारने की चुनौती

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(अशोक कुमार साहू)

कभी नक्सल हिंसा, भय और अविकास का पर्याय रहा बस्तर आज परिवर्तन के ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहां पहली बार विकास की चर्चा सुरक्षा अभियानों पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि बस्तर की सबसे बड़ी समस्या नक्सलवाद है, लेकिन अब जबकि सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों से नक्सली हिंसा सिमटी है, राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती शांति को स्थायी विकास में बदलने की है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय का हालिया दिल्ली दौरा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा सकता है।

     मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों के समक्ष जिस व्यापक “बस्तर विजन” का खाका रखा, वह केवल परियोजनाओं की सूची नहीं, बल्कि बस्तर के समग्र विकास का रोडमैप प्रस्तुत करता है। यदि इन प्रस्तावों को समयबद्ध तरीके से अमल में लाया जाता है, तो आने वाले वर्षों में बस्तर की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

      मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री के समक्ष सबसे पहले उन 461 गांवों का मुद्दा उठाया, जहां दशकों तक नक्सली हिंसा के कारण बिजली का स्थायी ग्रिड नहीं पहुंच पाया। इन गांवों को राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड से जोड़ने के लिए केंद्र से विशेष वित्तीय सहायता का अनुरोध किया गया है। बिजली केवल एक सुविधा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और डिजिटल सेवाओं तक पहुंच का आधार है। जिन क्षेत्रों में आज भी अंधेरा विकास की सबसे बड़ी बाधा है, वहां यह पहल परिवर्तनकारी साबित हो सकती है।

     इसी क्रम में बस्तर में अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद) की स्थापना का प्रस्ताव भी महत्वपूर्ण है। जनजातीय क्षेत्रों में पारंपरिक औषधीय ज्ञान और आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा के समन्वय से स्वास्थ्य सेवाओं का नया मॉडल विकसित किया जा सकता है। यदि यह संस्थान स्थापित होता है तो बस्तर स्वास्थ्य और औषधीय अनुसंधान के क्षेत्र में भी नई पहचान बना सकता है।

       मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को बताया कि ‘नियद नेल्ला नार 2.0’ और ‘बस्तर मुहिम’ के माध्यम से संभाग के 5,542 गांवों में सरकारी योजनाओं का व्यापक विस्तार किया जा रहा है और लगभग 39 लाख लोग इनका लाभ प्राप्त कर रहे हैं। राशन, आयुष्मान भारत, जनधन, वनाधिकार और प्रधानमंत्री आवास जैसी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना किसी भी लोकतांत्रिक शासन की सफलता का महत्वपूर्ण पैमाना है। यदि इन योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित होता है तो यह केवल कल्याणकारी कार्यक्रम नहीं रहेंगे, बल्कि सामाजिक विश्वास बहाली का भी माध्यम बनेंगे।

        शिक्षा के क्षेत्र में हुए बदलाव उल्लेखनीय हैं। नक्सल प्रभावित इलाकों में वर्षों से बंद पड़े 421 स्कूलों का पुनः संचालन इस बात का संकेत है कि परिस्थितियां बदल रही हैं। दंतेवाड़ा की सफलता को आधार बनाकर ओरछा और जगरगुंडा में नई एजुकेशन सिटी विकसित करने की योजना दूरस्थ क्षेत्रों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। शिक्षा ही वह माध्यम है जो किसी भी क्षेत्र को हिंसा और पिछड़ेपन के चक्र से स्थायी रूप से बाहर निकाल सकती है।

        स्वास्थ्य सेवाओं में भी सुधार की कोशिशें दिखाई देती हैं। मुख्यमंत्री स्वस्थ बस्तर अभियान के तहत लाखों लोगों की स्वास्थ्य जांच, जगदलपुर में सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल और गीदम में मेडिकल कॉलेज जैसी परियोजनाएं इस दिशा में सकारात्मक संकेत हैं। हालांकि चुनौती केवल भवन निर्माण तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता, आधुनिक उपकरण, दवाओं की निरंतर आपूर्ति और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक होगा।

      बस्तर के विकास में आधारभूत संरचना सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। सड़क, रेल और हवाई संपर्क में सुधार के बिना उद्योग, पर्यटन और निवेश की संभावनाएं सीमित रहेंगी। लगभग 3,513 करोड़ रुपये की लागत से निर्माणाधीन जगदलपुर-रावघाट रेललाइन इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण परियोजना है। इसके अलावा किरंदुल-कोत्तागुडेम तथा गढ़चिरौली-बीजापुर-किरंदुल रेल परियोजनाओं के सर्वे कार्य को शीघ्र पूरा करने का आग्रह भी भविष्य की कनेक्टिविटी को मजबूत करेगा। रायपुर-विशाखापट्टनम एक्सप्रेस-वे और इंद्रावती नदी पर प्रस्तावित बैराज परियोजना भी कृषि, सिंचाई और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को नई गति देने की क्षमता रखती है।

       बस्तर की भौगोलिक परिस्थितियां सामान्य क्षेत्रों से भिन्न हैं। घने जंगल, पहाड़ियां और बिखरी हुई छोटी-छोटी बसाहटें यहां सड़क निर्माण को चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत विशेष प्रावधान की मुख्यमंत्री की मांग व्यावहारिक प्रतीत होती है। अरुणाचल प्रदेश की तर्ज पर दस किलोमीटर की परिधि में स्थित बसाहटों को एक क्लस्टर मानने का प्रस्ताव यदि स्वीकार होता है तो सैकड़ों गांव पहली बार सर्वकालिक सड़क संपर्क से जुड़ सकेंगे। सड़क केवल आवागमन का माध्यम नहीं होती, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बाजार, प्रशासन और सुरक्षा की जीवनरेखा भी होती है।

       डिजिटल कनेक्टिविटी आज विकास का नया मानदंड बन चुकी है। मुख्यमंत्री द्वारा 2,305 नए मोबाइल टावरों की स्वीकृति का अनुरोध और पहले से स्वीकृत 577 टावरों की स्थापना में तेजी लाने की पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण है। जिन गांवों तक मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट नहीं पहुंचते, वहां डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन स्वास्थ्य सेवाएं, बैंकिंग, ई-गवर्नेंस और डिजिटल अर्थव्यवस्था की कल्पना भी अधूरी रहती है। डिजिटल समावेशन अब विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी आवश्यकता बन चुका है।

     बस्तर केवल प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारत की अमूल्य धरोहर है। बस्तर दशहरा विश्व का सबसे लंबा और अनूठा दशहरा उत्सव माना जाता है। चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, जनजातीय परंपराएं, लोककला और हस्तशिल्प इसे वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिला सकते हैं। यदि पर्यटन का विकास स्थानीय समुदाय की भागीदारी और पर्यावरण संरक्षण के साथ किया जाए तो यह हजारों युवाओं के लिए रोजगार का बड़ा स्रोत बन सकता है। कैनोपी वॉक, ग्लास ब्रिज और एडवेंचर टूरिज्म जैसी परियोजनाएं भी इस दिशा में नए अवसर खोल सकती हैं।

      यह भी उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार विकास के साथ-साथ बस्तर की सांस्कृतिक अस्मिता को भी समान महत्व देने का प्रयास कर रही है। राष्ट्रपति भवन में बस्तर पंडुम-2026 के विजेताओं, पारंपरिक जनजातीय नेतृत्व व्यवस्था के प्रतिनिधियों और पद्मश्री सम्मानित विभूतियों का सम्मान केवल औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का सशक्त संदेश भी था। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में भविष्य में शामिल होने की इच्छा व्यक्त करना भी इस सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करता है।

     फिर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि बस्तर में आई शांति अचानक नहीं आई है। इसके पीछे सुरक्षा बलों के हजारों जवानों का साहस, अनेक निर्दोष नागरिकों की शहादत और वर्षों तक चले कठिन अभियानों का इतिहास जुड़ा है। इसलिए विकास की इस यात्रा में सुरक्षा व्यवस्था को कमजोर नहीं होने देना होगा। इतिहास बताता है कि केवल सुरक्षा अभियान स्थायी समाधान नहीं देते और केवल विकास योजनाएं भी पर्याप्त नहीं होतीं। दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना ही दीर्घकालिक सफलता की कुंजी है।

       एक और महत्वपूर्ण चुनौती आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों के पुनर्वास की है। केवल आर्थिक सहायता देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मान सकती। उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार और सम्मानजनक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने होंगे। इससे भी अधिक आवश्यक है कि समाज उन्हें स्वीकार करे, ताकि वे दोबारा हिंसा के रास्ते पर लौटने को विवश न हों। सफल पुनर्वास ही स्थायी शांति की वास्तविक गारंटी बन सकता है।

      बस्तर आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। पहली बार ऐसा अवसर आया है जब सुरक्षा, विकास, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य, डिजिटल कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक संरक्षण—सभी मोर्चों पर समानांतर प्रयास दिखाई दे रहे हैं। लेकिन किसी भी विजन की वास्तविक सफलता उसकी घोषणाओं में नहीं, बल्कि समयबद्ध क्रियान्वयन में निहित होती है। केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय, पारदर्शी कार्यप्रणाली और स्थानीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी ही इस परिवर्तन को स्थायी बना सकती है।

      यदि प्रस्तावित योजनाएं निर्धारित समयसीमा में पूरी होती हैं और विकास का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है, तो आने वाले वर्षों में बस्तर केवल नक्सलवाद से मुक्त क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि समावेशी विकास, सांस्कृतिक गौरव और जनभागीदारी के राष्ट्रीय मॉडल के रूप में भी पहचाना जा सकता है। यही वह नई सुबह होगी, जिसकी प्रतीक्षा बस्तर ने दशकों तक की है।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।