जगदलपुर, 11 अगस्त। छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति और लोक परंपराओं का सबसे बड़ा पर्व बस्तर दशहरा बुधवार, 12 अगस्त से विधिवत शुरू होने जा रहा है। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के मंदिर प्रांगण में हरेली अमावस्या के पावन अवसर पर पाट जात्रा पूजा विधान के साथ 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक पर्व का शुभारंभ होगा।
पाट जात्रा पूजा के दौरान पारंपरिक मांझी-चालकी, मेम्बर-मेम्बरीन, पुजारी, पटेल, नाईक-पाईक और सेवादार रथ निर्माण के लिए आवश्यक औजार तैयार करने की पारंपरिक रस्म ‘श्ठुरलू खोटलाश्’ अदा करेंगे। बस्तर दशहरा समिति ने सभी सेवादारों, ग्रामीणों और गणमान्य नागरिकों से इस महत्वपूर्ण पूजा विधान में शामिल होने की अपील की है।
75 दिनों तक चलेंगे बस्तर दशहरा के पारंपरिक अनुष्ठान
बस्तर दशहरा समिति की ओर से पर्व के प्रमुख कार्यक्रमों की तिथियां जारी कर दी गई हैं। 12 अगस्त बुधवार को पाट जात्रा पूजा विधान के साथ दशहरा पर्व का शुभारंभ होगा। इसके बाद 24 सितंबर को डेरी गड़ाई पूजा विधान, 10 अक्टूबर को काछनगादी पूजा विधान, 11 अक्टूबर को कलश स्थापना और 12 अक्टूबर को जोगी बिठाई पूजा विधान आयोजित किया जाएगा।13 से 18 अक्टूबर तक प्रतिदिन नवरात्रि पूजा और रथ परिक्रमा पूजा विधान होंगे। 18 अक्टूबर को सुबह 11 बजे बेल पूजा विधान, जबकि 19 अक्टूबर को महाअष्टमी पूजा विधान और निशा जात्रा का आयोजन किया जाएगा।इसके बाद 20 अक्टूबर को कुंवारी पूजा, जोगी उठाई और मावली परघाव की रस्म होगी। 21 अक्टूबर को भीतर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा और 22 अक्टूबर को बाहर रैनी पूजा विधान एवं रथ परिक्रमा आयोजित की जाएगी।
मुरिया दरबार समेत होंगे कई ऐतिहासिक आयोजन
बस्तर दशहरा के कार्यक्रमों की कड़ी में 23 अक्टूबर को सुबह काछन जात्रा पूजा विधान और दोपहर में ऐतिहासिक मुरिया दरबार आयोजित होगा। इसके अगले दिन 24 अक्टूबर को कुटुम्ब जात्रा पूजा विधान के तहत ग्राम्य देवी-देवताओं की विदाई की जाएगी।
पर्व का औपचारिक समापन 27 अक्टूबर को मावली माता की डोली की विदाई पूजा विधान के साथ होगा।
जनजातीय संस्कृति और लोक परंपराओं का अनूठा उत्सव
मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे और अनूठे दशहरा पर्वों में शामिल है। करीब 75 दिनों तक चलने वाला यह पर्व अपनी विशिष्ट जनजातीय परंपराओं, लोक आस्थाओं, पारंपरिक रस्मों और सामुदायिक सहभागिता के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है।
बस्तर दशहरा की सबसे खास बात यह है कि यहां दशहरा केवल भगवान राम की विजय से जुड़ा पर्व नहीं है, बल्कि यह मां दंतेश्वरी की आराधना और बस्तर की समृद्ध जनजातीय संस्कृति एवं लोक परंपराओं का भव्य उत्सव है। पर्व के दौरान होने वाली प्रत्येक रस्म का अपना ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है।




