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तिरंगे की छांव में बदलता बस्तर : भय से विश्वास और हिंसा से विकास की ओर

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( अशोक कुमार साहू)

बस्तर की धरती ने लंबे समय तक हिंसा, भय और असुरक्षा का वह दौर देखा है, जिसकी पीड़ा को केवल आंकड़ों में नहीं समझा जा सकता। यहां बंदूकों की आवाज ने कई परिवारों से उनके अपने छीन लिए, विकास की राह को बाधित किया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास को चोट पहुंचाई। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। आज उसी बस्तर की तस्वीर बदलती दिखाई दे रही है। कभी जहां राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा फहराना भी चुनौती माना जाता था, वहां अब गांव-गांव राष्ट्रीय ध्वज शान से लहरा रहा है। इसी बदलते बस्तर की तस्वीर को सामने लाने वाली ‘बस्तर तिरंगा यात्रा-2026’ केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक आयोजन नहीं, बल्कि भय से विश्वास और हिंसा से विकास की ओर बढ़ते एक बड़े सामाजिक परिवर्तन का संदेश बनकर सामने आई है।

           12 अगस्त को नारायणपुर से शुरू हुई यह यात्रा तीन दिनों में करीब 600 किलोमीटर का सफर तय करते हुए बस्तर के पांच जिलों..नारायणपुर, कोंडागांव, दंतेवाड़ा, सुकमा और बीजापुर..से होकर गुजरी और कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर तिरंगा फहराने के साथ पूरी हुई। उपमुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा और वन मंत्री केदार कश्यप ने बाइक से यात्रा का नेतृत्व किया। यात्रा का मार्ग केवल भौगोलिक दूरी तय करने वाला रास्ता नहीं था; यह उन इलाकों से होकर गुजरा जिन्हें कभी नक्सल हिंसा के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों के रूप में जाना जाता था।

          इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश शायद यही है कि बस्तर में बदलाव को केवल सुरक्षा अभियान की सफलता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। किसी भी क्षेत्र से हिंसा का अंत तभी स्थायी हो सकता है, जब वहां रहने वाले लोगों के मन से भय समाप्त हो, उन्हें अपने भविष्य पर भरोसा हो और उन्हें यह महसूस हो कि शासन उनके साथ खड़ा है। तिरंगा इसी विश्वास का प्रतीक बनकर उभरा है। उपमुख्यमंत्री ने कहा कि पहले राष्ट्रीय पर्वों पर माओवादियों के फरमान के कारण लोग अपने घरों पर काला झंडा लगाने के लिए मजबूर होते थे, जबकि आज अनेक घरों पर तिरंगा लहरा रहा है। उनके अनुसार बस्तरवासियों के मनोबल और सुरक्षा बलों के अदम्य साहस ने इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

        तिरंगा यात्रा की सार्थकता इस बात में भी है कि उसने शहीदों की स्मृति को विकास के संकल्प के साथ जोड़ा। दंतेवाड़ा के श्यामगिरी में शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई, शहीद परिवारों से मुलाकात की गई और उनकी स्मृति में पौधरोपण किया गया। एर्राबोर में नक्सल हिंसा में शहीद हुए 33 जवानों को श्रद्धांजलि दी गई। यात्रा के दौरान विभिन्न घटनास्थलों से शहादत की मिट्टी एकत्र करने की पहल भी की गई, जिसका उपयोग भविष्य में बनने वाले स्मारक में किए जाने की बात कही गई। यह जरूरी है, क्योंकि विकास का कोई भी नया अध्याय उन लोगों की स्मृति को भुलाकर नहीं लिखा जा सकता, जिन्होंने शांति की कीमत अपने जीवन से चुकाई है।

          बस्तर के बदलाव की दूसरी महत्वपूर्ण तस्वीर स्थानीय लोगों की भागीदारी में दिखाई देती है। कभी जिन क्षेत्रों में दिन के समय भी जाना कठिन माना जाता था, वहां तिरंगा यात्रा के स्वागत के लिए बच्चे, महिलाएं और ग्रामीण बड़ी संख्या में सामने आए। टेकलगुड़ेम, सिलगेर, ताड़मेटला, तर्रेम और जगरगुंडा जैसे दूरस्थ इलाकों में बारिश के बावजूद ग्रामीणों का यात्रा का स्वागत करने पहुंचना बताता है कि लोगों के भीतर परिस्थितियों के बदलने का विश्वास पैदा हुआ है। यह बदलाव किसी सरकारी घोषणा से अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी क्षेत्र में स्थायी शांति की असली कसौटी वहां के नागरिकों का भयमुक्त होकर सार्वजनिक जीवन में लौटना ही है।

           बस्तर में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने का अर्थ केवल मतदान तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ तब है, जब नागरिक बिना भय के अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकें, अपनी बात कह सकें और अपने क्षेत्र के विकास की दिशा तय करने में भागीदार बनें। उपमुख्यमंत्री ने भी इसी संदर्भ में कहा कि बंदूक के बल पर कायम व्यवस्था जनता के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती और लोकतंत्र में वही व्यवस्था मान्य है जो जनता द्वारा चुनी गई और जनता के प्रति जवाबदेह हो। यह संदेश बस्तर के संदर्भ में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां लंबे समय तक हिंसा ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और सामान्य नागरिक जीवन को प्रभावित किया।

           लेकिन नक्सलवाद के कमजोर पड़ने को ही अंतिम उपलब्धि मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती अब शुरू होती है। जिस बस्तर ने हिंसा की लंबी रात देखी है, उसे विकास की सुबह में स्थायी रूप से बदलना होगा। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंटरनेट, रोजगार और कौशल विकास जैसी बुनियादी सुविधाओं को उन अंतिम गांवों तक पहुंचाना होगा जहां अब तक शासन की उपस्थिति सीमित रही है। गृह मंत्री ने बस्तर में सड़क, शिक्षा, कौशल विकास, लघु वनोपज के प्रसंस्करण और रोजगार के क्षेत्र में योजनाबद्ध काम करने की बात कही है। यह दिशा तभी सफल होगी जब योजनाएं कागज से निकलकर स्थानीय जरूरतों के अनुरूप जमीन पर दिखाई दें।

        बस्तर के विकास का मॉडल बाहर से थोपा हुआ नहीं होना चाहिए। यह बस्तर की प्रकृति, संस्कृति, परंपरा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को केंद्र में रखकर तैयार होना चाहिए। बस्तर के पास जल, जंगल, जमीन, लघु वनोपज और प्राकृतिक सौंदर्य की बड़ी संपदा है। आवश्यकता इस बात की है कि इन संसाधनों का संरक्षण करते हुए स्थानीय समुदायों को उनके आर्थिक लाभ में वास्तविक भागीदारी मिले। लघु वनोपज का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, वन आधारित रोजगार, पर्यटन, हस्तशिल्प और कौशल विकास जैसे क्षेत्र बस्तर के युवाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

         शिक्षा इस परिवर्तन की सबसे मजबूत नींव हो सकती है। जिस पीढ़ी ने हिंसा और भय देखा है, अगली पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा, तकनीक और रोजगार के अवसर देने होंगे। सरकार की ओर से दूरस्थ क्षेत्रों में सुरक्षा कैंपों को ‘शहीद वीर गुंडाधूर सेवा डेरा’ के रूप में विकसित कर वहां स्कूल, अस्पताल, आंगनबाड़ी और कौशल विकास केंद्र जैसी सुविधाएं विकसित करने की बात इसी दिशा में एक प्रयास है। यदि ऐसे केंद्र स्थानीय संस्कृति और जरूरतों के अनुरूप विकसित किए जाते हैं, तो सुरक्षा की मौजूदगी धीरे-धीरे विकास और जनसेवा की स्थायी व्यवस्था में बदल सकती है।

       बस्तर की कहानी में सुरक्षा बलों के योगदान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, आईईडी जैसे खतरों और लगातार जोखिम के बीच जवानों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई है। राज्य गठन के 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ पुलिस के 141 जवानों को वीरता एवं विशिष्ट सेवा से जुड़े पदक मिलना उनके साहस और कर्तव्यनिष्ठा का उल्लेखनीय प्रमाण बताया गया है। इसी तरह बड़ी संख्या में लोगों का हिंसा छोड़कर पुनर्वास का रास्ता चुनना भी इस बात का संकेत है कि बंदूक की विचारधारा के बजाय सामान्य जीवन और विकास की राह लोगों को अधिक स्वीकार्य लग रही है।

       फिर भी इस परिवर्तन को लेकर आत्मसंतोष की कोई गुंजाइश नहीं है। शांति केवल सुरक्षा बलों की उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज, प्रशासन और नागरिकों के संयुक्त प्रयास का परिणाम होती है। बस्तर में दशकों से जमा अविश्वास को समाप्त करने के लिए संवेदनशील प्रशासन जरूरी है। स्थानीय लोगों की शिकायतों को सुना जाना चाहिए, विकास परियोजनाओं में पारदर्शिता होनी चाहिए और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं होना चाहिए। विकास तभी लोगों का अपना विकास बनेगा, जब वे उसके लाभार्थी ही नहीं, बल्कि उसके सहभागी भी होंगे।

       बस्तर की नई यात्रा में स्मृति और भविष्य दोनों साथ-साथ चलने चाहिए। झीरम की विभीषिका में वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं, जनप्रतिनिधियों, सुरक्षा जवानों और नागरिकों ने अपने प्राण गंवाए। उन बलिदानों को याद रखना केवल श्रद्धांजलि का विषय नहीं, बल्कि यह संकल्प लेने का अवसर भी है कि ऐसी हिंसा दोबारा समाज को अपनी गिरफ्त में न ले। बस्तर के भविष्य को हिंसा की विरासत नहीं, लोकतंत्र की विरासत बनना चाहिए।

      ‘बस्तर तिरंगा यात्रा’ का सबसे बड़ा संदेश यही है कि किसी क्षेत्र को केवल सुरक्षा के जरिए नहीं, बल्कि विश्वास के जरिए जीता जा सकता है। तिरंगा यहां केवल राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, संविधान, लोकतंत्र और समान अवसर का प्रतीक बनकर सामने आया है। 93 ऐसे स्थानों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाने का उल्लेख, जहां पहले राष्ट्रीय पर्व मनाना संभव नहीं था, बदलती परिस्थितियों की तस्वीर प्रस्तुत करता है।

         अब जरूरत इस बात की है कि कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर फहराया गया तिरंगा केवल एक ऐतिहासिक क्षण बनकर न रह जाए। वह बस्तर के प्रत्येक गांव के विकास, प्रत्येक बच्चे की शिक्षा, प्रत्येक युवा के रोजगार, प्रत्येक परिवार की सुरक्षा और प्रत्येक नागरिक के सम्मान का प्रतीक बने। बस्तर को मुख्यधारा में लाने का अर्थ उसकी पहचान मिटाना नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के साथ उसे आधुनिक विकास की धारा से जोड़ना है।

        आज बस्तर के सामने एक नया अवसर है। हिंसा के लंबे दौर के बाद शांति की संभावना मजबूत हुई है। इस संभावना को स्थायी वास्तविकता में बदलने की जिम्मेदारी सरकार, सुरक्षा बलों, स्थानीय समाज, जनप्रतिनिधियों, युवाओं और नागरिक संगठनों, सभी की है। बस्तर को अब किसी दूसरे की कहानी का पात्र नहीं, बल्कि अपनी विकास गाथा का लेखक बनना होगा।

        तिरंगा यात्रा ने रास्ता दिखाया है; मंजिल अभी बाकी है। बंदूक की जगह किताब, भय की जगह विश्वास, बेरोजगारी की जगह अवसर और अलगाव की जगह लोकतांत्रिक भागीदारी—यही वह बस्तर होना चाहिए जिसकी कल्पना आज की इस यात्रा ने जगाई है। यदि विकास बस्तर की लय और वहां के लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप आगे बढ़ता है, तो कर्रेगुट्टा की पहाड़ी पर फहराया गया तिरंगा केवल विजय का प्रतीक नहीं रहेगा, बल्कि एक ऐसे नए युग की शुरुआत का संकेत बनेगा जिसमें बस्तर अपनी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विरासत और मानवीय शक्ति के बल पर देश के विकास में अग्रणी भूमिका निभाएगा।

सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।