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नेपाल में फ्लैश फ्लड की तबाही: मृतकों का आंकड़ा 469 पहुंचा, 1400 से ज्यादा लापता

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काठमांडू, 28 अगस्त। नेपाल में बुधवार को आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। नेपाल पुलिस के ताजा आंकड़ों के अनुसार, आपदा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 469 हो गई है। राहत और बचाव दल लगातार मलबे में दबे लोगों की तलाश कर रहे हैं। हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों के अब भी लापता होने के कारण मृतकों का आंकड़ा और बढ़ने की आशंका बनी हुई है।

     आपदा से प्रभावित इलाकों में नेपाली सेना, पुलिस और अन्य बचाव दल भारी मशीनरी, खोजी कुत्तों और हेलीकॉप्टरों की मदद से राहत एवं बचाव अभियान चला रहे हैं। कई स्थानों पर सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी ढांचा बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के कारण राहत दलों को प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अब तक कम से कम 1,545 लोगों को प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षित निकाला जा चुका है, जबकि 84 लोगों का काठमांडू के अस्पतालों में उपचार चल रहा है।

आठ जिलों में सबसे ज्यादा तबाही

      नेपाल पुलिस के मुताबिक, आठ जिलों से शव बरामद किए गए हैं। इनमें चितवन में सबसे अधिक 178 मौतें दर्ज की गई हैं। इसके अलावा नवलपरासी पूर्व में 110, गोरखा में 44, नुवाकोट में 37, धादिंग में 33, तनाहूं में 28, नवलपरासी पश्चिम में 27 और रसुवा में 12 शव बरामद हुए हैं।

      बाढ़ और मलबे के तेज बहाव ने कई गांवों, सड़कों, पुलों और बिजली परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। हिमालयी क्षेत्र का दुर्गम भूगोल और क्षतिग्रस्त संपर्क मार्ग बचाव अभियान को और चुनौतीपूर्ण बना रहे हैं।

288 भारतीय नागरिक अब भी संपर्क से बाहर

      इस प्राकृतिक आपदा में भारत के भी बड़ी संख्या में नागरिक प्रभावित हुए हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, 288 भारतीय नागरिक अभी संपर्क में नहीं हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा से जुड़े लोग भी शामिल हैं। भारत सरकार ने नेपाल में फंसे भारतीय नागरिकों की स्थिति पर नजर रखने और उनकी सुरक्षित वापसी के लिए विशेष नियंत्रण व्यवस्था सक्रिय की है।

       भारत और नेपाल के अधिकारी लगातार संपर्क में हैं। भारत ने राहत एवं मानवीय सहायता के तहत विमान भी नेपाल भेजे हैं। वहीं, नेपाल में त्रिशूली-1 जलविद्युत परियोजना से जुड़े भारतीय नागरिकों के संबंध में भी लगातार जानकारी जुटाई जा रही है।

       आपदा के बाद 30 से अधिक देशों के नागरिकों के लापता होने की खबरों ने चिंता और बढ़ा दी है। इनमें पर्यटकों, पर्वतारोहियों और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर आए तीर्थयात्रियों के शामिल होने की जानकारी सामने आई है।

तिब्बत में भी भारी नुकसान, तीन की मौत

      नेपाल के साथ लगी सीमा के दूसरी ओर तिब्बत में भी इस आपदा का व्यापक असर हुआ है। चीनी सरकारी मीडिया के अनुसार, तिब्बत में कम से कम तीन लोगों की मौत हुई है, जबकि सैकड़ों लोग लापता बताए गए हैं। प्रभावित क्षेत्र से बड़ी संख्या में स्थानीय निवासियों और पर्यटकों को सुरक्षित निकाला गया है।

      आपदा के बाद चीन और नेपाल दोनों ही संभावित नई बाढ़ को लेकर सतर्क हैं। भूस्खलन के कारण नदी के प्रवाह में अवरोध पैदा होने से कुछ स्थानों पर झीलनुमा जलाशय बन गए हैं। इन जलाशयों में पानी का स्तर बढ़ने से निचले इलाकों में दोबारा बाढ़ आने का खतरा पैदा हो गया है।

नई बाढ़ का खतरा, झील के उफान से बढ़ी चिंता

      एजेंसी के अनुसार, नेपाल-चीन सीमा के पास भूस्खलन से बनी एक झील शुक्रवार को उफनने लगी, जिसके बाद अधिकारियों ने प्रभावित क्षेत्रों में नए सिरे से बाढ़ के खतरे की चेतावनी दी। इसके चलते कुछ समय के लिए बचाव अभियान भी प्रभावित हुआ।

     हिमालयी क्षेत्र में आने वाले दिनों में बारिश की संभावना ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलाशय या प्राकृतिक बांध टूटते हैं तो नीचे की ओर स्थित बस्तियों में अचानक तेज पानी और मलबा पहुंच सकता है। इसलिए प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सतर्क रहने और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी जा रही है।

ग्लेशियर और चट्टानों के ढहने से बनी विनाशकारी लहर

      शुरुआती तौर पर इस आपदा को लेकर भूकंप की आशंका जताई गई थी, लेकिन बाद के वैज्ञानिक विश्लेषणों में ग्लेशियर और उसके नीचे की चट्टानी संरचना के बड़े पैमाने पर ढहने को इस विनाशकारी घटना की संभावित वजह बताया गया है। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (USGS) और उपग्रह तस्वीरों के अध्ययन से संकेत मिले हैं कि हिमनद क्षेत्र में हुए बड़े टूटाव के बाद बर्फ, चट्टान, पानी और मलबे का विशाल प्रवाह नदी घाटियों की ओर तेजी से बढ़ा।

      इस घटना ने त्रिशूली और भोटेकोशी जैसी हिमालयी नदी प्रणालियों को प्रभावित किया। तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाली बस्तियों, पुलों और अन्य ढांचों को बहाता हुआ आगे बढ़ा, जिससे कम समय में बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हुआ।

जलवायु परिवर्तन पर भी उठे सवाल

      वैज्ञानिक इस घटना और हिमालय में बढ़ती ग्लेशियर अस्थिरता के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान, ग्लेशियरों का पिघलना और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थायी रूप से जमी जमीन यानी परफ्रॉस्ट का कमजोर होना पहाड़ी ढलानों को अस्थिर बना सकता है।

     हालांकि, वैज्ञानिकों ने इस विशेष आपदा को सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन का परिणाम घोषित करने में सावधानी बरतने की बात कही है। उनका मानना है कि इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन और लंबे समय के आंकड़ों का विश्लेषण जरूरी है। लेकिन यह भी चिंता का विषय है कि गर्म होते हिमालय में ग्लेशियरों और ऊंचाई वाले इलाकों की अस्थिरता भविष्य में ऐसी घटनाओं का खतरा बढ़ा सकती है।

मलबे में जिंदगी की तलाश जारी

     नेपाल में राहत एवं बचाव अभियान तीसरे दिन भी युद्धस्तर पर जारी है। बचावकर्मी मलबे में जीवित लोगों की तलाश के साथ-साथ मृतकों के शव निकालने और उनकी पहचान करने में जुटे हैं। कई परिवार अब भी अपने परिजनों की जानकारी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।

      बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने और कई क्षेत्रों में संपर्क बहाल नहीं हो पाने के कारण वास्तविक नुकसान का आकलन अभी पूरी तरह नहीं हो सका है। अधिकारियों का कहना है कि जैसे-जैसे दुर्गम क्षेत्रों तक बचाव दल पहुंचेंगे, आपदा की पूरी तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।

      इस बीच, नेपाल और चीन दोनों के सामने तत्काल राहत एवं बचाव के साथ-साथ संभावित दूसरी बाढ़ और भूस्खलन से निपटने की चुनौती भी बनी हुई है। हिमालय में हुई यह त्रासदी एक बार फिर बताती है कि पर्वतीय क्षेत्रों में आपदा पूर्व चेतावनी प्रणाली, ग्लेशियर निगरानी और सीमापार आपदा प्रबंधन को और मजबूत करना कितना जरूरी है।