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हिड़मा को आदर्श मानने वाले‘दिमागी नक्सली’,हिंसा का महिमामंडन भी समाज के लिए खतरा:मुख्यमंत्री साय

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रायपुर, 31 अगस्त। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नक्सलवाद और हिंसा को लेकर कड़ा रुख व्यक्त करते हुए कहा है कि कुख्यात नक्सली हिड़मा जैसे लोगों को आदर्श मानने वाले लोग ‘दिमागी नक्सली’ हैं। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और अपनी बात रखने का अधिकार सभी को है, लेकिन निर्दोष लोगों की हत्या और हिंसा का समर्थन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।

      एक निजी चैनल को दिए साक्षात्कार में मुख्यमंत्री साय ने कहा कि छत्तीसगढ़ लंबे और पीड़ादायक नक्सली दौर से निकलकर अब शांति, विश्वास और विकास की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सुरक्षाबलों के साहस, केंद्र और राज्य सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति तथा बस्तर के लोगों के सहयोग से नक्सलवाद अब समाप्ति की ओर है।

     मुख्यमंत्री ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ लोग आज भी ऐसे नक्सलियों को अपना आदर्श मानते हैं, जिनके खिलाफ निर्दोष नागरिकों और सुरक्षाबलों की हत्या के गंभीर आरोप रहे हैं। उन्होंने कहा कि हिड़मा जैसे नक्सलियों ने हिंसा और आतंक के जरिए बस्तर की कई पीढ़ियों को भय, अभाव और पिछड़ेपन का सामना करने के लिए मजबूर किया। ऐसे लोगों का महिमामंडन करना, उनके समर्थन में नारे लगाना या उन्हें नायक के तौर पर प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

     श्री साय ने कहा कि बंदूक के बल पर निर्दोष लोगों की जान लेने वाला व्यक्ति किसी भी समाज का आदर्श नहीं हो सकता। नक्सली हिंसा के कारण बस्तर में हजारों नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सुरक्षाबलों के जवानों की जान गई है। अनेक परिवारों ने अपनों को खोया और बच्चों से उनके माता-पिता छिन गए। हिंसा के कारण क्षेत्र में विकास की गति भी लंबे समय तक प्रभावित रही। ऐसे में हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों का गुणगान पीड़ित परिवारों और शहीद जवानों के बलिदान का अपमान है।

     मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद की चुनौती केवल जंगल और बंदूक तक सीमित नहीं है। हिंसा को सही ठहराने वाली सोच, लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा करना और हिंसा के जिम्मेदार लोगों को नायक के रूप में स्थापित करना भी गंभीर चुनौती है। उन्होंने कहा कि समाज को ऐसी मानसिकता को स्पष्ट रूप से अस्वीकार करना होगा।

     उन्होंने कहा कि बस्तर की तस्वीर अब तेजी से बदल रही है। जिस क्षेत्र की पहचान कभी नक्सली हिंसा, बारूदी सुरंगों और भय से होती थी, वहां अब स्कूलों की घंटियां सुनाई दे रही हैं, सड़कों का विस्तार हो रहा है और स्वास्थ्य सुविधाएं दूरस्थ इलाकों तक पहुंच रही हैं। युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं तथा दूरदराज के गांवों को शासन की योजनाओं और विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।

     श्री साय ने कहा कि बस्तर का युवा अब बंदूक नहीं, बल्कि किताब, कलम, कौशल और रोजगार चाहता है। वह अपने सपनों को पूरा करना चाहता है और प्रदेश व देश के विकास में भागीदार बनना चाहता है। सरकार का प्रयास है कि बस्तर के प्रत्येक युवा को आगे बढ़ने का अवसर मिले और हर परिवार तक विकास एवं सुशासन का लाभ पहुंचे।

     मुख्यमंत्री ने कहा कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल सुरक्षा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह बस्तर के भविष्य को बचाने की लड़ाई थी। सुरक्षाबलों के जवानों ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना इस चुनौती का सामना किया और क्षेत्र में शांति स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अब समाज की भी जिम्मेदारी है कि हिंसा की विचारधारा का किसी भी रूप में महिमामंडन न होने दिया जाए।

     उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ अब शांति, लोकतंत्र और विकास के रास्ते पर आगे बढ़ चुका है। नए छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद और हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है। बस्तर की नई पीढ़ी के आदर्श ऐसे लोग होने चाहिए, जो शिक्षा, सेवा, परिश्रम, नवाचार और राष्ट्र निर्माण के माध्यम से समाज को आगे बढ़ा रहे हैं, न कि वे लोग जिन्होंने बंदूक और हिंसा का रास्ता अपनाया।

     मुख्यमंत्री साय ने कहा कि बस्तर में शांति की स्थापना केवल सरकार और सुरक्षाबलों की उपलब्धि नहीं, बल्कि वहां के नागरिकों के साहस और विश्वास की भी जीत है। अब इस शांति को स्थायी बनाते हुए बस्तर को विकास, पर्यटन, शिक्षा, रोजगार और समृद्धि की नई पहचान देना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।