रायपुर, 07 सितंबर। झीरम घाटी नरसंहार मामले में एनआईए कोर्ट के फैसले के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जांच की प्रक्रिया और उसके दायरे पर गंभीर सवाल उठाए हैं। बघेल ने एनआईए की जांच को आधा-अधूरा बताते हुए कहा कि झीरम कांड की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए केवल कुछ नक्सलियों को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सरकार से घटना के कथित षड्यंत्र, प्रशासनिक चूक और उस समय की परिस्थितियों की भी गहन जांच कराने की मांग की।
श्री बघेल ने सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी में कहा कि मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जिस ‘पर्ची’ का जिक्र कर रहे थे, उसमें कई सवाल हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि झीरम घाटी नरसंहार के कथित असली मास्टरमाइंड कौन थे और घटना के समय जिम्मेदार रहे प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की जांच कब होगी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि झीरम कांड में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं की हत्या हुई थी। इनमें तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, वरिष्ठ नेता विद्याचरण शुक्ल और महेंद्र कर्मा सहित कई लोग शामिल थे। ऐसे में इस पूरे मामले की जांच केवल हमले में शामिल लोगों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि हमले के पीछे कोई बड़ी साजिश थी या नहीं।
बघेल ने सवाल किया कि एनआईए ने जिन पहलुओं की जांच की, क्या उसमें साजिश के एंगल को भी शामिल किया गया था? उन्होंने यह भी पूछा कि एफआईआर में जिन नक्सली नेताओं के नाम दर्ज थे, उनमें से कुछ नाम बाद में क्यों हटाए गए और जिन लोगों को कथित तौर पर हमले का मास्टरमाइंड बताया जाता रहा, उनकी भूमिका की जांच क्यों नहीं हुई।
उन्होंने कहा कि झीरम हमले में बड़ी संख्या में नक्सलियों के शामिल होने की बात सामने आई थी, लेकिन मामले में सजा केवल 10 लोगों को हुई। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि हमले के पीछे कथित तौर पर मौजूद बड़े नक्सली नेताओं की भूमिका का क्या हुआ।
भूपेश बघेल ने कहा कि जब भी कोई बड़ा नक्सली नेता पकड़ा या मारा जाता था, सरकार की ओर से उसे किसी न किसी बड़े नक्सली हमले का मास्टरमाइंड बताया जाता था। ऐसे में झीरम घाटी हमले का मास्टरमाइंड कौन था, यह सवाल अब भी अनुत्तरित है। उन्होंने देवा और गुड्सा जैसे कथित नक्सली नेताओं का जिक्र करते हुए पूछा कि घटना के समय उनकी भूमिका क्या थी और उनसे पूछताछ क्यों नहीं की गई।
पूर्व मुख्यमंत्री ने झीरम घटना को लेकर तत्कालीन सरकार की ओर से कही गई ‘बड़ी चूक’ संबंधी बातों का भी हवाला दिया। उन्होंने सवाल किया कि यदि प्रशासनिक स्तर पर चूक हुई थी तो उसके लिए किसी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी तय हुई या नहीं। क्या किसी पुलिसकर्मी, अधिकारी या वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को इस मामले में दोषी ठहराया गया?
बघेल ने कहा कि घटनास्थल पर तैनात पुलिस अधिकारियों से लेकर वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों तक की भूमिका की जांच किए बिना झीरम कांड की जांच को पूरी और पारदर्शी नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि उस समय घटनास्थल और नक्सली गतिविधियों की जानकारी रखने वाले सरेंडर नक्सलियों से भी पूछताछ की जानी चाहिए थी।
उन्होंने दावा किया कि रायपुर के मेफेयर में आयोजित मध्य क्षेत्र परिषद की बैठक के दौरान उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष झीरम मामले की जांच का मुद्दा उठाया था। बघेल के मुताबिक, बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस मामले में दूसरी एफआईआर दर्ज कर स्वतंत्र जांच का रास्ता भी खुला था। इसके बावजूद राज्य सरकार ने कथित षड्यंत्र की जांच के लिए कोई प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाया, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।
भूपेश बघेल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार द्वारा गठित एसआईटी की जांच को भाजपा सरकार ने रोक दिया। उन्होंने कहा कि यदि षड्यंत्र की जांच होती तो घटनास्थल पर तैनात थानेदार से लेकर डीएसपी, आईजी, डीजी, मुख्य सचिव और तत्कालीन मुख्यमंत्री तक की भूमिका और जानकारी की जांच की जा सकती थी।
पूर्व मुख्यमंत्री ने रमन सरकार के कार्यकाल में गठित प्रशांत मिश्रा जांच आयोग को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आयोग ने उनसे जांच पूरी करने के लिए समय मांगा था, लेकिन कुछ ही दिनों बाद कथित तौर पर अधूरी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दी गई। इसके बाद उनकी सरकार द्वारा दो सदस्यीय न्यायिक आयोग के पुनर्गठन का भी उन्होंने उल्लेख किया।
बघेल ने मांग की कि यदि सरकार वास्तव में झीरम घाटी नरसंहार की पूरी सच्चाई सामने लाना चाहती है तो तत्कालीन राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व से पूछताछ की जाए। साथ ही, घटना से संबंधित सरेंडर नक्सलियों और अधिकारियों को आमने-सामने बैठाकर पूछताछ की जाए तथा लंबित एसआईटी जांच को आगे बढ़ाया जाए।




