मुंबई, 08 सितम्बर। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2018 में की गई कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से राहत नहीं मिली है।
न्यायमूर्ति एन. आर. बोरकर की एकल पीठ ने राहुल गांधी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने मुंबई की मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा जारी समन और मानहानि की आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के आदेश में ऐसी कोई स्पष्ट अवैधता या गंभीर खामी नहीं है, जिसके आधार पर हाईकोर्ट इस स्तर पर हस्तक्षेप करे।
यह मामला सितंबर 2018 में राजस्थान में आयोजित एक चुनावी सभा के दौरान राहुल गांधी की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई टिप्पणियों से जुड़ा है। राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए ‘चौकीदार चोर है’ और ‘कमांडर-इन-थीफ’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। बाद में उन्होंने अपने भाषण का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया था।
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने 2019 में मुंबई की गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत में राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायतकर्ता का कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रमुख और प्रमुख सार्वजनिक चेहरा हैं तथा उनके खिलाफ की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी का असर पार्टी के सदस्यों और कार्यकर्ताओं की प्रतिष्ठा पर भी पड़ता है। इस शिकायत पर मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को राहुल गांधी के खिलाफ समन जारी करते हुए कार्यवाही आगे बढ़ाने का आदेश दिया था।
राहुल गांधी ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनके वकीलों ने दलील दी कि शिकायतकर्ता स्वयं कथित मानहानि से सीधे तौर पर पीड़ित व्यक्ति नहीं हैं। उनका कहना था कि राहुल गांधी की टिप्पणी किसी राजनीतिक दल या उसके कार्यकर्ताओं को लक्ष्य बनाकर नहीं, बल्कि एक व्यक्ति यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबंध में की गई थी। इसलिए भाजपा कार्यकर्ता द्वारा दायर शिकायत को कानूनी रूप से सुनवाई योग्य नहीं माना जाना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि राहुल गांधी की टिप्पणी का प्रभाव केवल प्रधानमंत्री तक सीमित नहीं था। भाजपा के एक सक्रिय सदस्य के रूप में शिकायतकर्ता ने दावा किया कि पार्टी के प्रमुख नेता के खिलाफ की गई टिप्पणी से पार्टी के सदस्यों की प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है। महाराष्ट्र सरकार की ओर से भी राहुल गांधी की याचिका का विरोध किया गया और कहा गया कि इस स्तर पर शिकायत की मेरिट और साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने राहुल गांधी की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि भाजपा एक पंजीकृत और स्पष्ट रूप से पहचानी जाने वाली राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी है। अदालत ने शशि थरूर से जुड़े पूर्व मामले का भी हवाला दिया, जिसमें राजनीतिक दल को एक पहचान योग्य निकाय के रूप में देखा गया था। न्यायालय के अनुसार प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी की टिप्पणी केवल प्रधानमंत्री तक सीमित थी और उसका असर पार्टी के अन्य सदस्यों या पदाधिकारियों तक नहीं पहुंच सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि टिप्पणी का वास्तविक अर्थ क्या था और उसका प्रभाव प्रधानमंत्री तक सीमित था या भाजपा के सदस्यों तक भी पहुंचता था, इसका फैसला साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट में किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने प्रारंभिक स्तर पर इस मामले की पूरी सुनवाई किए बिना आपराधिक कार्यवाही को खत्म करने से इनकार कर दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राहुल गांधी को सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का अवसर दिया है। अदालत ने 2021 से चली आ रही अंतरिम व्यवस्था को छह सप्ताह के लिए और बढ़ा दिया है। इस दौरान मजिस्ट्रेट अदालत में मानहानि मामले की सुनवाई स्थगित रहेगी और राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने से मिली छूट भी प्रभावी रहेगी। राहुल गांधी अब हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
इस फैसले के बाद फिलहाल 2019 में जारी मजिस्ट्रेट अदालत का समन बरकरार है और मानहानि की आपराधिक कार्यवाही भी समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट में राहुल गांधी की अगली कानूनी चुनौती इस मामले की आगे की दिशा तय करेगी।




