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कस्बाई छात्र आंदोलनों के सकारात्मक पहलू -रघु ठाकुर

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जून के अंत और जुलाई के आरम्भ में दिल्ली में हुए छात्रों और अन्य वामपंथी संगठनों आईसा, एसएफआई, एआईएसएफ, भीम आर्मी, आम आदमी पार्टी, सपा और अन्य दलों के छात्रों एवं पार्टी कार्यकर्ताओं का मिला जुला आंदोलन देश देख चुका है। इसे जेन जी का आंदोलन कह के प्रचारित किया गया। इस आंदोलन के विभिन्न पक्षों के बारे में और कुछ स्याह पक्षों के बारे में भी मैं पहले लिख चुका हूँ। इस आंदोलन के सफलता-असफलता आदि के बारे में देश के सोशल मीडिया, प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काफी चर्चा हुई है और हो भी रही है क्योकि इसके पीछे व प्रचार में वैश्विक ताकतों का भी कुछ सहयोग था। परंतु इस दिल्ली के धरने से कुछ अच्छे प्रभाव भी देश में हुए हैं और अब लोगों में यह उत्साह की भावना आई है कि अगर बड़ी संख्या में लोग इकठ्ठे होते हैं तो सरकार को उनकी बात मानना होगी।दिल्ली के आंदोलन की समाप्ति के तत्काल बाद मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मूंग की खरीदी को लेकर किसानों ने आंदोलन किया पुलिस के लगाए गए 21 बैरिकेड तोड़कर किसान भोपाल में प्रवेश कर गए और मुख्यमंत्री को उनसे बात कर उनकी बात माननी पड़ी। इस बीच में देश के अनेक स्थानों पर छात्रों और विशेषतः स्कूली छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर ऐसे शांतिपूर्ण और अहिंसक धरना प्रदर्शन किए हैं जिनके सामने सरकार को झुकना पड़ा।

     जंतर मंतर के घटनाक्रम के दो महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष है एक-लोगों में अपने घरों से बाहर निकलने का अपनी मांगों को उठाने का साहस पैदा हुआ है और दूसरा-सरकारें भी अब इन घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता और उदारता दिखाकर उनकी मांगों को पूरा कर रही हैं। इसके कुछ उदाहरण निम्नानुसार हैं-

1. मध्य प्रदेश के विदिशा जिले के सिरोंज में बस ऑपरेटर्स द्वारा किराया 10 रुपए से बढ़ाकर 25 रुपये कर दिया गया था। इसके विरोध में स्कूल की छात्राओं ने प्रदर्शन किया। बसों के आगे खड़ी हो गईं और अंत में बस ऑपरेटर्स ने पुराने 10 रुपए की पुरानी दर को ही लागू किया।

2. राजस्थान के अलवर में स्कूल के जर्जर भवन को बदलने व्याख्याताओं की नियुक्ति आदि मांगों को लेकर विद्यार्थियों ने ग्रामीण जनों के साथ स्कूल पर तालाबंदी की और प्रदर्शन धरना किया तब लाचार होकर शिक्षा विभाग के अधकारियों ने मांगें पूरी करने का वचन दिया और तब तालाबंदी समाप्त हुई।

3. उत्तर प्रदेश के लखनऊ के जयनारायण स्कूल के सैकड़ों छात्र छात्राएं पर्याप्त स्कूल शिक्षक नियुक्त करने की मांग को लेकर सड़क पर बैठ गए और लंबे जाम के बाद अंततः स्कूल प्रबंधन को उनकी बात माननी पड़ी।

4. यूपी के कन्नौज में ही जवाहर नवोदय विद्यालय में बच्चों ने मूलभूत सुविधाओं शिक्षकों के दुर्व्यवहार और घटिया खाने के खिलाफ अपने आप को कमरों में बंद कर लिया तथा बाद में डीएम श्री आशुतोष मोहन अग्निहोत्री ने जाकर समस्याओं का हल निकाला।

5. चंडीगढ़ में भी मूक बधिर विद्यालय के छात्रों ने मूल भूत सुविधाओं और बेहतर शिक्षा की माँग को लेकर सड़कों पर प्रदर्शन किया तब सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान दिया।

6. 14 अगस्त 2026 को मध्य प्रदेश के उज्जैन में सराफा स्कूल को दाऊदखेड़ी के संदीपनी विद्यालय में विलय करने के विरोध में बड़ी संख्या में छात्राएँ कलेक्टर कार्यालय पहुंची। वे जमीन पर बैठ गईं और उन्होंने नारे बाजी की।उज्जैन मुख्यमंत्री का गृह जिला है तथा यह नीति मध्य प्रदेश सरकार ने ही बनाई थी कि 12 किमी भीतर के स्कूलों को संदीपनी विद्यालयों में विलय कर दिया जाए। आज कल सरकारें केवल प्रचार के लिए काम करती हैं और दिखावा करती हैं। कुछ ऐसे धार्मिक नामों का इस्तेमाल करती हैं कि जिससे वे धार्मिक सिद्ध हो जायें।

     मध्य प्रदेश में संदीपनी विद्यालय सरकार ने इस आधार पर शुरू किए हैं कि संदीपनी आश्रम में भगवान श्री कृष्ण रहे थे और उनका शिक्षण हुआ था। अब इसके माध्यम से मध्य प्रदेश सरकार यह प्रदर्शित करना चाहती थी कि ये कृष्ण भक्त सरकार है और यादव समाज भगवान कृष्ण को यादव मानता है क्योकि जब उन्हें कंस के द्वारा उनकी हत्या के भय से उनके पिता भीषण बारिश में रात्रि में सिर पर टोकरी रख कर यमुना पार कर नंद के यहाँ लाए थे जहाँ उनका पालन पोषण हुआ था, वे नंद यदुवंशी थे। इसलिए उन्हें कृष्ण का पिता जैसा ही माना जाता है और इसलिए यादव भाई कृष्ण को यदुवंशी मानते हैं। हालाकि कृष्ण राजा के वंशज और क्षत्रिय थे। सरकार ने जो संदीपनी विद्यालय बनाये उनमे आस पास के 12 किमी के स्कूलों के विलय करने का निर्णय किस तर्क से किया यह समझ से परे है। क्योकि यथासंभव स्कूल तो छात्रों के लिए उनके घर के समीप होने चाहिए और सरकार को उन ग्रामीण स्कूलों की व्यवस्था ठीक करनी चाहिए परंतु सरकार ने ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की कमी, छात्राओं के आवागमन के लिए सड़कों की कमी आदि को पूरा करने से बचने के लिए यह संदीपनी विद्यालय के नाम का जुमला फेंका था। उज्जैन की जिन छात्राओं ने 14 अगस्त को स्वाधीनता दिवस की पूर्व बेला में अपने स्कूल चार धाम हरि सिद्धि रोड पर स्थित कन्या उच्च माध्यमिक विद्यालय सराफा से कलेक्ट्रेट तक की पैदल यात्रा की और उन्होंने एडीएम जो उन्हें रोकने के लिए आए थे, से कहा कि अगर हमारा स्कूल यथावत नहीं रहेगा तो हमारी पढ़ाई समाप्त हो जाएगी और हम पढ़ नहीं सकेंगे। अभी भी सराफा उच्च माध्यमिक विद्यालय में 10 किमी के क्षेत्र की बच्चियाँ पढ़ने के लिए आती हैं और जहाँ नया संदीपनी स्कूल दाऊदखेड़ी में बनाया जा रहा है वह सराफा स्कूल से 12 किमी दूर है। बच्चियों को बहलाने को अधिकारियों ने निरर्थक दिखावे का प्रयास किया परंतु बच्चियों ने उनकी बात नहीं मानी तथा 3 घंटे के धरने के बाद संयुक्त कलेक्टर श्री संदीप सिंह के निर्देश पर जब जिला शिक्षा अधिकारी ने लिखकर दिया तब छात्राओं ने अपना धरना समाप्त किया। इस दौरान 3 छात्राएं बेहोश भी हुईं परंतु किसी भी छात्रा ने न अधिकारियों के लिए, न शासन के लिए किसी गाली का इस्तेमाल किया न कोई तोड़ फोड़ की न पुलिस से कोई झगड़ा किया। बस केवल शांति पूर्ण नारे लगाए बातचीत की, तर्क किये और अधिकारियों के द्वारा लिखित दिए जाने तक अपने धरने को शांतिपूर्ण ढंग से चलाया।इन छात्राओं के साथ अनेकों छात्राओं के अभिभावक भी चिंता में उनके साथ-साथ पहुंचे थे।

     दिल्ली के जंतर मंतर के धरने के बाद जो 6 घटनाएं लखनऊ, अलवर, चंडीगढ़, कन्नौज, विदिशा और उज्जैन की मैंने ऊपर बताई हैं, इन सारी घटनाओं में गाली का कोई शब्द इस्तेमाल नहीं किया गया, कोई हिंसा नहीं हुई, पुलिस या अधिकारियों से इधर या उधर से कोई मारपीट नहीं हुई। बस केवल शांति पूर्ण और अहिंसक ढंग से याने गांधीवादी तरीके से आंदोलन किया गया और जिसमें लगभग हर आंदोलन में सफलता मिली है।

     यह भी एक तथ्य है कि इन आंदोलनों के आधार या कारण तार्किक थे। दरअसल, दिल्ली में धरना देने वाले छात्रों, वामपंथी संगठनों या अन्य राजनैतिक दलों या भीम सेना, सपा, आप, कांग्रेस और अन्य दलों के छात्र नेताओं को और राजनैतिक दल के आंदोलन करने वालों को इन छात्रों या बच्चिओं से आंदोलन करना सीखना चाहिए। इनमें अधिकांश छात्रायें थीं और उन्होंने महात्मा गांधी, डॉ लोहिया और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के नैतिक आदर्श का पालन किया। 1974 के जमाने में हम लोग नारा लगाते थे मारेंगे नहीं मानेंगे नहीं,हमला चाहे जैसा हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा, ये वे मार्गदर्शक नैतिक और आन्दोलन के मूल्य थे जिन्होंने आंदोलनों के प्रति आम आदमी और लगभग समूचे देश को शारीरिक या मानसिक रूप से सहभागी बनाया था। पर जंतर मंतर पर जो धरना हुआ, उस धरने में शामिल कुछ लड़के और कुछ लड़कियों तक ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया है, उसके सचित्र शब्द देशभर में सोशल मीडिया में घूम रहे हैं और देखे गए हैं। लाखों करोड़ों लोगों तक वे गंदी भाषा और गंदी मानसिकता के चित्र पहुंचे हैं जिससे देश के एक बड़े हिस्से में न केवल उसकी आलोचना हुई है बल्कि सरकार और व्यवस्था को आंदोलन के खिलाफ अपने आप को सही सिद्ध करने के लिए एक तर्क भी मिला है। उस आंदोलन में 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक घटनाएँ भी हुईं और लाठियाँ भी चलीं, पैलेट गन चली, आँसू गैस चली, पथराव भी हुए आदि आदि और अब बुनियादी बातों को पीछे छोड़कर मुकदमों की वापसी की माँग या पुलिस कार्यवाही की माँग, अधिकारियों के निलंबन करने की माँग आदि माँग करने वालों के दो पक्ष विपक्ष बन गए जिसने आंदोलन की मूलभावना और आत्मा को पीछे धकेल दिया है।

     जंतर मंतर के धरने में एक प्रकार की व्यक्तिगत और सांगठनिक नेतृत्व स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा और होड़ चल रही थी। कुछ लोग अमरीका से आये श्री अभिजीत दीपके उनके टीम के सौरव दास और आशुतोष रांका को नेता बता रहे थे कुछ लोग आईसा की नेहा बोरा को ही सबसे महान छात्र नेता सिद्ध करने में लगे थे।कुछ लोग राहुल गांधी, अखिलेश यादव, डिंपल यादव की पुलिस कार्यवाही के बाद की गई मदद के लिए उन्हें छात्रों का मसीहा सिद्ध कर रहे हैं। कुछ लोग आम आदमी पार्टी के नेताओं को अपना मसीहा बता रहे हैं, कुछ लोग भीम सेना के नाम से बाबा साहब के नारे लगा कर अपनी सफलता सिद्ध कर रहे हैं। कुल मिलाकर वह जंतर मंतर का आंदोलन बिखराव व भिन्न-भिन्न सुरों का, चूँ चूँ का मुरब्बा, विभिन्न नेताओं की महत्वकांक्षाओं या उनके संस्थागत लक्ष्यों, हिंसा और हिंसक भाषा के द्वंद में फँसे हुए हैं।

     जंतर मंतर के आंदोलन के बाद पंजाब में नकलचोरी के खिलाफ छात्रों का आंदोलन हुआ और उस पर भी पंजाब पुलिस ने काफी लाठियां बरसाईं। उसके बीच झारखंड में पेपर लीक को लेकर छात्रों का आंदोलन हुआ और उसमें भी अंत में हिंसा हुई। एक तरफ से पथराव और दूसरे तरफ से भीषण लाठी चार्ज हुए आंसू गैस के गोले फटे अब इन तीन दिल्ली, पंजाब और राँची के आंदोलनों और कन्नौज, लखनऊ, अलवर, चंडीगढ़, उज्जैन और सिरोंज के आंदोलन का विश्लेषण किया जाये तो यह सिद्ध होगा कि और इसे तय करने में न द्वंद होगा, न कोई शक होगा कि ये जिला मुख्यालाओं व कस्बों के आंदोलन ज्यादा सार्थक गांधीवादी, अहिंसक यहाँ तक कि शाब्दिक हिंसा से भी दूर और केवल लक्ष्य केंद्रित रहे हैं। यही इनकी सफलता का भी कारण है।

     एक और महत्वपूर्ण सवाल पर विचार करना होगा कि दिल्ली के जंतर मंतर के आंदोलन जिसमे दिल्ली के उच्च शिक्षित विद्यार्थी जो देश और विदेश के पढ़े हैं जिनकी शिक्षा और जीवन शैली कोरियन और पश्चात संस्कृति से प्रभावित है। जो आमतौर पर अंग्रेजी भाषी हैं और इंस्टाग्राम मीम और रील्स जैसी तकनीकों के विशेषज्ञ ज्ञाता हैं, उसी में जीते हैं, जिनके विदेशों से भी बड़ी मात्रा में फंडिंग प्राप्त होती है और इनके अन्य प्रकार के संपर्क हैं। उनकी भाषा में इतनी गंदगी और हिंसा क्यो थी? दरअसल, हमारे देश में जो बड़ी बड़ी उच्च शिक्षण संस्थाएं बन रही हैं और बड़े बड़े विश्वविद्यालयों के छात्र हैं जेएनयू, डीयू आदि आदि इनका जीवन और उसकी शैली अब भारतीय संस्कारों से यहाँ तक कि अपनी पारिवारिक संस्कारों से भी पूर्णतरू कट चुकी हैं।

     जंतर मंतर के धरने में तो समलैंगिक लेस्बियन समूह भी शामिल थे और जो अपनी शारीरिक आजादी की एक नए प्रकार की विकृत व्याख्या दे रहे थे। यह हमारे देश की शीर्ष उच्च शिक्षा की असलियत है और दूसरी तरफ वे क़स्बाई और ग्रामीण स्कूल हैं जहाँ की बच्चियों के ये संस्कार हैं कि वे न रोती हैं, न हमला करती हैं न अपशब्द बोलती हैं न विकृत प्रदर्शन करती हैं और शांतिपूर्ण गांधीवादी तरीके से अपना पक्ष प्रस्तुत करती हैं और सफलता हासिल करती हैं। इनके सामने पुलिस प्रशासन और शासन भी नतमस्तक होने को लाचार हो जाता है। इन आंदोलनों के प्रति आम जनता में दलों से ऊपर उठकर उनकी इज्जत, उनके प्रति प्रेम और उनकी लोकप्रियता बढ़ी है इसमें कोई व्यक्ति नेतृत्व नहीं है कोई जाति धर्म नहीं है, बस केवल तार्किक माँग याने लक्ष्य और उसे हल करने का आग्रह है।

    मैं समझता हूँ के देश के ना केवल अंग्रेजी शिक्षा संस्थानों को व वहाँ के छात्रों को बल्कि शासन और प्रशासन को भी इन कस्बाई आंदोलनों से सीखना चाहिए। हमारे देश का पश्चिम प्रभावित मीडिया इन्हें जेन अल्फा या जेन जी का आंदोलन कह रहा है जबकि जिन आयु वर्ग के छात्रों की परिभाषा जेनजी व अल्फा के रूप में की जाती है, वे आयु में भले ही 17 से 25 वर्ष के जेन जी हो या उनसे कम आयु के जेन अल्फा हो, वे भारतीय सभ्यता, गांधी के विचार और शैली लोहिया और जयप्रकाश के आंदोलनों के प्रतिरूप हैं और ये अल्फा या जेन जी नहीं बल्कि भारतीय छात्र हैं। इनसे भारत के उच्च शिक्षा के क्षेत्र के छात्रों, उच्च शिक्षा संस्थान के छात्रों, सरकारों, राजनैतिक दलों और जहाँ तक की जेन जी और जेन अल्फा के जनक अमेरिका और पश्चिम को भी सीखना चाहिए।

सम्प्रति- लेखक श्री रघु ठाकुर जाने माने समाजवादी चिन्तक और स्वं राम मनोहर लोहिया के अनुयायी हैं।श्री ठाकुर लोकतांत्रिक समाजवादी पार्टी के भी संस्थापक अध्यक्ष हैं।