
रायपुर, 01 जनवरी। छत्तीसगढ़ का इंद्रावती टाइगर रिजर्व अब केवल बाघों और जंगली भैंसों के लिए ही नहीं, बल्कि विलुप्तप्राय गिद्धों के संरक्षण के लिए भी देशभर में एक मिसाल बन रहा है। मध्य भारत के सबसे स्वच्छ नदी-वन पारिस्थितिकी तंत्रों में शामिल यह क्षेत्र गिद्ध संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभर रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व और वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप के निर्देशानुसार इंद्रावती टाइगर रिजर्व में गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (Vulture Safe Zones) विकसित किए जा रहे हैं। गिद्धों को पर्यावरण का ‘सफाईकर्मी’ माना जाता है और इनके घटने से बीमारियों का खतरा बढ़ता है। वर्तमान में NSAID जैसी जहरीली दवाएं, असुरक्षित शव निपटान और मानवीय हस्तक्षेप गिद्धों के लिए सबसे बड़े खतरे बने हुए हैं।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए रिजर्व में सैटेलाइट टेलीमेट्री आधारित निगरानी कार्यक्रम चलाया जा रहा है, जो छत्तीसगढ़ में अपनी तरह का पहला प्रयास है। अब तक के आंकड़ों से पता चला है कि गिद्ध लगभग 10 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सक्रिय रहते हैं और जंगलों से लेकर मानव बस्तियों तक आवाजाही करते हैं।
वर्ष 2022 से 2025 के बीच गिद्ध संरक्षण के क्षेत्र में कई अहम उपलब्धियां हासिल की गई हैं। पहली बार दो गिद्धों की सैटेलाइट ट्रैकिंग से 18 हजार से अधिक उच्च गुणवत्ता वाले GPS डेटा पॉइंट्स प्राप्त हुए हैं। इस कार्य में क्षेत्रीय जीवविज्ञानी श्री सूरज कुमार के नेतृत्व में “गिद्ध मित्र दल” की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जो घोंसलों की निगरानी, सुरक्षित शव प्रबंधन और स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ने का कार्य कर रहा है। इसके परिणामस्वरूप “गुड्डा सारी गुट्टा” जैसे दुर्गम क्षेत्रों में निर्बाध प्रजनन संभव हो सका है।
संरक्षण प्रयासों के तहत उप-निदेशक संदीप बलागा के पर्यवेक्षण में “वुल्चर रेस्टोरेंट” भी स्थापित किए गए हैं, जहां पशु चिकित्सा जांच के बाद केवल NSAID-मुक्त शव ही गिद्धों के लिए रखे जाते हैं। ये केंद्र सुरक्षित भोजन के साथ-साथ जागरूकता और शिक्षा का माध्यम भी बन रहे हैं।
भविष्य की योजना के तहत कार्यक्रम के तीसरे चरण में तीन और गिद्धों की सैटेलाइट टैगिंग, 50 से अधिक जागरूकता कार्यक्रम, पंचायतों की भागीदारी से 100 किलोमीटर क्षेत्र में गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र की स्थापना और छत्तीसगढ़ की पहली गिद्ध पुनर्वास कार्ययोजना के प्रकाशन का लक्ष्य रखा गया है।
तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता के समन्वय से इंद्रावती टाइगर रिजर्व यह संदेश दे रहा है कि दूरदर्शी नेतृत्व में जंगल और समाज एक साथ आगे बढ़ सकते हैं।
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