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रायपुर साहित्य उत्सव 2026 : विचार, परंपरा और भविष्य का जीवंत संगम

रायपुर, 24 जनवरी।“आदि से अनादि तक” थीम पर आधारित रायपुर साहित्य उत्सव के दूसरे दिन विचार, परंपरा, तकनीक और लोक चेतना से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित हुए, जिन्होंने श्रोताओं को गहन आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया।

 उत्सव के प्रमुख आकर्षण के रूप में ‘भारत का बौद्धिक विमर्श’ विषय पर आयोजित विशेष सत्र ने व्यापक ध्यान खींचा। इस सत्र के मुख्य वक्ता प्रख्यात विचारक एवं लेखक राम माधव रहे। उन्होंने कहा कि किसी भी जीवंत राष्ट्र के लिए उसका बौद्धिक विमर्श उसकी प्राणवायु होता है। भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक विज्ञान और वैश्विक राजनीति से जोड़ते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत का चिंतन मौलिक होने के साथ-साथ तार्किक कसौटी पर भी पूर्णतः खरा उतरता है।

   उन्होंने इस धारणा का सशक्त खंडन किया कि बौद्धिकता केवल पश्चिमी दृष्टिकोण तक सीमित है और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना के साथ भारतीय चिंतन की वैश्विक प्रासंगिकता को रेखांकित किया। सत्र के अंत में यह संदेश उभरकर सामने आया कि असहमति तभी सार्थक है जब वह तर्क और मर्यादा के दायरे में हो।

   नवा रायपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव 2026 के अंतर्गत कवि-कथाकार अनिरुद्ध नीरव मंडप में “साहित्य : उपनिषद से एआई तक” विषय पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा आयोजित की गई। इसमें ट्रिपल आईटी नवा रायपुर के डायरेक्टर डॉ. ओमप्रकाश व्यास, वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रफुल्ल केतकर तथा वरिष्ठ लेखक डॉ. गोपाल कमल वक्ता के रूप में शामिल हुए। सत्र का संचालन साहित्यकार श्री संजीव तिवारी ने किया और यह सत्र कवि जगन्नाथ प्रसाद भानु को समर्पित रहा। इस अवसर पर डॉ. गोपाल कमल द्वारा लिखित पुस्तक ‘गुणाढ्य की गुणसूत्र कथा’ का विमोचन भी किया गया।

   डॉ. ओमप्रकाश व्यास ने एआई के विकासक्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज जिस रूप में हम एआई को देख रहे हैं, उसके पीछे दशकों की साधना है। उन्होंने भाषा के मानकीकरण में एआई की भूमिका को भविष्य की एक बड़ी चुनौती बताया।श्री प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि हमारे ऋषि सूचना नहीं, बल्कि ज्ञान की बात करते थे और मानव ज्ञान का उद्देश्य प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि उसके नियमों को समझना था।डॉ. गोपाल कमल ने ऋग्वेद से लेकर संस्कृत व्याकरण और गुणसूत्रों तक की परंपरा को एआई की डीप लर्निंग से जोड़ते हुए भारतीय ज्ञान प्रणाली की वैज्ञानिकता को रेखांकित किया।सूत्रधार श्री संजीव तिवारी ने कहा कि उपनिषद और एआई दोनों ही प्रश्नोत्तर परंपरा के माध्यम हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा एआई की मूल प्रेरणा रही है।

उत्सव के पंचम सत्र में लाला जगदलपुरी मंडप, पुरखौती मुक्तांगन में “डॉ. अम्बेडकर विचारपुंज की आभा” विषय पर परिचर्चा आयोजित हुई। मुख्य वक्ता डॉ. राजकुमार फलवारिया ने कहा कि डॉ. भीमराव अम्बेडकर को केवल दलितों के नेता के रूप में देखना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करना है। उन्होंने बाबासाहेब को एक महान अर्थशास्त्री, संविधान निर्माता, समाज सुधारक और सम्पूर्ण समाज के मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने महिलाओं के अधिकारों, श्रमिक हितों, आर्थिक नीतियों और लोकतंत्र को मजबूत करने में डॉ. अम्बेडकर के योगदान को विस्तार से रेखांकित किया।

दूसरे दिन के प्रथम सत्र में छत्तीसगढ़ के लोकगीतों पर एक जीवंत परिचर्चा आयोजित हुई, जिसमें डॉ. पीसी लाल यादव, श्रीमती शकुंतला तरार, श्री बिहारीलाल साहू और डॉ. विनय कुमार पाठक ने अपने विचार रखे।
डॉ. पीसी लाल यादव ने लोकगीतों को मानवता का मार्गदर्शक बताया, वहीं श्रीमती शकुंतला तरार ने बस्तर के लोकगीतों, घोटुल परंपरा, ककसार गीत और बस्तर दशहरा की सांस्कृतिक विरासत को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।सत्र के अंत में डॉ. पीसी लाल यादव के छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल संग्रह ‘हमर का बने का गिनहा’, कविता संग्रह ‘दिन म घलो अंधियार हावय’ तथा श्रीमती वर्णिका शर्मा द्वारा निर्मित वीडियो ‘महतारी की आरती’ का विमोचन किया गया।

    रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का दूसरा दिन कुल मिलाकर लोक संस्कृति, भारतीय दर्शन, आधुनिक तकनीक और सामाजिक चेतना के अद्भुत संगम के रूप में सामने आया। इस आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि छत्तीसगढ़ की माटी में लोक परंपराओं के साथ-साथ उच्चस्तरीय वैचारिक विमर्श की भी एक सशक्त और उर्वर परंपरा मौजूद है।