खामोश हुई बंदूकें: बस्तर में उम्मीदों का पुनर्जन्म -अशोक कुमार साहू

लगभग साढ़े चार दशक तक नक्सलवाद की हिंसा झेलते रहे छत्तीसगढ़ में बीते दिनों जो घटनाक्रम सामने आए हैं, उन्होंने विशेषकर बस्तर क्षेत्र में एक नई उम्मीद जगाई है। बड़े नक्सली कमांडर पापाराव के आत्मसमर्पण और राज्य के उप मुख्यमंत्री एवं गृह मंत्री विजय शर्मा द्वारा 31 मार्च से पहले ही नक्सलवाद के समाप्त होने के दावे ने लोगों को राहत के साथ-साथ एक बेहतर भविष्य का भरोसा भी दिया है। यह केवल सुरक्षा परिदृश्य में बदलाव का संकेत नहीं, बल्कि विकास और स्थिरता की दिशा में एक संभावित मोड़ भी है।
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध बस्तर, जिसका भू-भाग केरल से भी बड़ा और घने वनों से आच्छादित है, विडंबना यह रही कि विकास की मुख्यधारा से दशकों तक दूर रहा। जहां एक ओर इस क्षेत्र की धरती में अपार खनिज संपदा छिपी है, वहीं दूसरी ओर नक्सलवाद की लंबी हिंसक पृष्ठभूमि ने इसे रक्तरंजित भी किया है। बीते वर्षों में नक्सलियों द्वारा हजारों निर्दोष ग्रामीणों की हत्या,उन्हें पुलिस मुखबिर बताकर और सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ों में बड़ी संख्या में नक्सलियों तथा जवानों के मारे जाने की घटनाओं ने इस क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने को गहराई से प्रभावित किया है। आदिवासी समुदाय इस संघर्ष में सबसे अधिक पीड़ित रहा,कभी नक्सलियों के संदेह का शिकार बनकर, तो कभी सुरक्षा बलों की सख्ती के बीच।
हालांकि कुछ वर्ष पहले तक नक्सलवाद के समाप्त होने की संभावना बेहद क्षीण प्रतीत होती थी, लेकिन हाल के वर्षों में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। राज्य और केंद्र सरकार के समन्वित प्रयास, सुरक्षा बलों की सटीक रणनीति और लगातार बढ़ते दबाव ने नक्सली संगठनों को कमजोर किया है। परिणामस्वरूप आत्मसमर्पण की एक लंबी श्रृंखला देखने को मिली है। पुलिस आंकड़ों के अनुसार, पिछले 26 महीनों में लगभग 2750 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। केवल 11 मार्च को हुए एक बड़े घटनाक्रम में 108 माओवादियों ने हथियार डालकर समाज की मुख्यधारा में वापसी की, जिनमें 44 महिलाएं भी शामिल थीं।
इन आत्मसमर्पणों में कई बड़े नाम शामिल हैं। 25 लाख रुपये के इनामी डीकेएसजेडसी सदस्य पापाराव, दंडकारण्य जोनल कमेटी के पश्चिम बस्तर डिवीजन के डीवीसीएम राहुल तेलाम, पंडरू कोवासी, झितरू ओयाम, पूर्व बस्तर डिवीजन के डीवाईसीएम रामधर उर्फ बीरू, उत्तर बस्तर डिवीजन के डीवाईसीएम मल्लेश, अनिल ताती, प्रकाश माड़वी, विकास मड़काम, संजय मड़काम, चंद्र मरकाम, रजनी रेंगो, संजय कोड़में, लिंगा कवासी तथा पीजीएलए बटालियन नंबर एक के सीवाईपीसी कमांडर मुचाकी जैसे कई प्रमुख कैडरों का आत्मसमर्पण संगठनात्मक ढांचे के कमजोर पड़ने का संकेत है। इसके अतिरिक्त आंध्र-ओडिशा बॉर्डर (एओबी) क्षेत्र के डीवीसीएम कोसा मंडावी का आत्मसमर्पण भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
सुरक्षा बलों की कार्रवाई में बड़ी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और संसाधनों की बरामदगी ने नक्सली नेटवर्क की आर्थिक और सैन्य क्षमताओं को कमजोर किया है। एक ही स्थान से तीन करोड़ 61 लाख रुपये नकद और एक करोड़ 64 लाख रुपये मूल्य का एक किलो सोना बरामद होना इस बात का प्रमाण है कि नक्सली संगठन कितनी बड़ी आर्थिक संरचना के साथ काम कर रहे थे।
इन उपलब्धियों के पीछे केवल सुरक्षा बलों का दबाव ही नहीं, बल्कि राज्य सरकार की आकर्षक आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति भी एक महत्वपूर्ण कारक रही है। साथ ही, कई स्थानीय पत्रकारों और मध्यस्थों ने भी नक्सलियों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाई है।
फिर भी, इस सकारात्मक परिदृश्य के बीच कुछ स्वाभाविक संशय भी बने हुए हैं। दशकों तक हिंसा और अस्थिरता में जी चुके लोगों के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वास्तव में अब बंदूकें खामोश हो जाएंगी? क्या गांवों में नक्सली कैडर और समर्थकों का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा? बस्तर के वरिष्ठ पत्रकार करीमुद्दीन जैसे जानकार मानते हैं कि स्थिति में सुधार के स्पष्ट संकेत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर पूरी तरह शांति स्थापित होने में समय लगेगा। उनके अनुसार, गांवों में अभी भी नक्सली समर्थक मौजूद हैं, जिनके पुनर्वास और पुनर्समावेशन की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।
नक्सलवाद की जड़ों को समझे बिना उसके स्थायी समाधान की कल्पना नहीं की जा सकती। छत्तीसगढ़ में इसकी शुरुआत 1970 और 1980 के दशक में अविभाजित मध्यप्रदेश के समय हुई, जब आंध्र प्रदेश और अन्य क्षेत्रों से आए वामपंथी उग्रवादी समूहों ने दंडकारण्य के घने जंगलों में अपनी पैठ बनाई। आदिवासियों की गरीबी, सरकारी योजनाओं का अभाव, वन अधिकारों की अनदेखी और प्रशासनिक दूरी ने इस आंदोलन को पनपने का अवसर दिया। 25 मई 1983 को बीजापुर के बेलकनगुड़ा गांव में तेंदूपत्ता गोदाम में आगजनी को राज्य में नक्सलवाद की पहली बड़ी हिंसक घटना माना जाता है।
2004 में पीपुल्स वॉर ग्रुप (PWG) और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) के विलय से बने सीपीआई (माओवादी) ने इस क्षेत्र में अपनी पकड़ और मजबूत कर ली। शुरुआती दौर में नक्सलियों ने आदिवासियों को तेंदूपत्ता के बेहतर दाम दिलाने और वन विभाग के कथित शोषण से राहत दिलाने जैसे कदम उठाए, जिससे उन्हें स्थानीय समर्थन मिला। उन्होंने आदिवासी समुदाय के भीतर सामाजिक हस्तक्षेप कर विश्वास अर्जित किया, जो बाद में उनके विस्तार का आधार बना।
राजनीतिक स्तर पर भी नक्सलवाद के प्रति दृष्टिकोण समय के साथ बदलता रहा। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद पहली सरकार के मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने इसे केवल कानून-व्यवस्था की समस्या न मानकर सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से देखने की कोशिश की। हालांकि उनके इस रुख की आलोचना भी हुई। इसके बाद 2003 में भाजपा सरकार के गठन के साथ नक्सलवाद के खिलाफ सख्त नीति अपनाई गई।
2005 में शुरू हुआ सलवा जुडूम आंदोलन नक्सलवाद के खिलाफ एक बड़ा जनआंदोलन था, जिसमें स्थानीय युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) के रूप में शामिल किया गया। हालांकि यह आंदोलन विवादों में रहा और 2011 में उच्चतम न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसी तरह 2009 के आसपास शुरू हुआ ऑपरेशन ग्रीन हंट, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाया गया एक व्यापक सैन्य अभियान था, जिसने नक्सलियों को चुनौती दी, लेकिन इसके साथ जुड़े मानवाधिकार मुद्दों ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं।
इस लंबे संघर्ष के दौरान कई दर्दनाक घटनाएं सामने आईं—2010 में दंतेवाड़ा में 76 सीआरपीएफ जवानों की शहादत, 2013 में झीरम घाटी में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले पूर्व केन्द्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल समेत कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के नेताओं समेत लगभग ढ़ाई दर्जन लोगो को घेर कर मारने, 2017 और 2021 में बड़े हमले, तथा 2025 में बीजापुर में आईईडी विस्फोट जैसी घटनाओं ने देश को झकझोर दिया। इन घटनाओं ने यह भी दिखाया कि नक्सलवाद केवल क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौती है।
हाल के वर्षों में सुरक्षा रणनीति में आए बदलाव ने निर्णायक भूमिका निभाई है। दूरस्थ क्षेत्रों में सुरक्षा बलों के कैंप स्थापित कर प्रशासनिक पहुंच बढ़ाई गई, सड़कों और संचार व्यवस्था में सुधार हुआ, तथा बंद पड़े स्कूलों को फिर से खोला गया। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर समन्वय, तथा शीर्ष नेतृत्व की सक्रियता,विशेषकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की लगातार निगरानी ने इस अभियान को गति दी है।
अब जबकि नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं, सबसे बड़ी चुनौती इसके बाद की स्थिति को संभालने की है। आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों का पुनर्वास केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों से जोड़ना होगा। साथ ही, समाज में उनकी स्वीकार्यता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है, ताकि वे पुनः हिंसा की राह पर न लौटें।
इसके साथ ही बस्तर जैसे क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार का तेजी से विस्तार करना होगा।आदिवासी समुदाय को उनके वन अधिकारों का पूर्ण लाभ देना, उन्हें विकास प्रक्रिया में भागीदार बनाना और उनकी सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करना भी उतना ही जरूरी है।
बस्तर आज एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है। यदि सरकार सुरक्षा, संवेदनशीलता और समावेशी विकास के संतुलन को बनाए रखते हुए आगे बढ़ती है, तो यह क्षेत्र न केवल नक्सलवाद से मुक्त होगा, बल्कि देश के विकास मानचित्र पर एक नई पहचान भी स्थापित करेगा।
सम्प्रति- लेखक अशोक कुमार साहू सेन्ट्रल ग्राउन्ड न्यूज(cgnews.in) के सम्पादक तथा संवाद समिति यूएनआई के छत्तीसगढ़ के पूर्व राज्य प्रमुख हैं।




