अखिलेश यादव का अचानक पहुंचना, शीला यादव के लिए बना यादगार पल

(सन्तोष यादव)
सुलतानपुर, 14 अप्रैल। जब कोई बड़ा नेता औपचारिकताओं से परे जाकर एक सामान्य कार्यकर्ता के घर पहुंचता है, तो वह पल सिर्फ राजनीतिक नहीं रहता, बल्कि जीवन की अमूल्य स्मृति बन जाता है। ऐसा ही भावनात्मक और यादगार क्षण मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली इंजीनियर शीला यादव के जीवन में आया, जब उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बिना किसी औपचारिक प्रोटोकॉल के उन्हें विवाह की शुभकामनाएं देने अचानक उनके गांव पहुंच गए।
तीन साल की छोटी उम्र में ही पिता का साया खो चुकी शीला यादव के लिए यह मुलाकात किसी सपने के सच होने जैसी थी। जब अखिलेश यादव ने उनसे उनकी जरूरतों और समस्याओं के बारे में पूछा, तो वह भावुक हो उठीं। उनके लिए यह केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि जीवन के संघर्षों में मिले एक आत्मीय सहारे का प्रतीक था।
दरअसल, अखिलेश यादव सुलतानपुर जिले में एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने इसौली विधानसभा क्षेत्र के शहीद सैनिक अखिलेश शुक्ला के परिवार से मुलाकात कर श्रद्धांजलि अर्पित की। साथ ही समाजवादी पार्टी के नेता तेजिंदर सिंह बग्गा की माताजी के निधन पर भी उनके घर जाकर अपनी संवेदना व्यक्त की।
इसी क्रम में उन्होंने जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर कूरेभार ब्लॉक के शहरी गांव पहुंचकर शीला यादव को उनके विवाह से पूर्व आशीर्वाद और शुभकामनाएं दीं। यह मुलाकात पूरी तरह अप्रत्याशित थी और एक साधारण कार्यकर्ता के लिए जीवन का सबसे अनमोल अनुभव बन गई।
अखिलेश यादव के इस आत्मीय व्यवहार से अभिभूत शीला यादव ने सोशल मीडिया पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा,“मैंने आपको हमेशा अपने पिता और भैया के रूप में देखा है। जब मैं जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही थी, तब आपके अपनत्व ने मुझे जीने की हिम्मत दी। आज जब मैं अपने जीवन का नया अध्याय शुरू कर रही हूं, तब आपका मेरे घर आना न सिर्फ मेरे लिए, बल्कि लाखों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।”
हमारे संवाददाता से बातचीत में शीला ने बताया कि उन्होंने लखनऊ में अखिलेश यादव से मुलाकात कर उन्हें अपनी शादी का निमंत्रण दिया था। उन्हें भरोसा था कि “भैया” जरूर आएंगे, लेकिन उन्होंने यह बात किसी से साझा नहीं की। उन्हें डर था कि यदि किसी कारणवश उनका कार्यक्रम नहीं बन पाया, तो लोग उनका मजाक बना सकते हैं।
लेकिन जब अचानक अखिलेश यादव उनके घर पहुंचे, तो वह पल उनके जीवन का सबसे खूबसूरत क्षण बन गया। शीला ने कहा, “मेरे नेता ने मेरे घर आकर मेरा मान-सम्मान बढ़ाया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे छोटे से छोटे कार्यकर्ता का भी ख्याल रखते हैं।”
संघर्षों से भरी रही शीला यादव की जिंदगी प्रेरणादायक है। वर्ष 1996 में जन्मी शीला ने बेहद कठिन परिस्थितियों में अपनी शिक्षा पूरी की। गांव से प्रारंभिक पढ़ाई करने के बाद वर्ष 2011 में उनका चयन राजकीय पॉलिटेक्निक, लखनऊ में हुआ। वर्ष 2014 में पढ़ाई पूरी करने के बाद आर्थिक तंगी के चलते उन्हें नौकरी करनी पड़ी।
दो वर्षों तक नौकरी कर उन्होंने अपनी आगे की पढ़ाई के लिए संसाधन जुटाए और वर्ष 2016 में बीटेक (आईटी) में प्रवेश लिया। वर्ष 2019 में उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसी दौरान समाजवादी छात्र सभा की पदयात्राओं से प्रभावित होकर वह समाजवादी पार्टी से जुड़ती चली गईं।
वर्तमान में शीला यादव समाजवादी युवजन सभा की प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और पार्टी की सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने लगातार संगठनात्मक गतिविधियों में भाग लेकर अपनी अलग पहचान बनाई है और महिला नेताओं के बीच भी एक प्रमुख चेहरा बन चुकी हैं।
शीला ने बताया कि लोकसभा चुनाव के दौरान कन्नौज के छिबरामऊ में पार्टी की ओर से उनकी ड्यूटी लगाई गई थी। उस समय उनका ऑपरेशन हुआ था और टांके लगे थे, बावजूद इसके उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए वहां पहुंचकर काम किया। यह उनके समर्पण और जुझारूपन का उदाहरण है।
परिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो शीला तीन बहनों और एक भाई में सबसे छोटी हैं। उनके पिता भगवती यादव लोकदल के समय के सक्रिय कार्यकर्ता रहे थे, जिनका वर्ष 1999 में निधन हो गया था। पिता की अनुपस्थिति में भी शीला ने अपने हौसले और मेहनत के दम पर न केवल शिक्षा प्राप्त की, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी अपनी मजबूत पहचान बनाई।
अखिलेश यादव का यह अचानक दौरा केवल एक कार्यकर्ता के घर पहुंचने की घटना नहीं, बल्कि उस विश्वास और रिश्ते का प्रतीक है, जो एक नेता और उसके कार्यकर्ताओं के बीच स्थापित होता है। यह घटना बताती है कि राजनीति केवल मंचों और भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि संवेदनाओं और रिश्तों की भी उतनी ही अहम भूमिका होती है।



