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कथनी-करनी के फासले पर खड़ी सपा, पीडीए की राजनीति और सियासी यथार्थ

                                           (संतोष यादव)

 पूर्व मुख्यमंत्री एवं सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का सुल्तानपुर दौरा महज़ एक निजी कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने स्थानीय राजनीति की कई परतों को उजागर कर दिया।

        इसी दौरे में उनके आसपास दिखाई पड़े कुछ ऐसे चेहरे, जिनकी छवि पर वर्षों से सामंती वर्चस्व और कमजोर वर्गों के दमन के आरोप लगते रहे हैं, ने इस पूरी रणनीति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विरोधाभास केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस व्यापक राजनीतिक द्वंद्व का प्रतीक है, जिसमें एक ओर वैचारिक प्रतिबद्धता है और दूसरी ओर चुनावी यथार्थ। अखिलेश यादव के लिए यह सिर्फ रणनीति का नहीं, बल्कि भरोसे का भी सवाल है। आने वाले समय में उनकी राजनीति की दिशा इस बात से तय होगी कि वे इस कथनी-करनी के अंतर को कैसे पाटते हैं।

        सपा सुप्रीमो के साथ विवादित चेहरों की मौजूदगी, उनकी सक्रिय उपस्थिति ने इस पूरे दौरे को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया। जिन पर पहले दूसरों की हत्या कराने जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं, उनका पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के करीब दिखना सपा कार्यकर्ताओं के एक वर्ग को असहज कर रहा है। राजनीति में दागी छवि हमेशा एक चुनौती होती है। खासतौर पर तब, जब पार्टी खुद को वैकल्पिक और साफ-सुथरी राजनीति के रूप में प्रस्तुत करना चाहती हो। समाजवादी पार्टी की पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति का दावा ज़मीन पर कई बार अपने ही कसौटी पर खरा नहीं उतरता। सिद्धांत और व्यवहार के बीच का यही अंतर विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है। सियासी दलों का कार्यकर्ता सिर्फ जमीन पर नहीं, डिजिटल मंचों पर भी सक्रिय है। सपा सुप्रीमो के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही नाराजगी संकेत देती है कि पार्टी का एक वर्ग नेतृत्व से  स्पष्टता चाहता है।

     आज के दौर में आंतरिक असहमति अब दबती नहीं, बल्कि सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन जाती है। अखिलेश यादव एक बार फिर अपनी स्थापित राजनीतिक लाइन ’पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ मैदान में नजर आए। यह अवधारणा कुछ समय से उनकी राजनीति का केंद्रीय आधार बनी हुई है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय की नई धुरी तैयार करना है। पीडीए की राजनीति का मूल दर्शन भी यही है कि, सत्ता और संगठन में उन तबकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, जो ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे हैं। यह सिर्फ सामाजिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व और सम्मान की राजनीति है। लेकिन जब इसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ने वाला नेतृत्व उन चेहरों के साथ खड़ा दिखाई देता है, जिन्हें पारंपरिक प्रभुत्वशाली राजनीति का प्रतीक माना जाता रहा है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह बदलाव वास्तविक है या सिर्फ नारेबाजी तक सीमित है।

      राजनीति में संदेश केवल भाषणों से नहीं, बल्कि प्रतीकों और साथ खड़े लोगों से जाता है। एक तस्वीर, एक मंच, एक साथ खड़ा व्यक्ति, ये सभी जनता के बीच गहरे अर्थ रखते हैं। ऐसे में यदि पीडीए की बात करने वाला नेतृत्व उन्हीं पुराने सामंती सत्ता-ढांचे के प्रतिनिधियों के साथ नजर आता है, तो यह संदेश जाता है कि बदलाव की प्रक्रिया अधूरी है अथवा समझौते के रास्ते पर है।

     हालांकि, इस स्थिति को पूरी तरह एकतरफा नजरिए से देखना भी उचित नहीं होगा। चुनावी मजबूरियां अक्सर ऐसे फैसले करवाती हैं, जहां प्रभावशाली स्थानीय चेहरों को साथ रखना जरूरी हो जाता है, भले ही उनकी छवि विवादित क्यों न हो। यह ’विजय की अनिवार्यता’ और ’विचार की शुद्धता’ के बीच का संतुलन है, जिसे हर राजनीतिक दल अपने तरीके से साधने की कोशिश करता है। समाजवादी पार्टी भी वही कर रही है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा जोखिम भी छिपा होता है। यदि अल्पकालिक चुनावी लाभ के लिए वैचारिक स्पष्टता से समझौता किया जाता है, तो दीर्घकाल में इसका असर  उसकी विश्वसनीयता पर पड़ता है। समाजवादी कार्यकर्ताओं और समर्थकों का वह वर्ग, जो पीडीए की अवधारणा को सामाजिक बदलाव के रूप में देखता है, वह ऐसे विरोधाभासों से निराश हो सकता है। अखिलेश यादव के सुल्तानपुर से जाने के बाद सोशल मीडिया पर सामने आ रही प्रतिक्रियाएं इसी असहजता की ओर इशारा करती हैं।

         समाजवादी पार्टी के सामने चुनौती स्पष्ट है, क्या वह पीडीए को सिर्फ एक प्रभावी चुनावी नारा बनाए रखेगी, या उसे अपने संगठनात्मक ढांचे, नेतृत्व के चयन और राजनीतिक व्यवहार में भी उतारेगी? आने वाले समय में समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह ऊर्जा से भरे कार्यकर्ताओं, महत्वाकांक्षी नेताओं और सामंती, विवादित छवियों के बीच संतुलन कैसे बनाती है। 2027 की लड़ाई सिर्फ विपक्ष बनाम सत्ता नहीं होगी, बल्कि पार्टी के भीतर भी एक ’अदृश्य संघर्ष’ चल रहा है, जहां छवि, अवसर और स्वीकार्यता की परीक्षा साथ-साथ हो रही है।

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