कोंडागांव, 1 जून। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत मुख्यमंत्री विष्णुदेव ने सुशासन तिहार कार्यक्रम के दौरान कोंडागांव जिले के ग्राम बड़े कनेरा का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने ज्ञान भारतम् अभियान के अंतर्गत संरक्षित लगभग 150 वर्ष पुरानी उड़िया भाषा की दुर्लभ पांडुलिपियों का अवलोकन किया और उनके संरक्षण में लगे परिवारों की सराहना की।
ग्राम बड़े कनेरा में मुख्यमंत्री ने स्थानीय निवासी रामूराम यादव से मुलाकात कर उनके पास सुरक्षित रखी गई आठ प्राचीन पांडुलिपियों का निरीक्षण किया। उन्होंने इन पांडुलिपियों के इतिहास, उपयोगिता और संरक्षण की पारंपरिक व्यवस्था के बारे में जानकारी प्राप्त की। मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसी ऐतिहासिक धरोहरें केवल पुराने ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली की जीवंत पहचान हैं। इनका संरक्षण आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
मुख्यमंत्री ने उन परिवारों की विशेष प्रशंसा की, जिन्होंने पीढ़ियों से इन अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखा है। उन्होंने कहा कि समाज की सक्रिय भागीदारी के बिना सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण संभव नहीं है और ऐसे परिवार वास्तव में देश की ज्ञान-संपदा के संरक्षक हैं।
इस अवसर पर बड़े कनेरा के हरदू कश्यप और परमेश्वर मानिकपुरी, अमरावती के त्रिलोचन मानिकपुरी एवं पुरसोती राम मौर्य तथा कोपरा ग्राम के चमरू नाग ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात कर पांडुलिपियों के संरक्षण से जुड़ी जानकारी साझा की। उन्होंने बताया कि ये ग्रंथ उनके पूर्वजों के समय से परिवारों में सुरक्षित हैं और आज भी अत्यंत सावधानी के साथ संरक्षित किए जा रहे हैं।
संरक्षकों के अनुसार, इन पांडुलिपियों में पंजीयार, पंजी, पुराण, पंचांग और चक्रकूट पंचांग जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथ शामिल हैं। इनका उपयोग परंपरागत ज्ञान, धार्मिक अनुष्ठानों, सामाजिक व्यवस्थाओं और ज्योतिषीय गणनाओं में किया जाता रहा है। साथ ही इनमें स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक विधानों और समय गणना की विशिष्ट प्रणालियों का भी विस्तृत उल्लेख मिलता है।
मुख्यमंत्री ने पांडुलिपियों को पढ़ने और समझने की पारंपरिक विधियों के साथ-साथ वर्तमान समय में उनके संरक्षण की व्यवस्था के बारे में भी जानकारी ली। उन्होंने कहा कि प्राचीन ज्ञान-संपदा को सुरक्षित रखने के लिए संरक्षण, डिजिटलीकरण और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की दिशा में सामूहिक प्रयास जरूरी हैं, ताकि भविष्य की पीढ़ियां भी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।




